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केदारनाथ अग्रवाल, देश और कविता

ज़िन्दगी 
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http://kabaadkhaana.blogspot.in/2013/08/blog-post_2.html

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
थान खद्दर के लपेटे स्वार्थियों को,
पेट-पूजा की कमाई में जुता मैं देखता हूँ!
सत्य के जारज सुतों को,
लंदनी गौरांग प्रभु की, 
लीक चलते देखता हूँ!
डालरी साम्राज्यवादी मौत-घर में,
आँख मूँदे डाँस करते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
मैं अहिंसा के निहत्थे हाथियों को,
पीठ पर बम बोझ लादे देखता हूँ.
देव कुल के किन्नरों को,
मंत्रियों का साज साजे,
देश की जन-शक्तियों का,
खून पीते देखता हूँ,
क्रांति गाते देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
राजनीतिक धर्मराजों को जुएँ में,
द्रोपदी को हारते मैं देखता हूँ!
ज्ञान के सब सूरजों को,
अर्थ के पैशाचिकों से,
रोशनी को माँगते मैं देखता हूँ!
योजनाओं के शिखंडी सूरमों को,
तेग अपनी तोड़ते मैं देखता हूँ!! 

देश की छाती दरकते देखता हूँ!
खाद्य मंत्री को हमेशा शूल बोते देखता हूँ
भुखमरी को जन्म देते,
वन-महोत्सव को मनाते देखता हूँ!
लौह-नर के वृद्ध वपु से,
दण्ड के दानव निकलते देखता हूँ!
व्यक्ति की स्वाधीनता पर गाज गिरते देखता हूँ!
देश के अभिमन्युयों को कैद होते देखता हूँ!! 

देश की छाती…

मेरी वाणी / देम्यान बेदनी

http://kavitakosh.org/kk/
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मैं गाता हूँ
किन्तु क्या मैं वास्तव में गाता हूँ

मेरी वाणी ने पहचानी
संघर्षों की दुर्दमताएँ
प्रत्येक पृष्ठ पर सीधी-सादी
हैं मेरी कविताएँ

चकाचौंध में मौन
मगन जो आनन्दों में
ऎसे चिकने-चुपड़े श्रोताओं के सम्मुख
वीणाओं की मीठी स्वर लहरी के नीचे
नहीं उठाता मैं अपनी कर्कश आवाज़ें
झिलमिल करते किसी मंच पर

मैं अपनी भर्रायी आवाज़ें वहाँ उठाता
जहाँ रोष ने
छल-छन्दों ने
अपना घेरा डाला
शापित भूतकाल ने अपने स्वर का
बे-हिसाब अनुचित उपयोग किया है

मैं नहीं मुलम्मा
कविता के प्रेरक तत्त्वों का
मेरी तीखी पैनी कविता

वेरा पावलोवा की कविताएँ

वेरा अनातोलियेव्ना पावलोवा
जन्म: 4 मई 1963 उपनाम वेरा पावलोवा जन्म स्थान मास्को, रूस कुछ प्रमुख कृतियाँ आसमानी जानवर (1997), दूसरी भाषा (1998), चौथा सपना (2000), हाथ का सामान (2005), भाषा के उस किनारे पर (2009) आदि कुल 18 कविता-संग्रह विविध अब अमरीका में रहती हैं। ------------------------- http://kavitakosh.org/kk
निर्रथकता का अर्थ / वेरा पावलोवा
हम धनवान हैं
हमारे पास कुछ भी नहीं है खोने को
हम पुराने हो चले
हमारे पास दौड़ कर जाने को नहीं बचा है कोई ठौर
हम अतीत के नर्म गुदाज तकिए में फूँक मार रहे हैं
और आने वाले दिनों की सुराख से ताका-झाँकी करने में व्यस्त हैं ।

हम बतियाते हैं
उन चीज़ों के बारे में जो भाती हैं सबसे अधिक
और एक अकर्मण्य दिवस का उजाला
झरता जाता है धीरे-धीरे
हम औंधे पड़े हुए हैं निश्चेष्ट -- मृतप्राय
चलो -- तुम दफ़्न करो मुझे और मैं दफ़नाऊँ तुम्हें।

बकाया राशि

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राजीव रंजन प्रसाद ----------
दो दिन हो गए दीवाली बीते। चमक के घर का बरामदा अल्पना से आज भी सजा है। घर में कोई चहलकदमी नहीं। दोनों बच्चे आनु और मीनू भी नहीं दिख रहे।

