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Showing posts from September, 2013

‘इस बार’ बंद

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तकलीफदेह इस समय में मैंने ‘इस बार’ में खूब लिखा। शब्द से पेट नहीं भरते। भाषण से अन्याय खत्म नहीं होते...कविता-कहानी से आदमी का कल्याण नहीं हो सकता....यह सब सुनते-समझाए जाते हुए।

लेकिन, ‘इस बार’ बंद कर रहा हूँ। एक तो मैं तकनीकी अ-जानकारी की वजह से पाठकों को न जोड़ सका और यदि कोई आया भी तो उन्हें प्रभावित न कर सका।

ऐसे में मैं ‘इस बार’ बंद कर औरों की आँख में झाँकना चाहता हूँ कि वे आखिर कैसे रच रहे हैं , शब्दों की दुनिया....बना रहे हैं भाषा के डैने...हमारे उड़ने के लिए।

सबसे अधिक माफी अपने देव-दीप से.....आपदोनों को चिट्ठी लिखते हुए मैंने अपने बचपन को जिया...अपने पापा की चिट्ठी से ‘रेस’ की जो आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं।

इस नई दुनिया ने काफी कुछ खा-चिबा डाला....मेरे पापा अब मुझ चिट्ठी कहाँ लिखते हैं....मम्मी किसी त्योहरी में चिट्ठी के साथ 100 रुपइया कहाँ भेजती हैं......,

खैर, ‘इस बार’ बंद कर रहा हूँ ताकि तल्लीनता से लगकर अपने और अपने घरवालों का सर उठाने लायक कुछ कमाई-धमाई कर सकूँ....मम्मी की भाषा में...कुछ ढंग का काम-वाम।

शुक्रिया!


प्रिय देव-दीप,

हमारी आँखें बाहर के दृश्यों को खूब से खूब 1/10 भाग ही देख पाती है। नेत्र का दिखाव-क्षेत्र सीमित मात्रा में प्रकाशीय कणों को ग्रहण करता है। इसलिए हमारे मानस में बनने वाले दृश्यबिम्ब चयनित/प्रतिनिधि होते हैं। इसी तरह ‘वाक्’ में हम जितना सोचते हैं; उसका कुछ हिस्सा ही अभिव्यक्त हो पाता है; शेष अव्यक्त ही रह जाते हैं। यह अनदेखा दृश्य अथवा अव्यक्त वाणी एक दिन बचावट की बड़ी ढेर बनकर हमारे ही सामने आ खड़ी होती हैं। यह सब हमारे अचेतन का हिस्सा है।

बच्चों, इसी तरह सुनावट की प्रक्रिया घटित होती है। हम जो सुन पाते हैं वे तो एक अंश मात्र हैं; बहुलांश तो अनसुना ही रह जाते हैं। जिन आवाजों को हम नहीं ग्रहण कर पाते हैं, उन्हें प्रकृति अपने संज्ञान में सुरक्षित कर लेती है। यह प्रकृतिगत अचेतन का हिस्सा है। प्रकृति बहुविध आवाजों को न सिर्फ ग्रहण करती है; बल्कि उसे तरंगों में रूपान्तरित कर ब्राह्मण्ड में विस्तारित कर देती है। ये तरंगत्व नाद-अनुनाद के रूप में हमें पूरे जगत में फैले मिल सकते हैं। इस फैलाव में विद्युत्व और चुम्बकत्व दोनों पर्याप्त मात्रा में विद्यमान होते हैं।

बच्चों, तुमदोनों …

राहुल गाँधी का नाॅनसेंस बयान....न्यूज़ चैनल उड़ा रहे कबूतर

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कांग्रेस(आई) राजनीतिक पार्टी है। इस पार्टी के नेता हर तरह के स्टंट करने में माहिर हैं।

नये-नये उपाध्यक्ष बने राहुल का स्टंट आप सबके सामने है। दागी राजनीतिज्ञों से सम्बन्धित अध्यादेश पर उनका बकवास बोल न्यूज़ चैनलों पर फड़क रहा है। इस बयान में वे जिस अध्यादेश को फाड़ने के लिए कह रहे हैं, यह बात जनता उसी दिन से कह रही है; राहुल ने अपने कान में अभी तक ठेपी लगा रखा था।

