Saturday, June 14, 2014

अज्ञेय : बच रही जो बात


बात है
चुकती रहेगी
एक दिन चुक जायेगी ही बात!

जब चुक चले तब
उस बिन्दु पर
जो मैं बचूँ
(मैं बचूँगा ही!)
उसको मैं कहूँ-
इस मोह में अब और कब तक रहूँ?
चुक रहा हूँ मैं।

स्वयं जब चुक चलूँ
तब भी बच रहे जो बात-
(बात ही तो रहेगी!)
उसी को कहूँ!
यह संभावना-यह नियति कवि की सहूँ।
Post a Comment

हमने जब भी पाया, पूरा पाया...!

अपने मित्र डाॅ. लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता का चयन इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में  सहायक प्राध्यापक (हिन्दी) के पद पर  होने की खुशी मे...