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जिसे आना ही था....!!!

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मृत्यु से मत डरो
बस मर जाओ!!!

प्रतीक्षा में सदियां यों ही गुजरी हैं इसे आना ही था गुजर जाने दो
मृत्यु से मत डरो बस मर जाओ!!!

मृत्युदण्ड : राज्य मारता नहीं, बस बेसहारा छोड़ देता है

-----------------  राजीव रंजन प्रसाद
दमयति गोपाल की मधुबाला है। दमयति मधुबाला के बारे में कुछ नहीं जानती, फिल्में भी नहीं देखी; लेकिन इतना समझती है कि गोपाल उसकी जिस सौन्दर्य पर रीझता है; शरीर-सौष्ठव पर आकर्षित होता है; वह मधुबाला के मेल की है।
दमयति 10 तक पढ़ी है। उसके बाद से चुल्हा फूँक रही है। गोपाल उसे रानी बनाकर रखने की बात करता है। जब वह कहता है कि उसके पास नीली रोशनी वाली ऐसी आग है जो बूझती नहीं और धुँआ भी नहीं छोड़ती, तो दमयति चुप रह जाती है। पर भीतर से उसकी जो खुशी फूटती है उसका कोई परवार नहीं।  
शहर से दूर जीवन है और वहाँ रहने वाले लोग एलियन नहीं हैं; यह शहर के लोग कब मानेंग; गोपाल सोचता है। गोपाल छह माह पहले मुम्बई आया है। ऐसे मकान में रहता है जहाँ चारों ओर गंदगी पसरी है; लेकिन बिजली और टेलीविज़न हर घरों की शान हैं। गाँव के दो लड़के और एक सम्बन्धी जिस किराए का मकान लेकर रहते हैं उसी में गोपाल भी रहता है। हर हफ्ते मुर्गे-मछली-अंडे बनते हैं और सब चाव से खाते हैं। मकान में शौचालय की व्यवस्था नहीं है और वह सार्वजनिक शौचालय में जाता है। नहाने के लिए सप्लाई के वाटर वाले नलकूप पर …

वाह! रजीबा वाह!

'मैं घासलेटी मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं देता, जी धन्यवाद!' ----
उन्होंने फोन किया और तय किया की जेएनयू प्रकरण पर रजीबा की राय पूछी जाए। इस लड़के का माथा न घूमा और न सीधा हुआ; बस उसने तपाक से कह दिया-'मैं घासलेटी मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं देता, जी धन्यवाद!'

पता नहीं रजीबा को इतना गुमान और गुरूर क्यों है, वही जानें। पर इतना तय है कि यह उसकी अपनी मौलिक पहचान है जिसे कोई नहीं छीन सकता।