युवा राजनीतिज्ञ राहुल गाँधी से पिछले सालों में जनता की उम्मीद यह रहती थी कि वे बोलें, तो सबसे पहले बोलें....साफ और निष्पक्ष बोलें....या फिर बिना बोले सारा कुछ साफ और निष्पक्ष करें। लेकिन उन्होंने आज तलक सबकुछ जनता के चाहे के उलट कहा और किया है।

राहुल गाँधी का आज का बयान पूरी तरह पूर्व-नियोजित ‘स्टंट’ है। उसी तरह जैसे यूपीए सरकार एक तरफ अनावश्यक खर्चों में भारी कटौती करती है; दूसरी ओर, सातवें वेतन आयोग की घोषणा कर अपने सहज-बुद्धि का कचूमर निकाल देती है। दरअसल, यूपीए के खातेनामे में दागियों, अपराधियों, भ्रष्टाचारियों को प्रश्रय देने का …

अर्पणा हाउस उर्फ अपलाइन रोड 36

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वह ट्रेन हर रोज प्लेटफार्म नंबर 1 से दिल्ली को रवाना होती थी।

पिछले दिसम्बर की 24 तारीख को दिन सोमवार था। एस-4 कोच में दिल्ली जाने को बैठी स्काॅलर अर्पणा किसी हड़बड़ाहट में नहीं थी।

अर्पणा अपने हाॅस्टल की बाॅलकोनी में खड़े होकर मोबाइल से ही ‘रेडियो मिची’, ‘रेडियो मंत्रा’...इत्यादि खूब सुना करती थी। इस वक्त भी सुनने में जुटी थी।

अर्पणा पिछले पाँच सालों तक प्रेम करती रही थी। इज़हार आज किया था कम्बख़्त ने।

‘मैं बीएचयू छोड़ रही हूँ पापा...मुझे बुरा लग रहा है। लेकिन यह करना होगा।’

समय दिलचस्प कहानियाँ बुना करती हैं। इस बुनाव में पारिवारिक-सामाजिक तागे काम आते हैं। अर्पणा खुद इन्हीं तागों से बुनी थी। अर्पणा का काम तो उन तागों का रंग-रोगन करना मात्र था। उसे वह बड़ी ईमानदारी से कर भी रही थी कि ये स्साली ज़िंदगी.....!

मन साथ न दें, तो चीजें ऊब पैदा करने लगती हैं।

अर्पणा एफ. एम. रेडियो बंद कर ली। काफी देर तक ओठंगी रही। सामने तीन साल की एक प्यारी बच्ची थी। बर्थ पर उसके नन्हें-नन्हें पाँव कुदक रहे थे। अर्पणा उस बच्ची के बजते हुए पायल की आवाज़ में खोई थी। अर्पणा ने गौर…

आँख के बारे में: राजीव रंजन प्रसाद का अनुसन्धान रिपोर्ट

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(Eye-Dwell Communication : All things caring out with Eye)

कुछ नोट्स

-आँखें स्कैनिंग मशीन से अधिक ‘पावरफुल’ और ‘रिएक्टिव’ होती हैं....
-हर घटना हमारे दिमाग में तारीख़वार दर्ज होती हैं....
-हमें सम्पर्क में जो कुछ हासिल है...सबकुछ हमारे संज्ञान-बोध का हिस्सा है...
-वे तमाम क्रियाएँ जिसमें शारीरिक क्रियाशीलता शामिल हैं...आँख उन सभी की ‘रिज्यूमे’ तैयार करती है....
-आँखें झूठ का सबसे अधिक प्रतिवाद करती हैं....
-आँख का प्राकृतिक संकल्प या कहे मूल प्रवृत्ति है-सच का उद्बोधन....
-आँखों के माध्यम से पिछले सभी सच बासबूत जाने जा सकते हैं.....
-आँखें मुहावरा नहीं गढ़ती हैं, लेकिन भाषा के मुहावरों से परिचित होती हैं....

