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Showing posts from August, 2015

इन दिनों

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मुझे हार्दिक प्रसन्नता है कि मैं आजकल ‘ककहारा’ सीख रहा हूं। गिनती एवं पहाड़ा। कई चीजें एकदम आरंभ से शुरू। इस दुनिया के बारे में, लोगों के बारे में...सबकुछ नएपन के साथ साध रहा हूं। लोगों ने कहा, इससे आपके सेहत में सुधार होगा। बाकी चीजें औरों के लिए छोड़ दीजिए।

शुक्रिया! आपसब मेरे प्रति कितने ईमानदार हैं, शुभेच्छू भी। मैं इस अहसास तले इस कदर दबा हूं कि आप सबकी सदाशयता के प्रति सिर्फ मौखिक रूप से कृतज्ञ मात्र हो सकता हूं।

मेरे जैसे एक औसत दरजे के विद्याार्थी को आपसब ने जो मान दिया है, उसे मैं शब्दों में अभिव्यक्त कर पाने में असमर्थ महसूस कर रहा हूं।

धन्यवाद!

सच

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जब आप जिद ठानते हैं, तो कई बार रिश्तों के महीन धागे दरकते हैं। लेकिन यदि नियत दुरुस्त हो, तो यह कोई खतरे की चीज नहीं है। मेरे अपने लोग इस नखरे को भी बर्दाश्त कर लेंगे।...वैसे भी मैं, तो कहकर धोखा देता हूं। मेरी धोखेबाजियां मेरे मनमर्जियों के हिसाब से चलती हैं। जैसे काशी छूट गया, तो छूट गया।

बस, यही और इतना ही अंतिम सच।

मेरे शोध-निर्देशक प्रो. अवधेश नारायण मिश्र

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मंचकला पूरा देह मांगती है और शोध हमारा पूरा मस्तिष्क। यह प्रो. अवधेश नारायण मिश्र ही कह सकते हैं और उन्होंने मुझे हमेशा कहा। इसी मार्गदर्शन ने हमें कभी अपने कर्मपथ से विचलित नहीं होने दिया; असभ्य एवं बदजुबान तो कतई नहीं। संस्कार पैदाइशी मन-मस्तिष्क और आत्मा से जुड़ी होती है; वह मेरे भीतर प्रो. अवधेश नारायण मिश्र ने देखी होगी; शायद इसीलिए मुझे बल देकर शोध में बने रहने को हमेशा प्रेरित किया। हर कठिनाई में भरपूर मदद की। आत्मा को सदा पवित्र एवं दिमाग को सक्रिय बनाए रखने की प्रेरणा दी। मेरे भीतर की खिन्नता और चिड़चिड़पन को देखा और मुझे इन सबसे हमेशा उबारा। आज मैं जो कुछ हूं और जिस रूप में प्रस्तुत्य हूं, प्रो. अवधेश नारायण मिश्र की ही देन और निर्मिति है।

आरोप, लांछन और कीचड़ कोई भी लगा सकता है, मैं भी।  मैं यह कह सकता हूं कि उन्होंने मुझसे खूब अधिक मेहनत कराया, कठिन शोध-प्रारूप तैयार कराया और शोध-विषयक कार्य एवं अन्तर्वस्तु इतना जटिल और चुनौतीपूर्ण दिया कि मुझे न सिविल सर्विसेज की तैयारी का मौका मिला और न एसएससी। दूसरे शोध-निर्देशक उदा…