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हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य पर विद्यार्थियों से दो बात

रजीबा की क्लास
भारतीय परिक्षेत्र से बाहर और भारत के सभी क्षेत्रों में हिन्दी बोले जाने वाली एक संख्याबहुल भाषा है। संख्याबहुल मतलब जिसे बहुत सारे लोग बोलते हैं; अपने भाव, विचार एवं दृष्टि में बड़ी आसानी से बरतते हैं। यह सहजता हिन्दी भाषा की खूबसूरती है यानी प्राणतत्त्व। हिन्दी भाषा की लिपि देवनागरी है। हिन्दी लिखावट और उच्चार दोनों में सादृश्यता रखती है। इस भाषिक वैशैष्टिय के कारण यह बेहद सुघड़ और सजीव हुआ करती है। देखिए, दुनिया की हर भाषा से मनुष्य की लगाववृत्ति जन्मजात होती है। भाषिक सामथ्र्य मनुष्य के मस्तिष्क में जन्मना कूटीकृत होते हैं। भाषा-अर्जन की प्रवृत्ति मनुष्य में इसी कारणवश है। भाषा का शाब्दबोध एक अर्थपूर्ण इन्द्रधनुष रचता है। रूपबोध, रंगबोध, गंधबोध, ध्वनिबोध आदि का मूल कारण भाषा है। अनुभूति और अभिव्यक्ति में फांक, फर्क अथवा फेरफार को भाषा ही जतलाती है, संकेत करती है। भाषा दुविधा एवं द्वंद्व निवारण की दवा है। यह एक प्रयुक्तिजन्य औजार है, एक मानवसुलभ सुविधा है।
भाषा के माध्यम से मनुष्य प्रकृति के विभिन्न रूपों, प्रकृति की विभिन्न गतियों, प्रकृति की विभिन्न मुद्राओं का सफल …

नवजागरण के अंतःद्वीप

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(रजीबा की क्लास)
नवजागरण की असल ताकत का अंदाजा लगाने के लिए कुछ प्रवृत्तियों पर ध्यान देना आवश्यक है। यथा: 
ब्रह्मसमाज-सुधारवादी दृष्टिकोण,  भारतेन्दु हरिश्चन्द्र: देशज भाषा का प्रताप आर्यसमाज-तार्किकता, ज्योतिबा फुले-कर्मकाण्ड विरोध,  विवेकानंद-आध्यात्मिक अन्तर्भावना का उद्बोधन श्री अरविन्द: अतिमानस की सहजानुभूति रवीन्द्रनाथ टैगोर: अंतःअनुशासनिक एवं अंतःप्रेरित राष्ट्रवाद तिलक-तेजस्विता,  गांधी-विनयशीलता,  भगत सिंह-क्रांतिधर्मिता,  प्रेमचन्द-गतिशील जीवनदृष्टि, अम्बेडकर-अस्पृश्यता निवारण 
उपर्युक्त चुनिंदा कारकों को बौद्धिक दृष्टि से ‘अंडरस्टिमिट’ किया जाना अमानुषिक होने का परिचायक है। अतः आइए इस पर समग्र विचार-दृष्टि से बात करें। हम प्राचीन परम्परा के पोषण में प्रवृत्त (अंध)तत्वों अथवा सनातन धर्म के (अंध)अनुकरणकर्ताओं पर बिना गंगाजल उलीचे उन कारकों की पहचान करें जिससे नवजागरण की मुकम्मल पहचान बनी। बौद्धिक जागरण, स्वतन्त्रता की आकांक्षा, सुधारवादी दृष्टिकोण एवं लोककल्याणकारी वैचारिकी का उत्थान-उत्कर्ष सही मायने में संभव हुआ। इसके लिए आलोचकीय अनुशासन जरूरी है। विवेक-विक्…

अध्यापक

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एक घण्टे की कक्षा। आफ़त जबर्दस्त। विद्यार्थी चाव से सुनते हैं। उनके अनुभूति और अभिव्यक्ति में अंतराल है। बीच-बीच में बतियाने की कोशिश। उन्हे जानने का प्रयास। वह कुछ बोले, तो जानें। बाकी सब सुघड़। मनोरम। अति उत्तम। मैं छात्रों को नया दे पा रहा हूं, कह पा रहा हूं...यह बाद की बात है। लेकिन इतना सीखा कि अध्यापक बोलने से पहले अंतहीन कठिनाइयों से जूझना सीखता है। बिना सीखे वह सीखा ही नहीं सकता। कुछ दे ही नहीं सकता।