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Showing posts from June, 2014

आम-आदमी की वास्तविक ज़िन्दगी को ‘रील लाइफ’ न माने

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29 जून को 'हिन्दुस्तान' समाचारपत्र में प्रकाशित सम्पादकीय ‘सरकार को सिनेमा मत बनाइए’ के सन्दर्भ में

आदरणीय शशि शेखर जी,
प्रधान सम्पादक,
हिन्दुस्तान समाचारपत्र।

आजकल मल्टीप्लेक्स सिनेमा संस्कृति फल-फूल रही है। लेकिन आम-आदमी उसका हिस्सा नहीं है। सामान्य रहबसर से कटी हुई नवढ़ा पीढ़ी जो कि विशेषतः सुविधा-सम्पन्न वर्ग से ‘बिलांग’ करती है; को यह रंग-ढंग सर्वाधिक सुहाता है। उसकी जेब में रुपल्ली कितना, कैसे, क्यों और कहाँ से आती है....यह पड़ताल करने का विषय मेरा नहीं है। परन्तु यह सचाई है कि इस पीढ़ी के ऊपर घर-परिवार के लिए कमाने की जिम्मेदारी नहीं है। यह नवढ़ा पीढ़ी अक्सर सपनों के ख़्वाबगाह में जीती है और थोड़ी-सी भी मुसीबत गले पड़ने पर टूट कर जार-जार बिलखने लगती है। बाज़ार इस पीढ़ी के लिए सबसे माकूल चारागाह है जहाँ वह हर हफ़्ते पार्टी-सार्टी कर सकता है; लव-शव-डेटिंग की प्लानिंग कर सकता है; वह सब सुख-सुविधा और ऐश्वर्य भोग सकता है जिसकी इज़ाजत उसके पर्स, एटीएम, क्रेडिट कार्ड आदि देते हैं।

खैर! यह मामूली-सी बात हिन्दुस्तान समाचारपत्र के प्…

वाया अख़बार ‘एज इट इज’ स्त्री-संहार चालू है!

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नदी और चिड़ियाँ

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(देव-दीप के लिए)

चिडियाँ हीक भर
पानी पीती है
और नदी चिड़ियाँ के बोल सुन
तृप्त होती है अन्दर तक

नदी जिसने हर ताप को सह कर
सीखा है ठंडा रहना
कल-कल मृदु-भाव से बहना
बाधाओं से लड़ना...चुनौतियों से टकराना
उसी भाँति चिड़ियाँ ने जाना है
आदमखोर मनुष्यों के जमात से बचना
मौसम के बयार के विपरीत
आकाश में उड़ना...अंतधर््यान हो जाना

देव-दीप, आदमी की तरह
अधिक जानने और कुछ भी न करने से
कितना अच्छा है!
नदी और चिड़ियाँ होना....?

पत्राचार राजीव और NBT आॅनलाइन के बीच

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NBT ऑनलाइन को चाहिए कॉपी एडिटर/सीनियर कॉपी एडिटर Submitted by admin on Tue, 2014-06-03 16:28 नवभारतटाइम्स.कॉम को उपसंपादक (कॉपी एडिटर) और वरिष्ठ उपसंपादक (सीनियर कॉपी एडिटर) की जरूरत है। एनबीटी अपने लिए ऐसे साथी चाहते हैं जिन्हें काम का अनुभव हो। एनबीटी को फ्रेशर से भी कोई परहेज नहीं है, बस उनके मानकों पर खरा उतरे। जर्नलिजम में डिप्लोमा या डिग्री जरूरी नहीं लेकिन आज की पत्रकारिता क्या है, इसकी जानकारी उन्हें होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में उनकी पत्रकारिता की दुनिया सिर्फ मोदी-राहुल-कांग्रेस-बीजेपी तक सीमित न हो बल्कि आसपास की हर खबर की भी उनको समझ हो। हिंदी ऐसी हो कि आम पाठकों को समझ में आए और श्रीमती को श्रीमति न लिखता हो। अंग्रेज़ी का ज्ञान इतना कि सही-सही ईमेल लिख पाए और इंग्लिश से हिंदी में अनुवाद कर पाए। अंग्रेजी के शब्दों से नफरत न करता हो और डॉक्टर को डाक्टर न लिखता हो। टेक्नॉलजी से जो न घबराता हो। टि्वटर और फेसबुक जिसके लिए दूसरी दुनिया के शब्द न हों। और इनस्क्रिप्ट/फनेटिक कीबोर्ड के अनुसार टाइप करना जानता हो। अगर आप ऐसे हैं तो अपना रेज़्युमे (जी हां, इसे रिज़्यूम नही…

