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Showing posts from May, 2014

राजनीति की ट्यून बदलती युवा-पीढ़ी

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जनप्रतिनिधियों को युवा अंध-समर्थन करने की बजाए उन्हें ज़मीनी ककहरा सीखने पर विवश कर रहे हैं। भारत की राजनीति जो अब तक राजनीतिक मुहावरे से चला करती थी; वर्तमान युवा पीढ़ी अब उसका टोंटी दबा रही है। इस बार लोकसभा चुनाव में ये असर खूब दिखे। युवा भागीदारी, हस्तक्षेप और नेतृत्व हर मोर्चे पर जारी है। लेकिन, ये परिवर्तनकारी उफान फिलहाल तात्कालिक है, दीर्घकालिक कम। तब भी राजनीति के बारे में व्यावहारिक हो कर सोचते युवाओं को मौजूदा समय की धारा में तैरना है, आगे बढ़ना है, अपनी इच्छाओं-आकांक्षाओं को पूरा करना है। आधुनिक जीवनशैली का युवा बेरोकटोक लव-इमोशन-फैशन और पैशन चाहता है। राजनीति से जुड़ी मध्यवर्गीय सोच या मानसिकता भी तेजी से बदल रही है। अब काॅलेज-गोइंग लड़कियाँ भी राजनीतिक बहस-मुबाहिसे में जबर्दस्त संवाद-चर्चा कर रही हैं। भारतीय लोकतंत्र का भविष्य अब पारम्परिक राजनीतिक धारणाओं के दायरे को तेजी से तोड़ रहा है। अब नए प्रतीक, बिम्ब, मिसाल, मुहावरे और उदाहरण बनते दिख रहे हैं। पुरानी राजनीति इनकी राह में रोड़ा बनने की लाख कवायद कर ले, उसे अंततः टूटना ही है…

शामली: द स्पाइडर गर्ल

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यह कहानी प्रेम की है...प्रेम-प्रसंग की नही।

उस दिन वह नीले रंग की बटनदानी वाली कुर्ती पहने हुए थी। परिधान उस पर जम रहे थे। वह आकर्षक लग रही थी। लड़कियाँ जब आकर्षक लगती हैं, तो मन के भँवरे अपनी आवाज की ट्यून बढ़ा देते हैं। मुझे अपने भीतर के भँवरों की गुनजाहट साफ सुनाई पड़ रही थी। ये भँवरे डोरे डालने वाले नहीं थें, लेकिन थे तो भँवरे ही।

शामली ने आते ही मुझे दस हजार रुपए थमाए थे।

‘‘इतनी जल्दी थी....,’’

‘‘हाँ...,’’ छोटा सा, लेकिन प्यारा-सा जवाब।

मैं और शामली चाय की दूकान से चाय लेकर घुटकने लगे। वह बड़ी मुश्किल से अपना नया सूट दिखाते हुए कुछ बोली थी।

मैं शामली को सुन रहा था। इस सुनाहट में ताजगी थी।

‘‘पापा निक हो गए हैं, माँ भी खुश है। लोग आजकल हरी सब्जियाँ बिना कहे ले आते हैं...कभी शक्कर और मसाले भी।’’

मैं शामली को देख रहा था। उस शामली को जिसने एक तिनके के सहारे खुद को बदल देने का ज़ज्बा दिखाया था।
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शामली जिसकी उम्र 26 साल है; यही कोई तीन माह पहले मुझे मिली थी।

वह बड़ी थी, लेकिन इतनी भी बड़ी नहीं कि मैं उसे अपनी छोटी बहन न कह सकूँ। शामली का स्वभाव बिंदासता के मह…

