इन मनबढ़ कुःसंगियों पर काशी चुप क्यों?


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काशी की सात्त्विक पक्षधरता सुविख्यात है। छुटभैए ठग से बचने की सलाहियत है; लेकिन कुमार्गी और कुःसंगियों की खेप/फौज यहाँ मौजूद नहीं है। परम्परा और तहज़ीब की धनी इस सांस्कृतिक नगरी में सभी को बराबर जगह मिलते हैं। मैंने सुना ही नहीं, जिया भी है। पूरे सात वर्ष। अकादमिक पढ़ाई का लिहाफ़ ले कर इस घड़ी मैं काशी में ही हूँ। मैंने नजदीक से देखा है-बुद्धिबाज अड़ीबाजों को, मौखिक संभाषण और तमतमाये मुख-मुद्रा के साथ बमकते-बरसते भाषाई प्रोफेसरानों को। इनमें से कुछ तो बेजोड़ नरेटीबाज हैं। खैर! यह अद्भुत नगरी इस मायने में भी दिलचस्प है कि यहाँ मुक्ति का बाट जोहने से लेकर आपकी बटुआ की सुरक्षा करने वाले लोग भी मिल जायेंगे। लेकिन यह शहर अपने व्यक्तित्व-व्यहार में अभद्र और उत्पाती हरगिज़ नहीं है। भाषा में भदेस होना सिर्फ यहीं की नहीं पूरे उत्तर प्रदेश
की ठेठ पहचान है। बनारसी होने का ठाठ गलगौज में पसरा-फैला दिखता है; लेकिन काशीवासियों की नियत खोटी और मन अपवित्र नहीं है। घाटों की रौनक के बरक़्स शहर का मिज़ाज तेजी से बदल रहा है; लेकिन यह रफ़्तार बनारसीपन के लौह चदरे को पिघला सकने की कुव्वत नहीं रखती है। इस बारे में मेरा अब तक का हासिल निष्कर्ष यही है।

चुनावी सरगर्मी के मध्य नंगेपन का नज़राना पेश करना इस नगरी के शान के सर्वथा खि़लाफ है। फिर ऐसा क्या हुआ इस बार? काशी की मर्यादा की धुरी चुक रही है। लगातार शर्मसार हो रहे हैं काशीजन। ख़बरों में उत्पातियों, मनबढ़ों, असामाजिको, अराजनीतिकों इत्यादियों की आमद थोकभाव है। क्या प्रचारवादी राजनीति की अकूत ताकत ने बनारसी चेतना का सत्यानाश कर दिया है? क्या यहाँ अब सद्भावना और सद्व्यवहार जैसी सहकार-भाव शेष नहीं बची है। क्या अबकी बार चुनावी समर में यह भी नष्ट कर दिया है हम ने? अगर हाँ, तो डरो ‘मुक्तिबोध’; क्योंकि अब अच्छे दिन नहीं आने वाले हैं। शास्त्र का ज्ञान रखने वाले महापंडितों को ज्ञात होगा कि यह ‘वीर रस’ नहीं है। आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल को आलम्बन बनाकर जिस फूहड़ता, अश्लीलता और अमर्यादित आचरण को हम पूरी दुनिया के सामने प्रकट कर रहे हैं; इस बारे में काशी की चुप्पी बेहद ख़तरनाक है। कथित रूप से भाजपाईयों को जिस तरह ये व्यवहार शर्मसार कर रहे हैं उस पर और किसी को बाद में नरेन्द्र मोदी को सबसे पहले नकेल कसनी चाहिए। शास्त्रीय ज्ञान की सैद्धान्तीकी में भी इस बात की निंदा की गई है। भाषाविद् रामदहिन मिश्र ने विरोधी दल की छेड़खानी, कटुतापूर्ण व्यवहार, अधिक्षेप, अपमान, अपकार, कठोर भाषण, शस्त्र उठाना, गंजन, तर्जन, विरोधियों को ललकारना आदि को निकृष्टतम आचरण माना है। आधुनिक मनोविज्ञानियों ने इसे दमित/कुंठित अवचेतन का निकास कहा है। संविधान में भी आम चुनाव के अन्तर्गत किये जाने वाले इस तरह के व्यवहारों की पर्याप्त आलोचना है।

अतः मेरा इस सन्दर्भ में यही गुज़ारिश है कि आप अपने कृत्य को देखें और स्वयं उसकी आत्मालोचना करे। अपनी सेहत की न सही बल्कि समाज की तबीयत का तो कुछ ख्याल रखिए। इस समय काशी पूरे दुनिया की निगाहबानी में हैं। तमाम देशों के चुनाव-विश्लेषक, मीडियाकर्मी, समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी इत्यादि काशी की विशेषता और इसके वैशिष्टय को अपनी-अपनी दृष्टि से खंगाल रहे हैं। ऐसे में हमें यह भली-भाँति विचारना चाहिए कि हम अपने इन नकारात्मक प्रवृत्तियों के माध्यम से पूरी दुनिया को आखिर क्या जतालाना चाहते हैं? क्या इससे किसी पार्टी के राजनीतिक लक्ष्यार्थ की उद्देश्य-पूर्ति हो जाती है? क्या इससे हमारी गरिमा और गर्वबोध में इज़ाफा होता है। क्या हम अपने देश में विद्यमान लोकतंत्र का यही स्वर अपनों के संग-साथ बाहरियों को सुनाना चाहते हैं? अगर नहीं, तो फिर ऐसी घटनाक्रमों में लगातार बढ़ोतरी क्यों हो रही है? क्या यह मोदी के सत्ता में आने का पूर्व-संकेत है जो थामे नहीं थम रही है। या कि यह किसी पार्टी-विशेष के द्वारा सुनियोजित ढंग से ख़ालिस चर्चा में बने रहने की कवायद मात्र है? दोनों ही सरासर ग़लत है। अतएव, इसकी कड़ी भत्र्सना और आलोचना ही एकमात्र उपाय है।

गोकि काशी में सबका समादर होता है। निरादर और निरपराध को दंड देना यहाँ की संस्कृति नहीं है। यह काशी ही है जहाँ राज्य और राष्ट्र के ही नहीं पूरे विश्व के नाथ विश्वनाथ का रहवास है। यह शहर मोम का नहीं है, ‘अप्पो दीपो भवः’ का है। यह शहर लुकाठी लेकर बाज़ार में खड़े कबीर का है। यह शहर मंदिरों के घंट-घड़ियाल और घाट का जितना है उतना ही भारत माता मन्दिर का। यहाँ लोग हर सम्प्रदाय के हैं; लेकिन सम्प्रदायिक कोई नहीं है। नई पीढ़ी विशेषतया युवा पीढ़ी को यह मान-सम्मान बरकरार रखनी चाहिए। भाषा के धनी इस शहर को कवि दुष्यंत की यह पंक्ति व्यवहार में दुहरानी चाहिए-‘मेरे सीने में न सही, उसके सीने में सही; हो गई है पीर पर्वत सी बस पिघलनी चाहिए।’। वर्तमान चुनावी माहौल में यदि प्रतिपक्षी की ताकत और तादाद लगातार बढ़ रही है, तो उस से डटकर मुकाबला करना चाहिए। क्योंकि ऐसी घिनौनी कवायद से हम काशी की परम्परा, संस्कृति और विरासत को धूल-धूसरित ही करेंगे। विप्रजन/भद्रजन आप चुप क्यों हो?

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