आम-आदमी

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रोटी बनाने के लिए
जितनी गूँथीं जाती हैं आटा
भात बनाने के लिए
जितनी धोई जाती है चावल
घर भर के अंदाज से
जितनी काटी जाती है तरकारी थाल में
राजीव, आम आदमी को हर रोज
अपने लिए उतना ही जीना चाहिए
बाकी चिंताएँ छोड़कर कल पर....!
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-राजीव रंजन प्रसाद

मेरी गौरेया

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पढ़ती है गौरेया
कहाँ अक्षर.....?
लिखती है गौरेया
कहाँ लिपि.....?
भाषा और माध्यम की भेद भी
कहाँ जानती है गौरेया?
मेरी गौरेया
नहीं माँगती है दाना-पानी के सिवा कुछ भी ‘एक्स्ट्रा’
अपने लिए, खुद के लिए
पिछले 12 सालों से मेरी गौरेया
मेरे साथ है
और मैं अपनी गौरेया से बेफिक्र
सुबह से शाम तक
आरम्भ से अनन्त तक
लस्त-पस्त हूँ
अक्षर, लिपि और भाषा में
आज गौरेया ने पिराते मन से कहा है-
यह बियाबान जंगल
जिससे तुम आदमी होने की तमीज सीखते हो
जार दो, फेंक दो, बहा दो पानी में
और उड़ चलो आकाश में
उस असली राह पर
जहाँ रोशनाई रहती है
अनन्त...अनन्त....अनन्त बनी हुई!!
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-राजीव रंजन प्रसाद

अज्ञेय : बच रही जो बात

एक याचक पिता का पत्र अपने पुत्र के नाम

प्रिय दीप,

आज देव के साथ नहीं अकेले तुमसे संवाद करना चाहूँगा। 10वीं पास किए 16 साल हो गये। उतनी ही जितनी कि उम्र में हाईस्कूल पास किया था। स्कूल टाॅप किया था। बेरोजगारी अंतिम सचाई है उसी तरह जिस तरह आज डाॅक्टर ने कहा है कि तुम बिना ‘हियरिंग मशीन’ के नहीं सुन सकते। एक हफ़्ते की भागदौड़ और जाँच रिपोर्ट के बाद यह पता चलना बेहद दुःखद है कि मेरा बेटा साफ आवाज़ साफ-साफ बोलने पर भी बिना कान में मशीन लगाये नहीं सुन सकता है। रोई तुम्हारी मम्मी दिन भर। और मैं। अवाक्। हतप्रभ। कितना अनसुना किया। अपनी कैरियर बनाने के गुमान में तुम्हारा भविष्य दाँव पर लगा दिया। तुम्हारे जन्म वाले दिन मैं बीएचयू में प्रयोजनमूलक हिन्दी पत्रकारिता का बतौर विद्यार्थी होने के नाते ‘हाॅस्टल फीस’ जमा कर रहा था। हमारे और तुम्हारे बीच अनुपस्थिति, रिक्तता, शून्यता इत्यादि ढेरों रही। जब एम. ए. का गोल्ड मेडल तुम्हारे गले में डाला तो तुम्हारी माँ ने कहा था-‘यह खाने के लिए नहीं दे देगा, इसे निहार-निहार कर आदमी पेट नहीं पाल सकता है, ज़िदगी भर खुश नहीं रह सकता है।’ मैं सुनता किसकी हूँ तुम्हारी माँ का भी नहीं सुना। आज डाॅक्टरी पर्ची मे…

कुछ भी नहीं होता अचानक, यूँ ही

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आप को भूख न लगी हो
और खाना खाने के बारे में सोचने लगे
आप को ज्वर न हो
और डाॅक्टर दिखाने लगे बढ़ा हुआ तापमान
आप को उबकाई न आ रही हो
और लोग आपके मुँह के आगे छान दे कटोरे