‘अच्छे दिन’ गाने वालों का कुनबा और राजघाट के गाँधी

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‘हिन्दुस्तान’ समाचारपत्र ने मंत्रिमण्डल के नक्शे को छापा, तो मन में संदेह के हूक दोहरे हो लिए। ‘अच्छे दिन’ के नारे और मुहावरे टेलीविज़न से गायब हैं; अब ये समाचारों पत्रों के गरदन पर भी आसीन नहीं दिख रहे। हाँ, अलीबाग(महाराष्ट्र) और बंदायूँ(उत्तर प्रदेश) से बुरी ख़बरें हहाती हुई अवश्य आ रही हैं। लोगबाग इसे लेकर कुहराम भी मचा रहे हैं। ‘फास्ट ट्रैक’ निर्णय होने के आसार हैं। आमजन जो रोज इस तरह की बद्तर घटनाओं को देखने-सुनने का आदी हो गया है वह भावी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सुरंग खुदवाते देख रहा है; जिसका मकसद है कि वे अपने प्रधानमंत्री आवास से निकले तो सीधे एयरपोर्ट पहुँचे। शायद! संसद भी पातालमार्गी(अंडरग्रांउड शिफ्ट) हो जाए, तो अचरज नहीं है। इस देश में सरकार और उसका भीतरी तंत्र कारपोरेट इत्र-फुलेल से गमक-दमक रहा है।  आमआदमी के भिनभिनाते-बजबजाते ज़िन्दगी से पिछली बार किसी को दरकार नहीं था; अबकी बार देखिए गुरु, मोदी सरकार किन-किन के दिन फेरने वाले हैं? 


मुझे कल तक अपनी चिन्ता भी सताती थी, अब तो वह भी नहीं; क्योंकि अबकी बार सीने पर गो…

आँख के बारे में: राजीव रंजन प्रसाद का अनुसन्धान रिपोर्ट

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(Eye-Dwell Communication : Around the Eye)

कुछ नोट्स

-आँखें स्कैनिंग मशीन से अधिक ‘पावरफुल’ और ‘रिएक्टिव’ होती हैं....
-हर घटना हमारे दिमाग में तारीख़वार दर्ज होती हैं....
-हमें सम्पर्क में जो कुछ हासिल है...सबकुछ हमारे संज्ञान-बोध का हिस्सा है...
-वे तमाम क्रियाएँ जिसमें शारीरिक क्रियाशीलता शामिल हैं...आँख उन सभी की ‘रिज्यूमे’ तैयार करती है....
-आँखें झूठ का सबसे अधिक प्रतिवाद करती हैं....
-आँख का प्राकृतिक संकल्प या कहे मूल प्रवृत्ति है-सच का उद्बोधन....
-आँखों के माध्यम से पिछले सभी सच बासबूत जाने जा सकते हैं.....
-आँखें मुहावरा नहीं गढ़ती हैं, लेकिन भाषा के मुहावरों से बखू़बी परिचित होती हैं....

इसीलिए शायद हमारी आँखें सबसे अधिक बोलती हैं, भारत के लोक-माधुर्य के कवि बिहारी कहते हैं:


‘‘कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे मौन में करत हैं, नैनन ही सों बात।।’’

मित्रो,

आपके समक्ष अपना शोध-पत्र प्रस्तुत करना मेरे लिए एक सुअवसर है।
आपसभी को अभिवादन!

आँख हमारी ज़िन्दगी के बहुत करीब है। या यों कह लें कि हमारी ज़िन्दगी आँख के सर्वाधि…

फिल्म ‘मम्मा रेस्तरां’ ने चखाया रिश्तों की कद्रदानी का बेजोड़ स्वाद

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भारत एक दिलचस्प देश है। यहाँ सच की तपती ज़मीन पर धैर्यपूर्वक पाँव रख कर कोई भी चाहे तो सफलता अर्जित कर सकता है। हाँ, शर्त है कि आपकी चाहत बीच में ही कमजोर न पड़े। यह बात हाल ही में रिलिज हुई फ़िल्म ‘मम्मा रेस्तरां’ पर बिल्कुल सटीक बैठती है। इस घड़ी चारों ओर इसी फ़िल्म की धूम है। इस फ़िल्म को मिलते रेस्पांस से इस फ़िल्म के युवा निर्देशक सह पटकथा लेखक आर्जीव खासे उत्साहित हैं।

अब बात थोड़ी इस फ़िल्म की हो जाए। दरअसल, यह फ़िल्म 34 साल की एक स्त्री अंजिमा विश्वास के मुख्य चरित्र पर केन्द्रित हैं जिनकी दो लड़कियाँ हैं-11 वर्षीय हेम और 9 वर्षीय आही। जीवन के कठिन मोड़ पर तीनों एक रेस्तरां खोलने का निर्णय लेते हैं। यह रेस्तरां सिर्फ लड़कियों और स्त्रियों के लिए है। किसी भी स्थिति-परिस्थिति में पुरुषों को उसमें आवाजाही करने की इज़ाजत नहीं है। लोगों में इसे ले कर कई तरह के कहकहे, चर्चे और अफ़वाह गर्म रहते हैं, छींटाकशी और टिप्पणियाँ भी सुनने को मिलती है। पुरुषों के बगैर उसके रेस्तरे में कौन आएगा? यह सवाल अंजि…

