जनता-दर्पण में कांग्रेस की छवि मटमैली, गंदली और बदशक़्ल क्यों?

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(राजीव रंजन प्रसाद)

अरसे से आमजन आमूल-चूल बदलाव चाह रहे थे। लेकिन, कांग्रेसी-शासनदारों ने उनकी एक न सुनी। वे सुनते भी कैसे? कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की विधिक/न्यायिक व्यवस्था नहीं है। यह पार्टी देश की इकलौती ऐसी पार्टी है जिसमें विरासत और वंशवाद की गूँज और किलकारी सबसे अधिक सुनी जाती है। अस्तु, कांग्रेसी नेतृत्व  का शीर्ष ढाँचा दो रूपों में विभाजित है। पहला, औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त है, तो दूसरा राहुल गाँधी के ‘टैलेंट हट टाइप्ड’ है। दोनों समरूपी सोच का न होकर दो विपरीत ध्रुव हंै। एक सामंती और बुर्जुआर्जी है, तो दूसरा अपनी सोच एवं चिन्तन-दृष्टि में ही हवा-हवाई और टेढ़-बागुच है। यह हास्यास्पद स्थिति तब है जब जनता उनको हमेशा आगाह करती दिखी। यहाँ तक कि बिहार और यूपी से लगायत हाल ही में सम्पन्न पाँच प्रदेशों के चुनाव में जनता ने इस पार्टी की नसपट्टी ढीली करके रख दी थी। लेकिन, कांग्रेस पर इन परिणामों का प्रभाव बेअसर बना रहा।

चूँकि जनता अंततः विकल्प और समर्थ नेतृत्व चाहती है; इसलिए मोदी के नेतृत्व में मिले सक्षम जनादेश को इसी विचार का संगत परिणाम कह सकते हैं। वास्तव में, कांग्रेस शासन-तंत्र के हर मोर्चे पर विफल रही है। उनकी नाकामियों ने उनके अच्छे कार्याे(सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, खाद्य सुरक्षा विधेयक इत्यादि) की भी मिट्टी पलीद कर दी है जिसे लेकर कांग्रेसी-जन हमेशा मुगालते में रहते आये थे। अतः मौजूदा स्थिति में कांग्रेसियों के पास पार्टी के चिरायु होने की प्रार्थना भले हो, लेकिन उनके पास करम-धरम के नाम पर वाज़िब करतब कुछ नहीं है। हाल के कुछ वर्षों में कांग्रेस ने अपना सारा दारोमदार राहुल गाँधी के ऊपर लाद/थोप दिया था। यह सही है कि इस 16वीं लोकसभा चुनाव में उनका श्रम-निवेष अधिक रहा है; उन्होंने चुनावी-समय में खूब पसीने बहाये हैं; लेकिन, परिणाम आखिरकार उल्टे आये। जनता ने कांग्रेस पार्टी को अबकी बार बिल्कुल ही नकार दिया है। क्यों? दरअसल, इस करारी हार की वजहें कई दूसरी भी हैं। आइए, इस बिन्दु पर सिलसिलवार ढंग से विचारणा करें।

जो भी व्यक्ति विश्व के कई एक राष्ट्रों के इतिहास, क्रान्तियों, युद्ध, विजयों, उनमें हुई वृद्धियों और कमियों, उनकी विशेष सरकारों के स्थापित होने की विधियों  और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को अन्तरित किये गये क्रमिक अधिकार पर विचार करेगा, वह राजकुमारों(आधुनिक ‘शहजादों’) के अधिकारों को लेकर हुए विवादों को बहुत हल्के ढंग से लेने लगेगा और उसे यह विश्वास हो जायेगा कि किन्हीं सामान्य नियमों का कड़ाई से पालन करना और किन्हीं विशेष व्यक्तियों और परिवारों के प्रति अटल निष्ठा रखना जिन्हें लोग इतना महत्तवपूर्ण मानते हैं, ऐसे सद्गुण(?) हैं जिनके साथ तर्क कम और धर्मान्धता और अन्धविश्वास अधिक जुड़े हुए हैं। ऐसी जड़बद्ध स्थिति में किसी ऐसे सरकार की अधीनता चुपके से स्वीकार कर लेना जो उस देश में स्थापित है, जहाँ हम रहते हैं और इस सम्बन्ध में कोई प्रश्न न उठाना कि उसका उद्गम क्या है और यह पहली बार कब स्थापित हुई थी, एक व्यवहार-संगत और नीतिसंगत बात है। इस मानव-प्रकृति का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए डेविड ह्यूम कहते हैं, हम स्वाभावतः अपने आपको अधीन रहने के लिए पैदा हुआ मान लेते हैं और यह कल्पना करने लगते हैं कि अमुक व्यक्ति हमें आदेश देने का अधिकार रखते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे हम आज्ञा का पालन करने के लिए बाध्य हैं। अधिकार और दायित्व की ये धारणाएँ उस लाभ से उत्पन्न होती हैं, जो हम सरकार से उठाते हैं। इससे हम सरकार के प्रति कोई विरोध करने से घृणा करने लगते हैं और यदि हम यह बात किसी दूसरे व्यक्ति में भी देखते हैं, तो हम ऐसे व्यक्ति से अप्रसन्न हो उठते हैं। ऐसा इसलिए कि प्रत्येक व्यक्ति का निजीहित अलग-अलग होता है और यद्यपि लोकहित अपने आपमें हमेशा एक और समान हो, फिर भी उससे सम्बद्ध व्यक्तियों(प्रायः लालची और पाखण्डी) के अलग-अलग मत होने के कारण वह हित मतभेद और अनबन का स्रोत बन सकता है। नतीजतन, इस अवस्था को बदलने या कोई नयी सरकार स्थापित करने या कि उसके सम्बन्ध में जनता के मन से सभी नैतिक संकोचों को दूर करने में अवाम को कई दशक लग जाते हैं। भारतीय सन्दर्भों में देखें, तो अबकी बार मोदी सरकार को बहुमत से जिताने में जनता को ऐसी ही लम्बी इंतजारी करनी पड़ी है।  

(पूरा आलेख पढ़े: ‘ग़लतियों की जादूगरी और कांग्रेस’ शीर्षक से) 
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