बकाया राशि

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राजीव रंजन प्रसाद
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दो दिन हो गए दीवाली बीते। चमक के घर का बरामदा अल्पना से आज भी सजा है। घर में कोई चहलकदमी नहीं। दोनों बच्चे आनु और मीनू भी नहीं दिख रहे।

पड़ोस के लोग चमक के बारे में कई तरह की बातें कर रहे थे। दीवाली के दिन वह दीवाली की खरीदारी करने शहर गया था। पत्नी और बच्चे भी उसके साथ थे। उस दिन वह सुबह से खुश था। इस बार खेत में अच्छी-खासी प्याज पैदा हुई थी। पिछले हफ्ते लोगों ने उसे प्याज को ट्रेक्टर पर लादकर शहर ले जाते हुए देखा था। उसने कईयों को बताया था कि दीवाली के दिन उसे वाजिब रुपए मिल जाएंगे। मेहनती चमक किसी का अपने ऊपर कर्ज नहीं रखता था। इसलिए मनोहर को उसने पहले से कह रखा था, ‘दीवाली के दिन भाई तुम्हारे पैसे दे दूँगा।’

लेकिन चमक अचानक किसी को कुछ बताए बिना कहाँ चला गया। लोग आपस में चर्चा कर रहे थे कि अचानक ‘आकाश गिरने’ माफ़िक ख़बर फैल गई। सहज किसी को विश्वास न हुआ। चमक सपरिवार जान दे दिया था। उन सबकी लाश प्याज के ढेर में मिला।

बाज़ार समिति में ग्रामीणों की अफरातफरी मची थी। कोई कुछ कह नहीं पा रहा था। चमक ने मरने के लिए यही जगह क्यों चुना; यह बाद की बात थी। सवाल था जी-तोड़ मेहनत करने वाला युवा चमक मर क्यों गया। शहरी लोग बता रहे थे। वह दो दिन तक बिना कुछ खाए-पिए प्याज की ढेर के पास बच्चे और पत्नी के साथ पड़ा था। कोई खरीदार न मिल पाने के कारण प्याज ज्यों कि त्यों पड़ी थी।

अंततः चमक के बारे में यह बुरी ख़बर मिली। पुलिस ने बताया कि उसकी हथेली पर लिखा था-‘मनोहर का 1529 रुपया बाकी है मुझ पर’।
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नोट: इस कहानी के लेखक भारत के केन्द्रीय विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और उन्हें मासिक 60, 000 रुपए तनख्वाह मिलती है।
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