लिखी चिट्ठी बहुत दिनों के बाद

प्रिय देव-दीप,

रायसीना हिल्स जहाँ कि राष्ट्रपति भवन स्थित है; सवेरा करवट ले रहा है। गोधुलि की बेरा में नरेन्द्र मोदी वहाँ करीब शाम 6 बजे प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। ख़बर है, चैकसी ऐसी कि परिन्दा भी पर नहीं मार सकता। फिर आम-आदमी की क्या बिसात। हम भारतीय जन ऐसे प्रोटोकाॅल के आदी हंै...यह सरकार भी फिलहाल उसी नक़्शेकदम पर जाती दिख रही है-वी.आई.पी./वी.वी.आई.पी.। टीवी के कहे को हक़ीकत मानूँ, तो 6000 भारतीय ज़वानों की तैनाती आज की तारीख़ में की गई है। एयर डिफेंस सिस्टम की चाक-चैबन्द व्यवस्था है सो अलग। इस मौके पर 4000 मेहमानों के पधारने की सूचना प्रसारित की जा रही है; 60 देशों में न्योता भेजे जाने का जिक्र भी इन ख़बरों में शामिल है। टीवी वाले यह बताते नहीं थक रहे हैं कि आज से नये युग की शुरूआत हो रही है। शीर्षक टेलीविज़न स्क्रीन पर चमक रहा है-‘शुरू होगा इंडिया का नया इतिहास’, ‘अब इंडिया का होगा मोदीफिकेशन’, अब नए रोडमैप पर इंडिया आदि-आदि। इसमें ‘भारत’ शब्द कहीं नहीं है, क्योंकि भारत में हम जैसे सोच वाले लोग रहते हैं जो देखने-दिखाने से ज्यादा ज़मीनी काम करने और करवाने में विश्वास करते हैं।

देव-दी…

जनता-दर्पण में कांग्रेस की छवि मटमैली, गंदली और बदशक़्ल क्यों?

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(राजीव रंजन प्रसाद)

अरसे से आमजन आमूल-चूल बदलाव चाह रहे थे। लेकिन, कांग्रेसी-शासनदारों ने उनकी एक न सुनी। वे सुनते भी कैसे? कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की विधिक/न्यायिक व्यवस्था नहीं है। यह पार्टी देश की इकलौती ऐसी पार्टी है जिसमें विरासत और वंशवाद की गूँज और किलकारी सबसे अधिक सुनी जाती है। अस्तु, कांग्रेसी नेतृत्व  का शीर्ष ढाँचा दो रूपों में विभाजित है। पहला, औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त है, तो दूसरा राहुल गाँधी के ‘टैलेंट हट टाइप्ड’ है। दोनों समरूपी सोच का न होकर दो विपरीत ध्रुव हंै। एक सामंती और बुर्जुआर्जी है, तो दूसरा अपनी सोच एवं चिन्तन-दृष्टि में ही हवा-हवाई और टेढ़-बागुच है। यह हास्यास्पद स्थिति तब है जब जनता उनको हमेशा आगाह करती दिखी। यहाँ तक कि बिहार और यूपी से लगायत हाल ही में सम्पन्न पाँच प्रदेशों के चुनाव में जनता ने इस पार्टी की नसपट्टी ढीली करके रख दी थी। लेकिन, कांग्रेस पर इन परिणामों का प्रभाव बेअसर बना रहा।

चूँकि जनता अंततः विकल्प और समर्थ नेतृत्व चाहती है; इसलिए मोदी के नेतृत्व में मिले सक्षम जनादेश को इसी विचार का संगत परिणाम क…