प्रिय राजीव,
कुछ भी नहीं होता अचानक, यूँ ही
फाॅल्ट होने पर ही समस्या उत्पन्न होती है
रास्ता गड़बड़ होने पर ही ‘रूट डाइवज्र्ड’ होता है
मामला बिगड़ने पर ही हाथापाई की नौबत आती है
आप सच बोलें और लोग उस पर विश्वास न करें
यह भी तभी होता है जब आप बोलते हैं बिलावजह या बेवज़ह

प्रिय राजीव,
कुछ भी नहीं होता अचानक, यूँ ही
कि आप भाषा में गाते रहे और लोग कान न दें।

थोड़ा इनके ‘डिटेलिंग’ पर ध्यान दें:

शैक्षणिक संस्थानों के गिरमिटया मज़दूर नहीं हैं शोध-छात्र!

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‘‘....उस(कोई भी हो सकता है, यहाँ मोहनदास) का पूरा संघर्ष एक बेगानी धरती पर एक अनजाने और आम-आदमी का संघर्ष था। हर विस्थापित आदमी को, चाहे वह अपने देश में हो या विदेश में, संघर्ष करना पड़ता है भले ही देशकाल की दृष्टि से परिमाण या गुणात्मकता में अन्तर हो। हर कोई अपने जीवन में एक निर्धारित, अनिर्धारित या अल्प निर्धारित उद्देश्य की तरफ बढ़ने का उद्यम करता है। उसके लिए त्याग करता है, पीड़ाएँ सहता है, आकांक्षाएँ पालता है। जो भी संभव हो, जरूरी, गैर-जरूरी सबकुछ करता है।....’’

यह अंश गिरिराज किशोर लिखित पुस्तक ‘पहला गिरमिटिया’ का है। गाँधी जी के दक्षिण अफ्रीका में बिताए हुये जीवन पर केन्द्रित इस उपन्यास की चर्चा पर्याप्त मात्रा में हुई है। आप इस किताब से अवश्य परिचित होंगे। यहाँ यह उद्धरण उन शोध-छात्रों के निमित प्रस्तुत है जो अपने अकादमिक अभिलक्ष्यों की प्राप्ति हेतु वह हर टिटिमा(जो भी संभव हो, जरूरी, गैर-जरूरी सबकुछ) करते हैं जिसका किया जाना साँस लेने, भोजन करने, पानी पीने, टहलने-घूमने अथवा बा…

शोध-पत्र : भारतीय लोकतंत्र में जातिवादी सामन्ती सोच है, सीमान्त के लिए मानवीय सोच नहीं है.....!!!

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भारत में लोकतंत्रनुमा सामन्ती रियासत है। इस रियासत में पाँचसाला चुनाव होते हैं। लेकिन, इन प्रान्तीय/राष्ट्रीय चुनावों में जनता की वास्तविक हिस्सेदारी क्या है और कैसी है? यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है। सचाई की धरातल पर थोड़ा नैतिक मनोभाव से विचार करें, तो भारतीय जन सामन्तशाही के कुचक्र में इस कदर फँसे हैं कि उन्हें चारो ओर अन्धकार ही अन्धकार दिखाई दे रहा है। पार्टियाँ सत्ता के केन्द्र में लगातार बदलती रहती हैं, लेकिन गाँधी के ‘अन्तिम जन’ की स्थिति में कोई आमूल-चूल परिवर्तन नहीं होता है। दरअसल, राजनीति में वंशवाद विषबेल की तरह पनपा हुआ है। यह वंशपूजक विधान भारतीय लोकतंत्र का स्थायी भाव या कि चरित्र बन चुका है। कुनबापरस्ती अथवा भाई-भतीजावाद की यह प्रवृत्ति इस कदर खतरनाक है कि इससे हमारी समष्टीय स्वतन्त्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मानवीय गुण लगातार चोटिल हो रहे हंै।

सन् 47 में स्वाधीन हुए भारतीय लोकतंत्र में आज भी अर्थ अथवा शक्ति-सम्पन्न जातियों का वर्चस्व है। इस नाजायज़ चैधराहट को राजनीतिक शह मिले होने के कारण देश की बहुसंख्य पिछड़ी एवं…

