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Monday, November 22, 2010

भुलावे का इतिहास-भूगोल


जब मैं छोटी उम्र का था तो देश के भूगोल से परिचित था। चौहद्दियाँ ज़बानी याद थी। किस कोने में कौन-सा देश, खाड़ी और समंदर है, सब पता था। कोई पूछता तो आवाज़ के सुर-ताल बदल जाया करते। कहन-शैली में शोखी और गर्वीलापन इस कदर हावी हो जाता कि लगता जैसे मैं चाँद पर उतरा पहला अंतरीक्ष यात्री नील आर्म स्ट्रांग हँू। और सामने वाले को यह बताना चाहता हँू कि देखो मैंने अपनी हथेली चाँद के सर पर रख दी है। उस समय दिमाग की पोटली छोटी थी। पर उसमें इतिहास-भूगोल की बातें ढेरों अटती थीं। हिसाब की भी किताब थी जिसमें समकोण न्यूनकोण से बड़ा तो अवश्य था किंतु वह खुद अधिककोण से छोटा होता था। यह अंतर इतनी साफ थी कि काग़ज पर चाँद-मीटर रख कर मनमाफिक कोण बनाने में मुझे बेहद मजा आता। जब मेरी बढ़ती उम्र चार्ल्स डार्विन के ‘विकासवाद के सिद्धांत’ को पढ़ने की हुई तो लगा जैसे अब मैं सयाने होने के लिए अनुकूलित हो रहा हूँ। मेरे बोल के गंध और सोच की त्वरा में फर्क आ रहा है।
मुझे याद है, उस समय भी मेरा साबका राजनीति से नहीं पड़ा था। राजनीति की बात मैं नागरिकशास्त्र से समझा करता था। वैसे यह मेरे महत्त्व का विषय कभी नहीं रहा। इतिहास-भूगोल में मन इतना रमता कि इच्छा होती रमता जोगी बन जाऊँ। राजा प्रसेनजित के प्राचीन काल में अँगुलीमाल और गौतम बुद्ध के किस्से पढ़तकर रोमांचित हो जाया करता था। लगता कि काश! महात्मा बुद्ध मुझे भी ‘तोड़ो नहीं जोड़ो’ की तरह कोई शिक्षाप्रद उपदेश देते। ऐसा सोचने में मुझे मजा आता था, सो खूब सोचता और मन ही मन आह्लाद से भी भर उठता। इतिहास में यूरोपियन सिकन्दर और भारतीय राजा पुरु के लड़ाई वाले वृतांत भी मुझे खूब जमते थे। चक्रवर्ती सम्राट अशोक की ‘संघम् शरणम् गच्छामि’ वाली कथा भी रुचिकर लगती थी। मोहनजोदड़ो को मुर्दों का टीला कहा जाता है, यह बात जब पता चली तो मैंने अपने शमशान को भी मोहनजोदड़ो कहना शुरू कर दिया। साथी कहते कि किताबों का इतिहास बीता हुआ सच होता है। मैं सोचता तो फिर आदमी जो जी रहा होता है, वह क्या होता है? क्या वह किसी विषय के अन्तर्गत नहीं आता है? जवाब पाने की टोह में गुरुजी को टटोलता तो वह उलटे मुझे ही डपट दिया करते। उनके मुताबिक इतिहास-भूगोल भुलावे की चीज है।
लिहाजा, कक्षा में सायंस की धौंकनी में अयस्क पिघलाया जाता और लोहा अपकर्षण विधि से पुस्तकों से रट्टा लगाकर निकाला जाता। लेकिन यह किताबी ज्ञान मुझे सुहाती कम बौराती ज्यादा थी। खीज होती तो कह देता कि प्रकाश में सात रंग हैं, ये तो हम इन्द्रधनुष देखकर भी जान जाते हैं। आप कभी प्रिज्म से गुजारकर दिखाइए तब न जाने? मास्साहब की नज़रें टेढ़ी हो जाती और मेरी बोलती बंद। ये कुछ विशिष्ट कारण थे जिसने मेरे अंदर विज्ञान से लगाव कम अलगाव को ज्यादा प्रोत्साहित किया। सब कहते यह लड़का देखने में शांत भले हो किंतु दिमाग से छिछोरा है। इसके दिमाग की पटरी ठीक नहीं है।
देखिए, मैं कहते-कहते अपनी बात से फिसल गया। यह मेरी ही नहीं इस उत्तर आधुनिक समय-समाज की ही विडंबना है कि हम जो कुछ सार्थक ढंग से कहना चाह रहे हों उसकी शुरूआत तो बड़े तामझाम और धमाकेदार ढंग से करते हैं लेकिन आधे रास्ते में पहुँचते ही नेति-नेति कहना शुरू कर देते हैं। आप देख नहीं रहे कि कला, साहित्य, संस्कृति या कोई भी विषय-विधा अपने स्वभाव और प्रकृति में खुद ही जटिल संरचना से घिरी है।
खैर, बचपन में मैं होशियार था यह ख्याल आज भी मेरे मन से नहीं बिसरता है। कुंभ तो साल में एकबार लगता है जबकि मैं अपने मन के कुम्भ में हर रोज अनगिनत बार डुबकी लगाता हँू। ऐसा इस वजह से है कि आज की तारीख में मैं एक ‘रोड साइड रोमियो’ हँू। देश के एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत विद्यार्थी हँू। पिछले 8 सालों से शादीशुदा भी। मेरा बड़ा वाला बाबू मेरे सामने ककहारा याद करता है। मोबाइल पर खुशी-खुशी वन-टू सुनाता है। जिस उम्र में हम ‘माँ शारदे कहाँ तुम वीणा बजा रही हो’ प्रार्थना करते थे उस उम्र में वह ‘मुर्गा मोबाइल बोले कू-कू हो कू’ विथ ब्रेकडांस करके दिखाता है। यानी वो हर सूरत में मुझसे ज्यादा आगे है, अव्वल है। विश्वास मानिए, जब किसी व्यक्ति के सामने अपने ही बच्चे से प्रतिस्पर्धा करने की नौबत आ जाती है तो उसके लिए खुद अपने बचपन के तह में उतरकर आत्मटोह लेना शायद! अनिवार्य विवशता जान पड़ता है।

हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...