चेतावनी : प्राकृतिक दुर्घटना के ख़तरनाक मोड़ पर ज़िन्दगी

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एहतियातन अपना बचाव हरसंभव मुस्तैदी से करना चाहिए। इस बार की आपदा संभवतः पिछली बार से अधिक त्रासदीजनक हो। पिछली रात भूकम्प के झटके मिले। यह अनायास नहीं, अपितु आगत संकट का पूर्व-संकेत है। गत वर्ष उतराखण्ड में जो कुछ घटित हुआ; यदि वह सब हमें याद है। हमने बेहतर प्रबंधन और बचाव के विकल्प चुन रखे हैं या कि उसके इंतजमात को ले कर आश्वस्त हैं, तो डरने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन, अब हमें भविष्य में ऐसी घटनाओं से हमेशा दो-चार होने की आदत डाल लेनी होगी।

Breaking Post : अपने विश्विधालय के कुलपति के नाम ख़त

मैंने कल विह्वल मन से यह ई-मेल अपने कुलपति प्रो. लालजी सिंह को भेजा था। लेकिन, न वे आये और न ही उनका कोई संदेशा आया। जो आये वे विभाग के होने के नाते उपस्थित थे या सीधे परिचय होने के कारण। लेकिन, हिन्दी विभाग का हाॅल खचाखच भरा था। अध्यापक और विधार्थियों का जनसमूह इस श्रद्धांजली भेंट में जिस तरह शिरक्त किया, वह वैसे कम नहीं था। फिर भी, आखि़र हम किस बिनाह पर या किस शर्त पर विश्वविधलय से स्वयं को जोड़कर देखें, उसके लिए अपनी हर इच्छा को दांव पर लगा दें, औरों के ढर्रे से अलग हटकर कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य करें और अपने विश्वविधालय का नाम ससम्मान विश्व भू-पटल पर दर्ज करायें....यहां तो हमारे जीने पर ही संकट है।

शोक-सन्देश
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20/05/2014
12 : 29 PM

प्रति,

परमआदरणीय कुलपति महोदय,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय।

महोदय,

मैं, यह सूचना अत्यन्त दुःख के साथ व्यथित मन से आप तक पहुँचा रहा हूँ कि
अपने हिन्दी विभाग(कला संकाय) के मेधावी, यशस्वी और सर्जनात्मक
प्रतिभा-सम्पन्न शोध-छात्र रविशंकर उपाध्याय का निधन गत अपराह्न 3 बजे सर
सुन्दरलाल चिकित्सालय के आई.सी.यू. में हो गया। युवा कवि रविशंकर की
रचनात्मक…

अगली तारीख़ तक विदा, ‘इस बार’!

शोध-विश्लेषण कार्य शुरू.....,

पुरानी फाइल : व्यक्तित्व की भाषा

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 (राजीव रंजन प्रसाद लिखित  'एक बंजारे बेरोजगार का नोट्स-बुक’ से)

अंग्रेजी में एक शब्द है-‘व्यक्तित्व’। लोकप्रिय और बहुचर्चित भी। इंटरनेट जो अक्षरों, शब्दों, वाक्यों, लिपियों, भाषाओं इत्यादि का खजाना है; में एक इंटर पर इफरात सामग्री(टेक्सट, इमेज, पीएडएफ, पीपीटी, आॅडियो, विडियो इत्यादि) मिल जाएंगे व्यक्तित्व के बारे में। वहाँ यह सूचना आसानी से मिल सकती है कि साधारण बोलचाल में प्रयुक्त शब्द ‘व्यक्तित्व’ को अंग्रेजी में ‘Personality’ कहा जाता है जो लैटिन शब्द ‘Persona’ से बना है। अपनी बोली में हम कुछ बोले नहीं कि सामने वाला व्यक्ति फौरन यह जान लेगा कि हम कैसे हंै? हमारे व्यवहार की प्रकृति क्या है? हमारा स्वभाव कैसा होगा? हम मिलनसार हैं या उजड्ड। अक्लमंद हैं या हमारे दिमाग में सिर्फ भूसा भरा हुआ है। कई बार तो हम किसी का हाव-भाव और हरकत देखकर यह सटीक अनुमान लगा सकते हैं कि फलांना व्यक्ति इस वक्त क्या सोच रहा है; उसके दिमाग में क्या चल रहा है। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष।

व्यक्तित्व का नाता हर आदमी के चाहे वह छोटा हो या बड़ा; देह और दिमाग दोनों से अंतःसम्बन्धि…

शशि शेखर जी, भारतीय जनता पर क्या अब भी तरस खाने की जरूरत है!!!

