आँख के बारे में: राजीव रंजन प्रसाद का अनुसन्धान रिपोर्ट

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(Eye-Dwell Communication : Around the Eye)

कुछ नोट्स

-आँखें स्कैनिंग मशीन से अधिक ‘पावरफुल’ और ‘रिएक्टिव’ होती हैं....
-हर घटना हमारे दिमाग में तारीख़वार दर्ज होती हैं....
-हमें सम्पर्क में जो कुछ हासिल है...सबकुछ हमारे संज्ञान-बोध का हिस्सा है...
-वे तमाम क्रियाएँ जिसमें शारीरिक क्रियाशीलता शामिल हैं...आँख उन सभी की ‘रिज्यूमे’ तैयार करती है....
-आँखें झूठ का सबसे अधिक प्रतिवाद करती हैं....
-आँख का प्राकृतिक संकल्प या कहे मूल प्रवृत्ति है-सच का उद्बोधन....
-आँखों के माध्यम से पिछले सभी सच बासबूत जाने जा सकते हैं.....
-आँखें मुहावरा नहीं गढ़ती हैं, लेकिन भाषा के मुहावरों से बखू़बी परिचित होती हैं....

इसीलिए शायद हमारी आँखें सबसे अधिक बोलती हैं, भारत के लोक-माधुर्य के कवि बिहारी कहते हैं:


 ‘‘कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे मौन में करत हैं, नैनन ही सों बात।।’’

मित्रो,

आपके समक्ष अपना शोध-पत्र प्रस्तुत करना मेरे लिए एक सुअवसर है।
आपसभी को अभिवादन!

आँख हमारी ज़िन्दगी के बहुत करीब है। या यों कह लें कि हमारी ज़िन्दगी आँख के सर्वाधिक निकट है। हम जानते हैं और यह मानते भी हैं कि दुनिया की सारी चीजें आँख से दिखती है और स्मृति में टंक जाती है। इस टंकाव का सीअन कमजोर नहीं होता है। जैसे झमठार पेड़ की जड़े मिट्टी के गहरे तल में अपनी रिश्तेदारी कायम रखती हैं कुछ-कुछ उसी तरह आँखें इस दुनिया-परिवेश से अपने सम्बन्धों को सुमधुर बनाए रखती हैं। शरीर में बहुत सारे अंग है जिनके रोगग्रस्त होने पर हमारे जीने के रंग फीके पड़ जाते हैं कई बार जान पर भी आ बनती है। यानी हमारे शरीर का अंग-प्रत्यंग सब महत्त्वपूर्ण है; लेकिन, दुनिया को जानने-समझने की लिए आँख सबसे उपयुक्त माध्यम है...इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।

मेरा शोध-पत्र इसी विषयवस्तु की परिधि में आपसे संवाद करने का इच्छुक है।

मित्रो,

मेरा स्पष्ट मानना है कि एक व्यक्ति चाहे वह किसी वय का हो....उसके आँख ने
अबतक जो कुछ देखा है वे सबकुछ उसके दिमाग में सुरक्षित हैं। जैसे आप कोई सामग्री ‘डिलिट’ कर देते हैं, तो भी वे आपके ‘सिस्टम’ से नहीं जाती हैं...तकनीकी जानकार उसे भी जो ‘डस्टबीन’ से ‘गेटआउट’ की जा चुकी हैं....उन्हें खोज निकालता है।

आँखों के साथ भी यही प्रक्रिया चलती है। अनवरत। अहर्निश। निरन्तर।

आपकी आँख ने कोई मृत्यु देखा हो, किसी को चोरी करते देखा हो, भगदड़ होते देखा हो...या कोई भी ऐसी चीज जिसकी तीव्रता, गति और प्रभाव मनुष्य के सम्पर्क-क्षेत्र के दायरे में आता हो...उसे हमारी आँखें अनबोले-अनकहे ढंग से अपने दिमाग में कैद कर लेती हैं। अचेतन, अर्द्धचेतन और चेतन की सामूहिक क्रियाशीलता चाहे कितनी भी परदेदारी कर ले, लेकिन उसे जाना-देखा कभी भी जा सकता है।

मित्रो,

इस दिशा में चैंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। ‘लाई डिटेक्टर’ की अवधारणा आज चलन में है। यह शरीर से प्राप्त संकेतों के आधार पर झूठ पकड़ने में हरसंभव मदद करती है। हमें ‘आई डिटेक्टर’ से यह जानने में आसानी होगी कि जिस घड़ी यह घटना घटी...उस समय सम्पर्क-क्षेत्र में शामिल लोगों की आँखें अपने दिमाग को क्या संकेत दे रही थीं? दृश्य-बिम्बों को वे दिमाग के स्तर पर कैसे चित्रित कर रही थी। चित्रण की विधा कौन-सी रही होगी? यानी म्यूरल, पोट्रेट, पेंटिग या कुछ और।

समय की बेहद कमी की वजह से मुझे अपनी बात तीन मिनट में ख़त्म करनी पड़ रही है। आशा है, इन बिन्दुओं पर आप सभी गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे...हो सकता है हम आने वाले भविष्य को सकरात्मक ढंग से बदलने में आँखों को भी एक जरूरी योद्धा के रूप में शामिल करें।
आप सभी को धन्यवाद!

प्रस्तुतकर्ता
आर्जीव
माॅडरेटर: यूनिवर्सिटी आॅफ सेल्फ



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