पड़ोस के लोग चमक के बारे में कई तरह की बातें कर रहे थे। दीवाली के दिन वह दीवाली की खरीदारी करने शहर गया था। पत्नी और बच्चे भी उसके साथ थे। उस दिन वह सुबह से खुश था। इस बार खेत में अच्छी-खासी प्याज पैदा हुई थी। पिछले हफ्ते लोगों ने उसे प्याज को ट्रेक्टर पर लादकर शहर ले जाते हुए देखा था। उसने कईयों को बताया था कि दीवाली के दिन उसे वाजिब रुपए मिल जाएंगे। मेहनती चमक किसी का अपने ऊपर कर्ज नहीं रखता था। इसलिए मनोहर को उसने पहले से कह रखा था, ‘दीवाली के दिन भाई तुम्हारे पैसे दे दूँगा।’

लेकिन चमक अचानक किसी को कुछ बताए बिना कहाँ चला गया। लोग आपस में चर्चा कर रहे थे कि अचानक ‘आकाश गिरने’ माफ़िक ख़बर फैल गई। सहज किसी को विश्वास न हुआ। चमक सपरिवार जान दे दिया था। उन सबकी लाश प्याज के ढेर में मिला।

बाज़ार समिति में ग्रामीणों की अफरातफरी मची थी। कोई कुछ कह नहीं पा रहा था। चमक ने मरने के लिए यही जगह क्यों चुना; यह बाद की बात थी।…

कविता : देखन में छोटन लागे, घाव करे गंभीर

विशेष सन्दर्भ: हिंदी कविता --------------  राजीव रंजन प्रसाद  ---  कविता लघुता में विराट का दर्शन करा सकती है, यदि पाठक सहृदय हो। सहृदयता समष्टि की सोच है जिससे यह सृष्टि विराजमान है। भाव-संवेग द्वारा इस शब्दज संसार को अनुभूत एवं अभिव्यक्त करना कविता का धर्म है। यहाँ धर्म का अर्थ धारिता से है यानी ग्रहण करने की क्षमता से। आजकल यहीं हम सर्वाधिक चुक रहे हैं। हममें ग्रहणशीलता का आवेग तो दिखाई देता है; किन्तु उसकी उपयुक्त पात्रता नहीं है। सबसे बड़ा पेंच यह है कि कविता को हमने एक ढर्रे की तरह देखना शुरू कर दिया है। उसके आने की गति तीव्र है। अब चूँकि आने वाली हर चीज ‘कविता’ घोषित कर दी जा रही है; इस कारण समस्या बढ़ी हुई है। मुर्दा आलोचकों पास ज़बान है, लेखन की तबीयत नहीं। जब तक हम लेखन के माध्यम से आलोचनापरक प्रतिपाद्य नहीं प्रस्तुत करते; अच्छी और बुरी कविता के बीच अंतर कर पाना आसान नहीं होगा। 
लिहाजतन, 'बिकाऊ कवि' कई बार सहृदय आलोचकों के अभाव में कवि बना रहता है क्योंकि वह अपने ‘कवि’ होने की घोषणा करता है। आजकल हिंदी में ‘कवि’ ऐसे हैं। वे कवि होने का ‘टैग’, ‘लेबल’, ‘बैनर’ आदि लटकाए फिर…

वाह! रजीबा वाह!

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बहुत दिन हुए
चिड़िया-चुरुगुन पर गीत लिखें
उन्हें गुनगुनाएँ

बहुत दिन हुए
खेत-खलिहान के बारे में सोचे
उसकी खोज-ख़बर लिए

बहुत दिन हुए
रात अंधियारे में
गाँव को याद किए

बहुत दिन हुए
पड़ोसियों के पास गए
उनका हाल-चाल लिए

बहुत दिन हुए
तार पर उकड़ू बने
कौए का पाँख देखे

बहुत दिन हुए
आरती में पैसे डाले
रामलीला में पाठ किए

बहुत दिन हुए
पुलिया पर बैठे
जमात में गपियाए

बहुत दिन हुए
जी भर रोए
आँखों की सुध लिए

बहुत दिन हुए
पापा के पैर छुए
मम्मी को अंकवारी लिए

बहुत दिन हुए
जिंदगी जिए
हीक भर बतियाए
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आइए साक्षात्कार लेना सीखें

सिनेमाइश्तहारनामाज़िन्दगीके’’ राजीवगाँधीविश्वविद्यालयकेसहायकप्राध्यापकतथासिने-आलोचकराजीवरंजनप्रसादसे वर्तमानसिनेमाकेबारेमें सांस्कृतिक-पत्रकारअभिमाकीसीधीबातचीत
----------------- राजीव गाँधी विश्वविद्यालय के प्रयोजनमूलक हिंदी के विद्यार्थियों के लिए प्रस्तुत: साक्षात्कार माॅडल-1 ------------------
भारतीयसिनेमाआजकिसपड़ावपरहै? वहबीतेज़मानेसेकितनाआगेहै? सिनेमाबीते