इसीलिए शायद हमारी आँखें सबसे अधिक बोलती हैं, भारत के लोक-माधुर्य के कवि बिहारी कहते हैं:

 ‘‘कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे मौन में करत हैं, नैनन ही सों बात।।’’

आदरणिय महोदय/महोदया

आपके समक्ष अपना शोध-पत्र प्रस्तुत करना मेरे लिए एक सुअवसर है।
आपसभी को अभिवादन!

मित्रो,

आँख हमारी ज़िन्दगी के बहुत करीब…

चींटी का साहस

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----------------- कई दिनों से धूप नहीं निकले थे। बुढ़ा पेड भूखा था।

देव-दीप, तुमदोनों को तो पता ही है कि धूप में ही पेड़ की पतियाँ खाना बनाया करती हैं। धूप नहीं, तो समझों पेड़ों के घर में सुख-साधन नहीं। उनकी पतियाँ धूप के इंतजार में रसोई में बैठी रहती हैं। अब तुम्हीं बताओ कि मैं अगर कुछ खरीदकर न लाऊँ, तो तुम्हारी मम्मी कुछ बना पाएगी।

देव और दीप मुझे टुकुर-टुकुर देखते हैं।

बेटे, बुढ़ा पेड़ जिस रजवाड़े की ज़मीन पर था। उस प्रदेश का राजा अपनी प्रजा का ही एक नहीं सुन रहा था। फिर बुढ़े पेड़ की क्या सुनता भला?

ऐसा क्यों पापा?-देव ने पूछा।

बेटे, सुनने के लिए सिर्फ आवाज़ नहीं चाहिए होती है। दिल और दिमाग भी कोई चीज है। यदि यह राजा के पास न हुआ, तो उसे कुछ भी नहीं दिख सकता है। आजकल राजा ऐसे ही होते हैं। कहने को तो अब आदमी का राज है। लेकिन, आजकल आदमी का आदमी, आदमी की ही एक न सुन रहा है।

पापा, उस पेड़ को खाना कैसे मिला-देव जिज्ञासा से पूछा।

बेटे, बुढा पेड़ विचारमग्न था। वह सोच रहा था कि कुछ तो उपाय करने ही होंगे। ऐसे तो मरने की नौबत आ जाएगी।

खाना न खाने से हम भी मर जाएंगे-देव ने कहा

हाँ, बेटे! लेक…

पार्टी कार्यकर्ता

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पार्टी का राजतंत्र
जिस किसी को चुन लेता है
वास्तविक चुनाव वही है

पार्टी का आलाकमान
जिस किसी को कर देता है नामित
असली चुनाव वही है

उम्मीदवार चुनने में
जनता का मत स्वीकृत नहीं है
अधिकार तो उन टोपीदारों को भी नहीं है
जो सालो भर पार्टी का झण्डा-बैनर ढोते हैं
किसी आयोजन में
कुर्सीया बिछाते, पोंछते और बटोरते हैं
पार्टी-आवाज़ पर बिन खाए-पीए रेंकते हैं
दौड़ते, भागते और धुँआधार खटते हैं

जबकि उनका अपना घर टूटा है
छत लम्बा-लम्बा चूता है
सीढ़ियाँ जर्जर है
खेत बंजर है
बिटिया सयानी है
बिटवा जवान है
तब भी ज़बान पर
‘पार्टी नेता’ का ही नाम है

इस बार फिर
चुनावी रस्म निभाना है
गीतगउनी बन ‘पार्टी गीत’ गाना है
‘फँलाने’ को जिताना है
‘चिलाने’ को हराना है
अपनी टूटही साईकिल छोड़
चरचकिया पर आँख नचाना है

इस बार फिर
हूमचना है, गरियाना है
‘सरउ तेरी त...’ कहते हुए
विपक्षी से लपटना है
बतचप्पों में निपटना है

वे पार्टी कार्यकर्ता हैं
उन्हें ताज़िदगी यही सब करना है।

शामली: द स्पाइडर गर्ल

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यह कहानी प्रेम की है...प्रेम-प्रसंग की नही।