सत्यजीत रे का सिनेमाई दौर और भारतीय हिन्दी सिनेमा

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बात ‘अप्पू त्रयी’ से भी शुरू की जा सकती है। लेकिन मैं आपके कहे हिसाब से शुरू करूं, यह कद्रदानी अभी तक मैंने नहीं सीखी है। सो, अपने रंग-रोगन के साथ जरा प्रवेश करें भारत में बनने वाले फिल्मों के स्टुडियों में। आजकल अधिकतर सिनेमा मटरगश्ती के टमाटर हैं।(पान सिंह तोमर, लंच बाॅक्स, हाइवे....जैसी फ़िल्में को मत गिनाइए, प्लीज) जरा मजाकिया टोन में कहें तो-‘होंठ रसीले...तेरे होंठ रसीले' वाले तर्ज पर। आप उन्हीं में गला तर कीजिए; लेकिन उनसे मन भरूआ जाए, तो जरा इन फिल्मों की ‘डिटेलिंग’ भी देखिए....! यहां महज उस दुनिया के चंद तरई भर पेश हैं, सारा आकाश आप ही का है...यात्रा कीजिए न!
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बांबे टाकीज द्वारा बनाई गई ‘अछूत कन्या’ (1936) फिल्म ने भारतीय समाज के एक कटु सत्य को बखूबी पेश किया था। लोगों ने इसे खूब पसंद किया। सभी जानते हैं कि राष्ट्रवादी आंदोलन में जब सामाजिक मुक्ति का स्वर मुखर होने लगा तब ‘अछूत कन्या’ बनी। इसी तरह प्रभात फिल्म कंपनी द्वारा ‘दुनिया न माने’ बनाई गई। उन दिनों महारा…

बाज़ारू तरक्की के साये में ‘हिन्दुस्तान’ समाचारपत्र

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अब अच्छी बातें कहने का चलन ख़त्म हो गया, गन्दी बात साधिकार कहे जाने का युग है। बाज़ार के विरोध में मुँह खोलना आसान नहीं है। लेकिन जिसने मुक्तिबोध के कहे को साधा है-‘अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे, तोड़ने होंगे मंदिर और मठ’; उसके लिए यह सब करना खुद से हीक भर मुहब्बत करना है....खैर!

बात हिन्दुस्तान समाचारपत्र की है। यह वही समाचारपत्र है जिसने हाल ही में अपने लोकप्रिय परिशिष्ट ‘अनोखी’ के साथ ‘मैगी मसाला’ मुफ़्त में देना शुरू किया है। कोई अतिरिक्त कीमत नहीं। बिल्कुल निःशुल्क। यानी अब विज्ञापन सिर्फ उत्पाद को देख कर एक बार ‘ट्राई’ कर लेने का मनुहार भर नहीं कर रहा है, बल्कि उस उत्पाद को सीधे आपके हाथों में सौंप रहा है।
इसी तरह ‘हिन्दुस्तान’ अख़बार ने अपने पाठकों के छुट्टियों का विशेष ख्याल रखते हुएख़बरनुमा टूर-पैकेज प्रस्तुत किया है। इस ख़बर में विभिन्न ट्रैवेल्स कंपनियों का फोन-पता टिपा हुआ है; साथ में उनके विशेष पैकेज को भी बढ़ी सधी हुई भाषा में विशेष रिपोर्ट के रूप में छापा है। इसे पढ़कर सामान्य पाठक भले आहत…