चुनावों में मरघटिए का टंट-घंट मत छानिए
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(21 जुलाई 2013 को इसी ब्लाॅग पर ‘हिन्दुस्तान’ समाचार पत्र के सम्पादक के नाम भेजे इस पत्र को प्रकाशित किया गया था।)

शशि शेखर अख़बार के सम्पादक हैं। समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ में उनकी
वैचारिक-टीआरपी जबर्दस्त है। वे जो लिखते हैं, सधे अन्दाज़ में। उनका साधा
हर शब्द ठीक निशाने पर पड़ता है या होगा, ऐसी मैं उम्मीद करता रहा हूँ
(फिलहाल नाउम्मीदगी की बारिश से बचा जाना नितान्त आवश्यक है) लेकिन, कई
मर्तबा वे जो ब्यौरे देते हैं, तर्क-पेशगी की बिनाह पर अपनी बात रखते
हैं; उसमें विश्लेषण-विवेक का अभाव होता है। यानी वे अपने विचार से जिस
तरह पसरते हैं, उनकी तफ़्तीश से कई बार असहमत हुआ जा सकता है। खैर!
पत्रकारिता भाषा में तफ़रीह नहीं है, यह शशि शेखर भी जानते हैं और मैं भी।
बीते ढाई दशक में उनकी कलम ने काफी धार पाया है, चिन्तन में पगे और चेतस
हुए हैं सो अलग। यह मैंने कइयों से सुना है...और उनसे भी।
अब मुख्य बात। शशि शेखर के लोकप्रिय रविवारीय स्तम्भ ‘आजकल’ में आज का
शीर्षक है-‘‘चुनावों को महाभारत मत बनाइए’’। इसमें उनक…

पुरानी फाइल : प्रचारित ज्ञानकाण्ड नहीं है हिन्दी

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हमें हिन्दी-विलापी ज़बानकारों की जरूरत नहीं है। ऐसे नकारे लोग कोई
दूसरे नहीं हैं; वे हम ही में से हैं यानी हिन्दीभाषाभाषी शोधक-अन्वेषक;
अध्यापक-प्राध्यापक, अकादमिक या राजभाषिक बुद्धि-सेनानी वगैरह-वगैरह
जिनकी चेतना और संस्कार दोनों में से हिन्दी-भाषा के प्रत्यय, प्रतिमा,
अनुभव, स्मृति, कल्पना, चिन्तन, संवेदन इत्यादि सब के सब गायब हो चुके
हंै। इन दिनों हिन्दी-प्रदेशों में अंग्रेजी को ही ज्ञान के गहन प्रकाश
के रूप में देखने का चलन बढ़ा है। इसे भूख-निवारण, कुण्ठा-निवारण,
बेराजगार-मुक्ति, भाषाई-प्रतिरूप, चेतना-विकास और संस्कृति-बोध की
वास्तविक, एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ कसौटी मानकर प्रचारित-प्रसारित करने
वाले हमहीं-आपहीं जैसे ज्ञान-आयोगिया लोग हैं।  क्या इस सचाई को हम झुठला सकते हैं कि आजादी के इत्ते बर्षों बाद भी  भारत में बनी अंग्रेजी की एक
भी धारावाहिक, वृत्तचित्र, सिनेमा आदि ने भारतीय जनमानस को
आलोडि़त-आन्दोलित करने में सफलता हासिल नहीं की है। कितने लोग मानेंगे कि
अंग्रेजी में प्रकाशित किसी पुस्तक ने भारतीय मन की सामूहिक अभिव्यक्ति
की दिशा में अकल्प…

काशी की ‘गंगा-आरती’ को भाजपा ने ‘जन-प्रतिनिधि आरती’ में बदला

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(अच्छे दिन का आसार पाले काशीजन को अपनी ही घाट से बैरंग लौटाया जा रहा)