उस दिन वह नीले रंग की बटनदानी वाली कुर्ती पहने हुए थी। परिधान उस पर जम रहे थे। वह आकर्षक लग रही थी। लड़कियाँ जब आकर्षक लगती हैं, तो मन के भँवरे अपनी आवाज की ट्यून बढ़ा देते हैं। मुझे अपने भीतर के भँवरों की गुनजाहट साफ सुनाई पड़ रही थी। ये भँवरे डोरे डालने वाले नहीं थें, लेकिन थे तो भँवरे ही।

शामली ने आते ही मुझे दस हजार रुपए थमाए थे।

‘‘इतनी जल्दी थी....,’’

‘‘हाँ...,’’ छोटा सा, लेकिन प्यारा-सा जवाब।

मैं और शामली चाय की दूकान से चाय लेकर घुटकने लगे। वह बड़ी मुश्किल से अपना नया सूट दिखाते हुए कुछ बोली थी।

मैं शामली को सुन रहा था। इस सुनाहट में ताजगी थी।

‘‘पापा निक हो गए हैं, माँ भी खुश है। लोग आजकल हरी सब्जियाँ बिना कहे ले आते हैं...कभी शक्कर और मसाले भी।’’

मैं शामली को देख रहा था। उस शामली को जिसने एक तिनके के सहारे खुद को बदल देने का ज़ज्बा दिखाया था।
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शामली जिसकी उम्र 26 साल है; यही कोई तीन माह पहले मुझे मिली थी।

वह बड़ी थी, लेकिन इतनी भी बड़ी नहीं कि मैं उसे अपनी छोटी बहन न कह सकूँ। शामल…

बर्फपात

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आसमान के बरास्ते
यात्रा कर
लम्बी दूरी तय कर
पहुँचता है बर्फ
मेरे पास
मैं दोहरा हो जाता हूँ
खुशी से मुटा जाता हूँ

जब भी आता है बर्फ
बर्फपात के दिनों में
मेरी हथेली पर
उसके आँख में चमक
और मेरे चेहरे पर मुसकान होती है
मैं पुकारता हूँ
-आ गए बर्फ
बर्फ प्रसन्नभाव से कहता है
-हाँ राजीव!

एक बात
मैंने नहीं पूछा कभी
बर्फ तुम्हारे घर में
कौन-कौन हैं?
चाहकर भी नहीं
सोचकर भी नहीं

मैं नहीं पूछ पाया कभी
बर्फ तुम्हारे देश में
चिड़ियाँ ही उड़ती है आसमान में
या एरोप्लन, हेलिकाॅप्टर, लड़ाकू विमानें
तुम्हारे देश में नदियों में सिर्फ पानी ही बहता है
या खूनी समुन्दर भी हैं
जिसमें चलते हैं
जंगी बेड़ों के युद्धवाहक पोत

मैंने नहीं जानना चाहा कभी
क्या तुम्हारे देश में भी नेता चुनावी दौरा करते हैं
और भाषण देते हैं, सुशासन का, रामराज्य का
वैसे पूछना अवश्य चाहिए मुझे
कि वहाँ सरकार, लोकतंत्र, बाज़ार-व्यापार आदि में
धंधेबाजी, गुटबाजी, कब्ज़े और लूट की धाक किस हद तक अमानुषिक है?

इस बार
मैं सूची तैयार कर रहा हँू

मैं शान्तिपूर्वक पूछूँगा यह सब
यह जानते हुए कि
हमारे यहाँ शान्ति के रंग कम दिखते हैं
अपर…

सेमिनार-प्रस्तुति संग राजीव रंजन प्रसाद

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विषय : ‘वर्तमान युवा राजनीति: चित्तवृत्ति और लोकवृत्त'
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10 सितम्बर, 2013; समय: 3 बजे दोपहर बाद; हिन्दी विभाग