मैं आपकी झुलनी बजाऊँ...यह मुझसे नहीं होगा

बीएचयू ‘रिक्रूटमेंट एण्ड असेसमेन्ट सेल’ को निम्न जवाब भेजे एक वर्ष हो गया। लेकिन, इस सम्बन्ध में न मुझे कोई जवाब मिला और न ही साक्षात्कार हेतु बुलावा-पत्र ही प्राप्त हुआ। प्रयोजनमूलक हिन्दी पत्रकारिता विषय के अन्तर्गत विज्ञापित सहायक प्राध्यापक पद के लिए बतौर आवेदक मैंने हरसंभव प्रतीक्षा किया। आपको भी लग रहा है न कि अब बहुत हो गया....छोड़ दिया जाए। एक झटके में पाँच पूर्ण हुए अध्यायों को ‘डिलीट’ कर उन्हें फिर से लिखना शुरू किया जा सकता है; वनस्थली विद्यापीठ को अपनी जरूरी ‘नोटिंग’ लगाकर उन्हीं  शर्तो के आलोक में साक्षात्कार हेतु बुलाने का आग्रह किया जा सकता है, तो फिर यह क्यों नहीं?
i. Details of significant conribution to knowledge :
1.    सूचनावान-पीढ़ी => ज्ञानवान पीढ़ी
मेरी दृष्टि में भारतीय अकादमिक जगत के शैक्षिक-सांस्कृतिक गतिकी का यथार्थवादी दृष्टिकोण से मूल्यांकन-विश्लेषण किया जाना आवश्यक है। यह इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि वर्तमान सदी सूचना-सदी है। सूचना-आधिक्य अथवा सूचनाक्रान्त स्थिति में विभ्रम होना तय है। भारतीय विश्वविद्यालयों में अध्ययन-अध्यापन में संलग्न लोगों पर इसी सूचनावान…

कुल टिटिमा एक अदद नौकरी के वास्ते

सिक्किम विश्वविद्यालय
विज्ञापन सं.:SU/NT/ADVT/2013-14/512, dated 7th June, 2013.
पद नाम: सहायक प्राध्यापक
विषय: जनसंचार एवं पत्रकारिता   
श्रेणी: अत्यन्त पिछड़ी जाति


दिनांक: 13 फरवरी, 2014

सम्बन्धित को सम्बोधित
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महोदय/महोदया,

मैं, राजीव रंजन प्रसाद, वर्ष 2010 में ‘जनसंचार एवं पत्रकारिता’ विषय के अन्तर्गत राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा कनिष्ठ शोध अध्येयता(NET/JRF) उपाधि के साथ उत्तीर्ण कर चुका हँू। इससे पूर्व मैंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से ही प्रयोजनमूलक हिन्दी(पत्रकारिता) विषय से परास्नातक उत्तीर्ण किया है। अपनी कक्षा में सर्वोच्च प्राप्तांक(लगभग 70 प्रतिशत) प्राप्तकर्ता होने के कारण मुझे विश्वविद्यालय ने ‘स्वर्ण पदक’ से सम्मानित किया है। इस समय मैं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में ‘संचार और मनोभाषिकी’(युवा राजनीतिज्ञ संचारकों के विशेष सन्दर्भ में) शोध-शीर्षक से अपना अन्तर-अनुशासनिक शोधकार्य कर रहा हूँ। यह ध्यानाकर्षण-पत्र सिक्किम केन्द्रीय विश्वविद्यालय द्वारा विज्ञापन संख्या:SU/NT/ADVT/2013-14/512 दिनांक 7 जून, 2013  के अन्तर्गत सहायक प्रा…

I WANT TO SCAPE FROM BANARAS HINDU UNIVERSITY!!!

"मैं बेवकूफ हँू, मैं ख़राब हूँ....लेकिन आपलोगों में से एक नहीं हूँ......!"

वीरा कितनी सही कहती है:
थैंक्यू फ़िल्म ‘हाइवे’

26 मई को मोदी को मिली भरपूर कवरेज, पर रेल दुर्घटना पर क्यों रहे मौन...

http://samachar4media.com/media-covered-the-swearing-in-ceremony-of-narendra-modi-as-prime-minister-but-not-covered-up-train-accident-on-may-26.html
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राजीव रंजन प्रसाद मीडिया शोधार्थी, हिंदीविभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी
उस दिन तारीख थी-26 मई, 2014, नरेन्द्र मोदी जी प्रधानमंत्री पद का शपथ लेने वाले थे। यह खबर बहुत बड़ी थी। मीडिया के भाव (कीमत) उस रोज बढ़े हुए थे। अतः इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने संयुक्त अभियान चलाते हुए ‘गोरखधाम एक्सप्रेस’ के दुर्घटनाग्रस्त होने की खबर को नजरअंदाज कर दिया। सूचनापट्टी पर एकाध लाइन आई भी, तो महज सांकेतिक। लेकिन, पाठकबहुल पत्रिकाओं को क्या हुआ? ये पत्रिकाएं तो पाठकों द्वारा खूब पढ़ी और सराही जाती हैं। पाठक-वर्ग का उन पर अगाध विश्वास भी कायम है।......