'गंगा आरती' काशी की अध्यात्मिक शान है। इसकी लोकप्रियता स्वमेव प्रसिद्ध है। गंगा के तीर पर बने पारम्परिक घाट प्रतिदिन उसका चश्मदीद गवाह बनते हैं। इस आरती-पूजन में जन-मन का जुटान स्फूर्त एवं स्वाभाविक ढंग से होता है। यह तादाद तकरीबन सैकड़ो-हजारों में होती है। विदेशी सैलानियों का जमावड़ा भी यहाँ रोज उमडता है। वे आश्चर्यमिश्रित भाव से इस परम्परा का लुत्फ़ और आनन्द लेते दिखते हैं। काशीजन बाबा विश्वनाथ और माँ गंगे पर अगाध श्रद्धा रखने वाले लोग हैं। उनमें अपने शहर में पधारे दर्शनार्थियों के प्रति विशेष सहूलियत का भाव रहता है। कुल जमा यह कि इन क्षणों में आरती-पूजन का माहौल मनोहारी, पावन एवं पवित्र हो जाता है।

लेकिन विशेष मौकों पर इस परम्परा का उल्लंघन होना बेहद अखरता है। किसी राजनेता के गंगा-आरती में शामिल होने का यह अर्थ कहाँ और कैसे होता है कि आमजन को इस सुअवसर से महरूम कर दिया जाये। उन…

चुनावी-परिणाम से इतर कुछ बात करें.....!

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हम विद्यार्थी हैं। हमारा सामना सब चीजों से होना है। अपनी भाषा में हमने इस संचार-युग की रामकहानी को अक्सर सुना होगा कि भूमण्डलीकृत बाज़ार की निर्मिति बाज़ारवादी शक्तियाँ किस तरह कर रही हैं। उनके अन्तर्गत जो कुछ भी निर्माणाधीन है; उन पर उनका इकलौता आधिपत्य है। विदेशी संचारविज्ञानियों ने इस पर गंभीरता से सोचा है। विशेषतया राॅबर्ट डब्ल्ल्यू. मैक्चेस्नी की दृष्टि मार्केबल हैं। उन्होंने संचार की सामान्य और स्वाभाविक मानी जाने वाली प्रक्रिया को समझने की पूरी चेष्टा की है। वे यह जानना चाहते हैं कि आखिर संचार-तंत्र की सम्पूर्ण गतिविधियाँ किस तरह काम करती हैं; संचार प्रणालियों का स्वरूप क्या है और सरकारी नीतियाँ इस पूरे तंत्र के ढाँचें और गतिविधियों को किस तरह प्रभावित करती है। संचार माध्यमों द्वारा जो अन्तर्वस्तु उत्पादित की जाती है, उसकी प्रक्रिया और प्रकृति का विवेचन भी मैक्चेस्नी इस तंत्र को समझने के लिए आवश्यक मानते हंै। उनकी दृष्टि में इसमें उत्पादन, वितरण और विनिमय की प्रक्रियाएँ भी शामिल हैं।

दरअसल, भू…

बिल्ली के गले में घंटी बँध चुकी है

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(आसन्नप्रसवा: मोदी आने वाला है)

1) क्या हम भारतीय लोकतंत्र के किसी नवप्रवत्र्तनकारी युग में प्रवेश कर रहे है?ं
2) क्या एफडीआई, सेज, अधिग्रहण, कब्जा, दमन, निर्वासन, विस्थापन, पलायन इत्यादि शब्द अपनी घृणतम परिकल्पनाओं, अमानुषिक परिभाषाओं एवं विध्वंसकारी व्यवहार-प्रणालियों से सदा-सर्वदा के लिए विदा हो जाएंगे?
3) नमो-नमो द्वारा लाये जा रहे अच्छे दिन गुणात्मक रूप से पिछली सरकारों के क्रियाकलाप से भिन्न और मूल्यपरक होंगे?
3) यदि भिन्न और मूल्यवान हंै तो किन अर्थो में?
4) क्या मोदी-कार्यकाल में लोग अधिक खुशहाल, सुरक्षित और भविष्योनुमुखी चेतना से लैश होंगे?
5) क्या विभिन्न तरह के समाजों में व्याप्त गैर-बराबरी ख़त्म हो जाएगी?
6) क्या कथित विकास का रूढ़ अर्थ बदलेगा और यह सिर्फ मध्यवर्ग के विकास तक ही सीमित नहीं होगा?
7) क्या हाशिए पर रहने वाली दुनिया की अधिकांश आबादी को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार(गारंटीनुमा झाँसा नहीं) आसानी से उपलब्ध होगा?
8) क्या भारतीय जनतंत्र को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी और सब जगह शांति और भाईचारे का माहौल बन सकेगा?
9) क्या…

जनता दिमाग में विवेक रखती है!

