सत्यजीत रे का सिनेमाई दौर और भारतीय हिन्दी सिनेमा

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बात ‘अप्पू त्रयी’ से भी शुरू की जा सकती है। लेकिन मैं आपके कहे हिसाब से शुरू करूं, यह कद्रदानी अभी तक मैंने नहीं सीखी है। सो, अपने रंग-रोगन के साथ जरा प्रवेश करें भारत में बनने वाले फिल्मों के स्टुडियों में। आजकल अधिकतर सिनेमा मटरगश्ती के टमाटर हैं।(पान सिंह तोमर, लंच बाॅक्स, हाइवे....जैसी फ़िल्में को मत गिनाइए, प्लीज) जरा मजाकिया टोन में कहें तो-‘होंठ रसीले...तेरे होंठ रसीले' वाले तर्ज पर। आप उन्हीं में गला तर कीजिए; लेकिन उनसे मन भरूआ जाए, तो जरा इन फिल्मों की ‘डिटेलिंग’ भी देखिए....! यहां महज उस दुनिया के चंद तरई भर पेश हैं, सारा आकाश आप ही का है...यात्रा कीजिए न!
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बांबे टाकीज द्वारा बनाई गई ‘अछूत कन्या’ (1936) फिल्म ने भारतीय समाज के एक कटु सत्य को बखूबी पेश किया था। लोगों ने इसे खूब पसंद किया। सभी जानते हैं कि राष्ट्रवादी आंदोलन में जब सामाजिक मुक्ति का स्वर मुखर होने लगा तब ‘अछूत कन्या’ बनी। इसी तरह प्रभात फिल्म कंपनी द्वारा ‘दुनिया न माने’ बनाई गई। उन दिनों महाराष्ट्र में अधेड़ व्यक्तियों द्वारा किशोरी बालाओं से विवाह रचाने का चलन आम था। सामाजिक चेतना उत्पन्न करने वाली प्रभात फिल्म कंपनी की यह क्रांतिकारी फिल्म थी। ‘अमृत-मन्थन’ को भी हम याद कर सकते हैं। इसमें नरबलि के विरोध में आवाज उठाई गई थी। समाज को सार्थक संदेश देने वाली ऐसी फिल्में केवल शुरूआती दशक में ही नहीं बनीं। बल्कि, लगातार ऐसी फिल्में आती रही हैं। चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’ (1946) में कामगारों और मालिकों के संघर्ष को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया था। आगे के दशकों में वी. शान्ताराम, विमल राय, राजकपूर, गुरुदत्त ने ऐसी फिल्मों को नई ऊंचाई प्रदान की। सुजाता (1959) में विमल राय ने देविका रानी से अधिक प्रामाणिक अछूत कन्या (नूतन) को प्रस्तुत किया। ‘बंदनी’, ‘आवारा’, ‘जागते रहो’, ‘मदर इंडिया’ आदि कई उदाहरण हैं। बीसवीं शताब्दी में भारत तेजी से बदलता रहा। लगातार भारतीय समाज खुद को नए सांचे में ढालता गया। ऐसे में सिनेमा का बदलना लाजमी हो जाता है, जो हुआ भी। हां यह सच है कि बदलाव में सिनेमा गांव, समाज से कटकर कुछ ज्यादा ही व्यावसायिक हो गया और लोगों की रूचि को विकृत भी करने लगा। फिर भी ‘मृत्युदंड’, ‘भूमिका’, ‘अर्थ’, ‘आक्रोश’, ‘पार’, ‘आंधी’, ‘बाज़ार’, ‘मिर्च-मसाला’, ‘निःशब्द’, ‘रेनकोट’  जैसी फिल्में आती रहीं। वैसे तो हिन्दी की समानान्तर फिल्मों ने कई बेहतरीन उदाहरण सामने रखे हैं। किन्तु इसका दायरा हमेशा सीमित ही रहा। ये फिल्में आम लोगों में कम ही लोकप्रिय हो पाईं। गुलजार की पंजाब के आतंकवाद पर आधारित फिल्म ‘माचिस’ हमें कई कोणो से सोचने पर मजबूर करती है। गोविंद निहलानी ने नक्सलवाद की पृष्ठभूमि पर लिखे महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘हजार चौरासी की मां’ पर एक फिल्म बनाई। यह इतिहास के ताजातरीन दौर के प्रसंग का पुनर्चित्रण है। ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’, ‘हासिल’ और ‘यहां’ जैसी फिल्में आती रहीं। ऐसा महसूस होता है कि प्रवृत्तिगत राजनीति के दबाव से अब सिनेमा मुक्त होने की कोशिश में है। राजनीति के नए आयामों को छूने की जिम्मेदारी अब नई पीढ़ी के फिल्मकारों के जिम्मे अधिक है। वी. शांताराम द्वारा 1942-43 के आस-पास ‘पड़ोसी’ फिल्म बनाई गई थी। इसमें हिन्दू-मुस्लिम एकता का संदेश दिया गया, जो वक्त की जरूरत थी। पुराने लोग बतलाते हैं कि 1948 में जब ‘पड़ोसी’ भागलपुर के चित्रपट सिनेमा हाल में लगी तो शहर में हो रहे दंगे समाप्त हो गए थे। वैसे तो बाजार का दवाब यहां भी रहा। किन्तु, निर्माताओं ने इस रंग के साथ कभी खिलवाड़ नहीं किया। ‘बाम्बे’, ‘मिस्टर एण्ड मिसेज अय्यर’, ‘दामुल’ जैसी फिल्में इसकी बेहतरीन उदाहरण हैं। विमल राय, गुरुदत्त, बासु भट्टाचार्य, श्याम बेनेगल, सईद मिर्जा की कई फिल्में इसकी प्रमाण हैं।
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