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Showing posts from August, 2012

जि़न्दगी

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आकाश में
बादलों का आना
और फिर
मेघ बन बरसना

नदी में
जल का जुमना
और फिर
धार बन बहना

आओ तुम भी
जरा समीप मेरे
हम कल के लिए
मेघों से अंजुरी भर जल लेंगे
और नदियों से
अंजुरी भर धार

मुझे पता है
इस अंजुरी भर मात्रा में
जीवन का संपूर्ण द्रव्यमान होगा
पूरी गति
विश्वास करो मेरा
मैंने पढ़ा है
‘जल ही जीवन है’
और जीवन से इतर
हमें चाहिए भी तो नहीं कुछ!

युवा जनतंत्र : परिधि के भीतर और परिधि के बाहर

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जन-शोध का नव-स्तम्भ 'जन मीडिया/मास मीडिया'

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वर्तमान में दुनिया वेब-जगत के घेरे में है। जरूरी जानकारियाँ,
महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ और घटनाओं के त्वरित सन्देश तेजी से भौगोलिक सीमाओं
का अतिक्रमण कर रहे हैं। आज वेबपसंदी लोगों का अन्र्तजाल से याराना है।
टेक्सट, इमेज, ग्राफिक्स, एनिमेशन, आॅडियो, विडियो इत्यादि के साथ रोज का
उठना-बैठना है। समाचारपत्र और टेलीविज़न चैनल भी इसी होड़ में शामिल हैं।
उनका या तो नेट-संस्करण उपलब्ध है या फिर इसकी तैयारी में वे जीजान से
जुटे हैं। इस अहम बदलाव के बीच कुछ ऐसे जरूरी सवाल हैं जिनसे हमारा
समय-समाज सीधे मुठभेड़ करना नहीं चाहता है। टिककर सोचना उसकी भाषा में
समय की फिजूलखर्ची है। इसीलिए आज की वैचारिकी में सघनता और सुघड़ता नहीं
है सिवाए लिपापोती के। सामयिक पड़ताल और मूल्यांकन सूचनाक्रांत और सतही
हैं; किन्तु उनमें अन्तर्वस्तु विश्लेषण का वो दमखम नहीं है जिसका हम और
हमारा समाज दस्तावेजीकरण कर सके; आने वाली पीढ़ी के लिए
संरक्षित-सुरक्षित रख सके। जनपक्षधर मुद्दों का अवलम्बन न होने से
मीडिया-शोध की स्थिति उत्तरोत्तर चैपट हुई हैं। इस क्षेत्र में निजी या
संस्थ…