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युवा पीढ़ी को नरेन्द्र मोदी भा रहे हैं, तो इसकी वजहें बहुत सारी है। बार-बार ठगी जाती जनता को एक ही ठग ताज़िन्दगी नहीं ठग सकता है। कांग्रेस की राजनीतिक किताब यहीं ख़त्म हो रही है। बाकी दल लोकतंत्र के लटकन हैं; यह पब्लिक है जो सब जानती है। यानी उन पर भरोसा करना मौजूदा युवा पीढ़ी के लिए खुद का खुद से ही माखौल उड़ाना है। अतः वह इस बार चुनाव में यह टिटिमा नहीं करना चाहती है।

सवाल उठता है, तो फिर! जवाब में अधिसंख्य युवा सस्वर कंठ से ‘नमो नमो’ बोलते दिख रहे हैं। ये युवा पढ़े-लिखे, समझदार और जागरूक युवा हैं। ‘इमोशनल अत्याचार’ अथवा ‘नैतिक चीत्कार’ करने वाले पार्टियों की ये युवा बैन्ड बजा देने में उस्ताद हैं। ये युवा इतनी कूव्व्त रखते हैं कि ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ का चोचरम करने वाले राजनीतिज्ञों की पतलून ढीली कर दें। अपनी काबीलियत और सामथ्र्य से आगे बढ़ने को उतावली यह पीढ़ी जो आजतक मौका-ए-वारदात पर साक्षी/द्रष्टा होते हुए भी कुछ नहीं बोलती थी; अब राजनीतिज्ञों से सीधा सवाल कर रही है, उनसे स्पष्ट भाष…

राजीव के लिए अपनी भाषा में मनुहार

‘‘हत्यारे एकदम सामने नहीं आते
वह पुराना तरीका है एक आदमी को मारने का
अब एक समूह का शिकार करना है
हत्यारे एकदम सामने नहीं आते
उनके पास हैं कई-कई चेहरे
कितने ही अनुचर और बोलियाँ
एक से एक आधुनिक सभ्य और निरापद तरीके
ज्यादातर वे हथियार की जगह तुम्हें
विचार से मारते हैं
वे तुम्हारे भीतर एक दुभाषिया पैदा कर देते हैं।’’
...........................................................................-धूमिल

प्रिय देव-दीप,

हमारी आँखें बाहर के दृश्यों को खूब से खूब 1/10 भाग ही देख पाती है। नेत्र का दिखाव-क्षेत्र सीमित मात्रा में प्रकाशीय कणों को ग्रहण करता है। इसलिए हमारे मानस में बनने वाले दृश्यबिम्ब चयनित/प्रतिनिधि होते हैं। इसी तरह ‘वाक्’ में हम जितना सोचते हैं; उसका कुछ हिस्सा ही अभिव्यक्त हो पाता है; शेष अव्यक्त ही रह जाते हैं। यह अनदेखा दृश्य अथवा अव्यक्त वाणी एक दिन बचावट की बड़ी ढेर बनकर हमारे ही सामने आ खड़ी होती हैं। यह सब हमारे अचेतन का हिस्सा है।

बच्चों, इसी तरह सुनावट की प्रक्रिया घटित होती है। हम जो सुन पाते हैं वे तो एक अंश मात्र हैं; बहुलांश तो अनसुना ही रह जाते हैं। जिन आवाजों को हम नहीं ग्रहण कर पाते हैं, उन्हें प्रकृति अपने संज्ञान में सुरक्षित कर लेती है। यह प्रकृतिगत अचेतन का हिस्सा है। प्रकृति बहुविध आवाजों को न सिर्फ ग्रहण करती है; बल्कि उसे तरंगों में रूपान्तरित कर ब्राह्मण्ड में विस्तारित कर देती है। ये तरंगत्व नाद-अनुनाद के रूप में हमें पूरे जगत में फैले मिल सकते हैं। इस फैलाव में विद्युत्व और चुम्बकत्व दोनों पर्याप्त मात्रा में विद्यमान होते हैं।

बच्चों, तुमदोनों ने रंग-मिश्रण के …

पुरानी फाइल: 2009 में बनारस

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