युवा राजनीति पर बात करना मेरे लिए भाषा में सत्याग्रह करना नहीं है।

राजनीति सिनेमा नहीं है कि इसका उद्देश्य या ध्येय मनोरंजन मान लें। राजनीति आदमी की भाषा में आदमी होने की वैध तहज़ीब है। विधान का एक ऐसा वितान जिसमें हर आदमी को अपने हिसाब से सोचने, बोलने और करने की स्वतन्त्र और समान छूट प्रदान की जाती है। इस छूट की तमाम अर्थच्छवियाँ हो सकती हैं; लेकिन इससे किसी को तकलीफ हो, नुकसान हो या वे सामाजिक चरित्र के लिए ख़तरनाक साबित हों...इसकी सख़्त मनाही है। ऐसी विडम्बनापूर्ण स्थिति में रोकथाम के लिए बीसियों तरीके हैं जिससे समाज अपनी राजनीतिक चेतना को उत्तरोत्तर बड़ा और समृद्ध करता है। बशर्तिया विधान-नायक जनता के बीच का आदमी हो। बीच का आदमी कहने का तात्पर्य सामाजिक संस्कार-व्यवहार से पगे उस आदमी से है जो अंतिम आदमी की खै़रख़्वाही के लिए फिक्रमंद होना जानता है। राजनीतिक फिकरे कसने या प्रतिस्पर्धी कहकहे लगाने की कुचेष…

व्यक्तित्व की भाषा

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अंग्रेजी में एक शब्द है-‘व्यक्तित्व’। लोकप्रिय और बहुचर्चित भी। इंटरनेट जो अक्षरों, शब्दों, वाक्यों, लिपियों, भाषाओं इत्यादि का खजाना है; में एक इंटर पर इफरात सामग्री(टेक्सट, इमेज, पीएडएफ, पीपीटी, आॅडियो, विडियो इत्यादि) मिल जाएंगे व्यक्तित्व के बारे में। वहाँ यह सूचना आसानी से मिल सकती है कि साधारण बोलचाल में प्रयुक्त शब्द ‘व्यक्तित्व’ को अंग्रेजी में ‘Personality’ कहा जाता है जो लैटिन शब्द ‘Persona’ से बना है। अपनी बोली में हम कुछ बोले नहीं कि सामने वाला व्यक्ति फौरन यह जान लेगा कि हम कैसे हंै? हमारे व्यवहार की प्रकृति क्या है? हमारा स्वभाव कैसा होगा? हम मिलनसार हैं या उजड्ड। अक्लमंद हैं या हमारे दिमाग में सिर्फ भूसा भरा हुआ है। कई बार तो हम किसी का हाव-भाव और हरकत देखकर यह सटीक अनुमान लगा सकते हैं कि फलांना व्यक्ति इस वक्त क्या सोच रहा है; उसके दिमाग में क्या चल रहा है। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष।

व्यक्तित्व का नाता हर आदमी के चाहे वह छोटा हो या बड़ा; देह और दिमाग दोनों से अंतःसम्बन्धित होता है। मन की हलचलों से, भाव-तरंगों से, सूझों से या फिर देखने-सुनने के उ…

प्रचारित ज्ञानकाण्ड नहीं है हिन्दी

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हमें अपने कल के कार्यक्रम('वर्तमान समय और हिन्दी भाषा' विषयक गोष्ठी) के लिए हिन्दी-विलापी ज़बानकारों की जरूरत नहीं है। ऐसे नकारे लोग कोई दूसरे नहीं हैं; वे हम ही में से हैं यानी हिन्दीभाषाभाषी शोधक-अन्वेषक; अध्यापक-प्राध्यापक, अकादमिक या राजभाषिक बुद्धि-सेनानी वगैरह-वगैरह जिनकी चेतना और संस्कार दोनों में से हिन्दी-भाषा के प्रत्यय, प्रतिमा, अनुभव, स्मृति, कल्पना, चिन्तन, संवेदन इत्यादि सब के सब गायब हो चुके हंै। इन दिनों हिन्दी-प्रदेशों में अंग्रेजी को ही ज्ञान के गहन प्रकाश के रूप में देखने का चलन बढ़ा है। इसे भूख-निवारण, कुण्ठा-निवारण, बेराजगार-मुक्ति, भाषाई-प्रतिरूप, चेतना-विकास और संस्कृति-बोध की वास्तविक, एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ कसौटी मानकर प्रचारित-प्रसारित करने वाले हमहीं-आपहीं जैसे ज्ञान-आयोगिया लोग हैं। क्या इस सचाई को हम झुठला सकते हैं कि आजादी के इत्ते बर्षों बाद भी भारत में बनी अंग्रेजी की एक भी धारावाहिक, वृत्तचित्र, सिनेमा आदि ने भारतीय जनमानस को आलोडि़त-आन्दोलित करने में…

