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Showing posts from March, 2016

हाँ जी, हम अपनी भाषा बोलते हैं!

--------------------- राजीव रंजन प्रसाद

प्यारे मित्रो, 
भारत के सांविधानिक नक्शे में हिंदी भाषा राजभाषा के रूप में मान्य है। यह राष्ट्रभाषा है और सम्पर्क भाषा भी। राजभाषा यानी अंग्रेजी के सहप्रयोग के साथ राजकीय विधान, कार्यालयी काम-काज, अकादमिक लिखा-पढ़ी, ज्ञान-विज्ञान, अन्तरानुशासनिक-अन्तर्सांस्कृतिक प्रचार-प्रसार इत्यादि में सांविधानिक रूप से मान्यता प्राप्त एक वैध भाषा। वह भाषा जिसके बारे में भारतीय संविधान में अनुच्छेद 343 से अनुच्छेद 351 के अन्तर्गत काफी कुछ लिखित एवं वर्णित है। यही नहीं अनुच्छेद 120 में संसद में भाषा-प्रयोग के बारे में हिंदी की स्थिति स्पष्ट है, तो अनुच्छेद 210 में विधान-सभा एवं विधान-परिषद में हिंदी के प्रयोग को लेकर ठोस दिशा-निर्देश उल्लिखित है। वहीं सम्पर्क-भाषा कहने का अर्थ-आशय रोजमर्रा के प्रयोग-प्रचलन की भाषा; कुशलक्षेम, हालचाल की भाषा, आमआदमी के बोली-बर्ताव की भाषा। यह हमारी आय और आमदनी की भाषा भी है जिसे पारिभाषिक शब्दावली में इन दिनों प्रयोजनमूलक हिंदी कहा जा रहा है। अनुप्रयुक्ति की दृष्टि से यह नवाधुनिक क्षेत्र है जिनका महत्त्व एवं प्रासंगिकता हाल के दिनों…

अक़्स साथ हो तो अकेला नहीं होता आदमी

प्रिय देव-दीप,

आज होली है और तुमदोनों अपनी मम्मी, दादा-दादी और चाचा-चाची के साथ हो। खुश रहो। अपनी रंग में रंगों अपनों को। उन सब को जो तुम्हें हीक भर दुलारते हैं, प्यार करते हैं। मैं थोड़ा अभागा हूँ। खुशी के मौके पर तुमसब का साथ न होने या साथ छोड़ देने की मेरी बीमारी पुरानी है। मैं कभी यह समझ ही नहीं सका कि मुझे क्या चाहिए और क्यों चाहिए? तुमसब मेरे केन्द्र में नहीं रहे और जो चीजें केन्द्र में है उसकी परिधि मैं बना नहीं पा रहा हूँ।
देव-दीप, तुम्हारी मम्मी की मुझसे बड़ी शिकायत रही है कि मैं उसकी क्या...बच्चों का भी साथ नहीं देता। तुमदोनों बड़े हो गए और मुझे इस बात का अहसास तक नहीं। 2005 में देव तुम्हारा जन्म हुआ, तो इस सोच के साथ कि अब मैं तुम्हारी माँ को अकेला छोड़ सकता हूँ। वह मेरे बगैर तुम्हारा साथ पा खुश रह सकती है। यह कितनी खुश रही, मुझे नहीं पाता; लेकिन मैंने अपनी सोचावट के मुताबिक उसका साथ छोड़ा। 2006 में ग्रेजुएशन के बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्रयोजनमूलक हिन्दी पत्रकारिता विषय से परास्नातक परीक्षा वर्ष 2009 में उत्तीर्ण की। टाॅपर रहा। गोल्ड मेडेलिस्ट का तमगा मिला; लेकिन न…

नियति

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मैं अपनी भाषा में बोलता हूं और
ख़ारिज़ हो जाता हूं
यह और बात है सत्ता जो भाषा बोलती है
या जिस भाषा को बोलने का हु़क्म है उसे
मृत्यु के क्षण में
उसे उसकी भाषा में नहीं
हमारी भाषा में ही दफनाया और जलाया जाएगा!!!