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Showing posts from November, 2015

नदी

भाषा, संस्कृति औ समयचक्र पर किताब लिखना मुश्किल नहीं है, मुश्किल है जितना स्वयं को समझना। और राजीव रंजन प्रसाद यह ढोंग-प्रपंच करें इससे अच्छा है उसे गोली मार दी जाए।
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उस दिन हम-तुम एक नदी के किनारे बैठ गए। घंटो बाद हमने एक-दूसरे को देखा। मुसकाए। फिर खामोश हो गए। नदी बहती रही। शांत, बिल्कुल स्थिर-चित्त। ऐसा क्यों होता है प्रायः। फुरसत के क्षणों में हमारे भीतर आवाज़ ही नहीं होती। हम दोनों इस मामले में बददिमाग हैं। इस तरह कहीं होता है, हम साथ हों; पर बात न हो। वह भी घंटों चुपचाप वक़्त गुजर जाने दें। लम्हा-दर-लम्हा। यह कौन-सा सुकून और इंतमिनान है जो मौन को सिराहने रख जि़न्दा होता है।
मैं नहीं बोलता, ठीक; तुम क्यों नहीं बोलती। कोई भी या कैसी भी बात क्यों नहीं शुरू करना चाहती तुम। और कुछ नहीं, तो नदी के बहाने कुछ कहना चाहो। आस-पास बजते सुमधुर संगीत के सहारे कुछ कहना चाहो। और कुछ नहीं तो पूछ लो सही, ‘क्या सोच रहे हो....,’
यार! इस मुल्क में राजनीति के आगे भी जि़ंदगी है, बहारें हैं, तो और ऐसी ढेरों बात जो अख़बार के ख़बर की तरह झूठी, गलाबाज और भ्रामक नहीं है। टेलीविजन की तरह नकली…

ओसिगा: गल्प में नवग्रह

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ओसिगा एक ग्रह का नाम है। इस ग्रह पर बसी आबादी बहुत अधिक तो नहीं; लेकिन तकरीबन साढ़े पाँच लाख है। लोग धरतीनुमा नगर-महानगर या गाँव-कस्बे की जगह गुफाओं में करीने से रहते हैं। उनकी सज-धज से आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता लजा जाए। ओसिगा की भाषा और लिपि सांकेतिक और चित्रात्मक है। ध्वनियों का बहुत कम इस्तेमाल होता है। मूक भाषा-प्रयोग के पीछे मुख्य वजह आॅक्सीजन की मात्रा का वायुमंडल में कम होना है।
यहाँ की साम्राज्ञी आनियो आना हैं। उनकी देा बेटियाँ हैं। बड़ी का नाम आना ओरि है, तो छोटी का नाम आनो आया। दोनों साम्राज्ञी की बेटी होने का तनिक गुरूर नहीं रखती हैं। वह सबसे सामान्य व्यवहार करती हैं और लोग भी उसी तरह उनसे लाड़पूर्वक बातचीत करते हैं। वह अन्य बच्चों से जरा भी विशेष नहीं दिखाई देती हैं। यह खासियत वहाँ के राजशाही के चरित्र को दर्शाता है जिसमें वह कायदे से रचे-बुने गए हैं।
ओसिगा में जनतंत्र है और लोग सामूहिकता को वरीयता देते हैं। खून-खराबा का नामो-निशान नहीं है तथा प्रकृति ही एकमात्र देवता है। खान-पान में हरी पतियों का प्रयोग सर्वाधिक होता है जिन्हें वे उबाल कर खाते हैं। वह वि…

मेरी गौरेया

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पढ़ती है गौरेया
कहाँ अक्षर.....?
लिखती है गौरेया
कहाँ लिपि.....?
भाषा और माध्यम की भेद भी
कहाँ जानती है गौरेया?
मेरी गौरेया
नहीं माँगती है दाना-पानी के सिवा कुछ भी ‘एक्स्ट्रा’
अपने लिए, खुद के लिए
पिछले 12 सालों से मेरी गौरेया
मेरे साथ है
और मैं अपनी गौरेया से बेफिक्र
सुबह से शाम तक
आरम्भ से अनन्त तक
लस्त-पस्त हूँ
अक्षर, लिपि और भाषा में
आज गौरेया ने पिराते मन से कहा है-
यह बियाबान जंगल
जिससे तुम आदमी होने की तमीज सीखते हो
जार दो, फेंक दो, बहा दो पानी में
और उड़ चलो आकाश में
उस असली राह पर
जहाँ रोशनाई रहती है
अनन्त...अनन्त....अनन्त बनी हुई!!
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-राजीव रंजन प्रसाद