वर्तमान भारतीय युवा राजनीति : चित्तवृत्ति और लोकवृत्त

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मान्यवर,

आपसी संवाद, बहस और विकल्प की अधुनातन संचेतना को लक्षित करते हुए भारतीय युवा राजनीति की चैहद्दी को ‘वर्तमान युवा राजनीति: चित्तवृित्त और लोकवृत्त’ विषयक राजीव रंजन प्रसाद की सेमिनार-प्रस्तुति के बहाने खुले विषय के रूप में प्रश्नांकित किया जा रहा है। सम्प्रति राजीव रंजन प्रसाद, हिन्दी विभाग में प्रो0 अवधेश नारायण मिश्र के मार्गदर्शन में ‘संचार और मनोभाषिकी(युवा राजनीतिज्ञ संचारकों के विशेष सन्दर्भ में)’ विषयक शोधकार्य में संलग्न हैं।

इस सेमिनार-प्रस्तुति के अन्तर्गत वर्तमान युवा राजनीति के दो पक्ष विचारार्थ प्रस्तुत हैं-1) चित्तवृत्ति और 2) लोकवृत्त। चित्तवृत्ति के रूप में युवा राजनीतिज्ञों के व्यक्तित्व, भाषा एवं व्यवहार से सम्बन्धित विभिन्न बिन्दुओं पर प्रकाश डाला गया है; वहीं लोकवृत्त के अन्तर्गत युवा राजनीतिज्ञों के राजनीतिक समाजीकरण, संभाव्य राजनीतिक संचेतना, नेतृत्व, निर्णय-क्षमता इत्यादि से सम्बन्धित विविध पक्षों पर सम्यक् विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत है।

आप सभी इस अवसर पर सादर आमंत्रित हैं!

स्थान: हिन्दी विभाग       मंगलवार: 10 सितम्बर, …

हमारा यह जीवन सिर्फ संज्ञा-सर्वनाम नहीं है....!

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(शोध-पत्र प्रस्तुति)

पश्चिम वाले हमारी ओर मुँह करके सूर्य-नमस्कार करते हैं;
और हम पश्चिम की ‘चियर्स लिडरों’ को देखकर आहे भरते हैं।
वे हमारी आस्था की ड्योढ़ी पर सर नवाते हैं,
हमारी पवित्र गंगा में घंटों खड़े हो कर जल ढारते हैं;
वहीं हम अपने देसी रेस्तरां में विदेशी डिश चखते हुए अपनी गर्लफ्रेण्ड को
शानदार ‘प्रपोज’ मारते हैं, या सड़कछाप मंजनूओं की तरह
उनकी स्कूटी पर बैठकर  हैंडिल सम्भाल रहे होते हैं।
वे देह की साँस से ऊब चुके होते हैं। हम पूरबवासी देह की साँस लेते हुए अपना जीवन-पबितर कर रहे होते हैं; हमारे घर की स्त्रियां भी ऐसा ही कुछ कर रही होंगी फिलहाल....!  धन-दौलत को दुनियादारी निभाने का जरिया मात्र मानते हैं; और हम अपने काले धन को सफेद करने के लिए अपने भगवान के दरबार में
सोने का कंगन, चेन, लाॅकेट, बिस्कीट, अशर्फी, गिन्नी.....बना रहे होते हैं।

महोदय/महोदया,

मानव-जीवन सिर्फ पश्चिम-पूरब या उत्तर-दक्षिण नहीं है।
हमारा यह जीवन हम-वे, मैं-तुम-वह भी नहीं है।
मैं स्पष्ट शब्दों में यहाँ अपनी बात रखना चाहता…