काॅरपोरेट पत्रिकाएँ : अमानुषिकता की सुनहरी(?) इबारतें

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26 मई, 2014 नरेन्द्र मोदी जी प्रधानमंत्री पद का शपथ लेने वाले थे। यह ख़बर बहुत बड़ी थी। मीडिया के भाव(कीमत) उस रोज बढ़े हुए थे। अतः इलेक्टाॅनिक मीडिया ने संयुक्त अभियान चलाते हुए ‘गोरखधाम एक्सप्रेस’ के दुर्घटनाग्रस्त होने की ख़बर को नज़रअन्दाज कर दिया। सूचनापट्टी पर एकाध लाइन आई भी, तो महज़ सांकेतिक। लेकिन, पाठकबहुल पत्रिकाओं को क्यों लकवा मार गया? ये पत्रिकाएँ तो पाठकों द्वारा खूब पढ़ी और सराही जाती हैं। पाठक-वर्ग का उनपर अगाध विश्वास भी कायम है।

नज़र दौड़ाइए:

आउटलुक    1-15 जून, 2014; सम्पादक: नीलाभ मिश्र
इंडिया टुडे    1-11 जून, 2014; प्रधान सम्पादक: अरुण पुरी
शुक्रवार        30 मई से 05 जून, 2014: ‘हिन्दी का श्रेष्ठ समाचार साप्ताहिक’ पत्रिका; सम्पादक: उदय सिन्हा
तहलका        1-15 जून, 2014:: ‘स्वतंत्र, निष्पक्ष, निर्भीक’ पत्रिका; कार्यकारी सम्पादक: संजय दुबे
गवर्नेंस नाउ    1-15 जून, 2014: ‘सुशासन की आवाज़’ की पत्रिका; सम्पादक: अजय सिंह
यथावत        1-15 जून, 2014: ‘वाद-विवाद-संवाद’ की पत्रिका; रामबहादुर राय

इन पत्रिकाओं के ताज़ातरीन अंक चमचमाते पृष्ठ और खूबसूरत रंगो/रेखांकनों/दृश्यों से अटे पड़े…

सबै भूमि गोपाल की

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लिखने के हमें पैसे नहीं मिलते। और न ही लिखे को अपने हित-मित्रों में तवज्ज़ो, प्रतिक्रिया या फिर ऐसे ही लिखते जाने के लिए संबल। ‘सबलोग’ के दिसम्बर अंक में यह आलेख प्रकाशित हुआ। अगले माह के जनवरी अंक में ‘आम आदमी पार्टी के यूपी कनेक्शन’ के सम्बन्ध में लिखा; पर किसी की नज़र न पड़ी। बड़ी मेहनत से ‘आम आदमी पार्टी’ के नीतिगत खामियों और विचारधारा में दृष्टिगत त्रुटियों को रेखांकित करते हुए ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ को एक आलेख भेजा; किन्तु वह अंतिम समय में प्रकाशित नहीं किया जा सका। खैर!!!



भारत में भूमि-वितरण का मसला बड़ा पेचीदा है। इस सम्बन्ध में सुसंगत अथवा समकोण आधारित व्यवस्था का सर्वथा अभाव है। मनुष्य-भूमि अनुपात की यह असमान स्थिति भयावह और कई रूपों में तो अत्यन्त विद्रूप है। भूमि अधिग्रहण सम्बन्धी विवाद या विदेशी भूमि खरीद(विशेष आर्थिक क्षेत्र) का हालिया अनुभव काफी बुरा रहा है। यह सरकारी-तंत्र की नाक़ामियत और शासकीय अतिवादिता का ‘आॅरिजनल डिसक्लाॅज़र’ है। मामला चाहे यूपी के भट्टा-पारसौल का हो या फिर उड़िसा के नियमागिरी का; जन-प्रतिनिधियों की पहुँच बाद में संभव होती है…