सबै भूमि गोपाल की

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लिखने के हमें पैसे नहीं मिलते। और न ही लिखे को अपने हित-मित्रों में तवज्ज़ो, प्रतिक्रिया या फिर ऐसे ही लिखते जाने के लिए संबल। ‘सबलोग’ के दिसम्बर अंक में यह आलेख प्रकाशित हुआ। अगले माह के जनवरी अंक में ‘आम आदमी पार्टी के यूपी कनेक्शन’ के सम्बन्ध में लिखा; पर किसी की नज़र न पड़ी। बड़ी मेहनत से ‘आम आदमी पार्टी’ के नीतिगत खामियों और विचारधारा में दृष्टिगत त्रुटियों को रेखांकित करते हुए ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ को एक आलेख भेजा; किन्तु वह अंतिम समय में प्रकाशित नहीं किया जा सका। खैर!!!



भारत में भूमि-वितरण का मसला बड़ा पेचीदा है। इस सम्बन्ध में सुसंगत अथवा समकोण आधारित व्यवस्था का सर्वथा अभाव है। मनुष्य-भूमि अनुपात की यह असमान स्थिति भयावह और कई रूपों में तो अत्यन्त विद्रूप है। भूमि अधिग्रहण सम्बन्धी विवाद या विदेशी भूमि खरीद(विशेष आर्थिक क्षेत्र) का हालिया अनुभव काफी बुरा रहा है। यह सरकारी-तंत्र की नाक़ामियत और शासकीय अतिवादिता का ‘आॅरिजनल डिसक्लाॅज़र’ है। मामला चाहे यूपी के भट्टा-पारसौल का हो या फिर उड़िसा के नियमागिरी का; जन-प्रतिनिधियों की पहुँच बाद में संभव होती है; जबकि काॅरपोरेट घरानांे एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्रदान किया गया राज्यादेश(अधिकृत आदेश) वहाँ पहले सेंधमारी कर जाता है। हरित क्रान्ति का लिहाफ लेकर अपनी पीठ थपथपाने वाले महाबोलिसीय-सेवकों को आज के हाल-हालात के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए।
  
पिछले लोकसभा चुनाव के करीब आई एक रिपोर्ट में प्रोफेसर उत्स पटनायक ने यह रेखांकित करते हुए कहा था कि वर्ष 1942-43 में बंगाल के भयंकर अकाल के दौरान प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता आज की तुलना में कहीं ज्यादा थी। इस रिपोर्ट पर कान न देने वाली वर्तमान कांग्रेस सरकार इस बार ‘भूख अब इतिहास बनेगी’ नारे के साथ चुनावी मैदान में है। यह कितनी लज्जाजनक बात है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक केन्द्र सरकार तब पारित कर रही है, जब उसके पास कहने मात्र को गिने-चुने दिन शेष बचे हैं। ‘नमो नमामि‘ का राग अलापने वाली भाजपा का हाल-ए-हक़ीकत भी कमोबेश यही है। ‘गुजरात वाइब्रंेट’ में दिखावे और छलावे का ‘वाइब्रेशन’ अधिक है; स्थिरता एवं गतिशीलता का आपसी समन्वय न्यूनांश। हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक अपने तमाम दावे के बावजूद गुजरात सम्पन्न राज्यों की सूची में शामिल नहीं है। अन्य पार्टियों की स्थिति इससे भी बद्तर है। उनकी राजनीतिक भूमिका, महत्त्व और प्रासंगिकता दोलक में लटके उस टंगने की तरह हो चली है जो जाता दोनों पाटों के शीर्ष तक है; लेकिन, ठहरता/टिकता कहीं नहीं है।

इस घड़ी पूरा देश राजनीतिक अवसरवाद का शिकार है। ज़मीनी मुद्दे गायब हैं, और जो चर्चें में हैं उसका लोक-मन और लोक-जीवन से लेना-देना कुछ भी नहीं है। इसके बावजूद ज़मीन के सबसे ऊपरी टीले(संसद) पर काबिज़ यही लोग हैं, हाथ यही हिला रहे हैं; कमल यही खिला रहे हैं; साइकिल यही चला रहे हैं; हाथी यही कूदा रहे हैं; यहाँ तक कि ‘आप’ में भी हम शामिल नहीं हैं। हम सिर्फ संज्ञा और सर्वनाम से नवाज़े जा रहे शब्द हैं। इन शब्दों के प्रयोग में भी सत्ता की राजनीति है; अर्थतंत्र का अर्थबोध-निरोधक खेल है। युगचेतना के कवि धूमिल की सीधी किन्तु सधी भाषा में कहें, तो-‘‘उन्होंने कभी किसी चीज को/सही जगह नहीं रहने दिया है/न संज्ञा/न विशेषण/न सर्वनाम/एक समूचा और सही वाक्य/टूटकर बिखर गया है/उनका व्याकरण इस देश की/शिराओं में छिपे हुए कारकों का हत्यारा है.../वे जिसकी पीठ ठोंकते हैं/उसके रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है’’ 

इस कठिन घड़ी में लोकचेत्ता विनोबा भावे को याद किया जाना स्वाभाविक है। भावे ने भूदान और ग्रामदान के माध्यम से जो सामाजिक-आर्थिक मैत्री और क्रान्तिकारिता शुरू की थी; वह आज पूरी तरह निष्फल हो चुकी है। लिहाजा, वर्ष 1990 के उत्तरार्द्ध में हजारों किसानों ने आत्महत्याएँ कीं। आन्ध्रप्रदेश के एक अकेले जिले अनन्तपुर में वर्ष 1997 से वर्ष 2009 के दौरान 2400 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की। कहना न होगा कि भीमकाय नई गैर-बराबरी पहले से मौजूद असमानता को और बढ़ाने का काम कर रही है। एक शोधक-अन्वेषक की हैसियत से यदि हम औपनिवेशिक काल के दस्तावेजों को खुरचें, तो यह साफ हो जाएगा कि ब्रिटिश शासनकाल में पूँजी का इस्तेमाल ज़मीन के स्वामित्व की खरीद के लिए किया जाता था। धनी लोग ऊँची ब्याज दर पर छोटे और मझोले किसानों को कर्ज देते थे और कर्ज की राशि चुकता न कर पाने की हालत में वे उन्हें अपनी ही ज़मीन से बेदख़ल कर देते थे। परिणामतः नया धनिक वर्ग ज़मीन का स्वामी बनता गया और दूसरी तरफ छोटा और मझोला किसान भूमिहीन होता गया। इसके अलावा सामंती जमींदारों द्वारा भूमि के स्वामित्व से सम्बन्धित जातीय प्रभुत्व जो सामंती प्रभुत्व के मुकाबले कहीं ज्यादा गहरे जड़ जमाये हुए था; ने गाँव में रहने वाली जनता के जीवन को और भी दारुण बना दिया।

आजादी के पश्चात कई राज्यों ने जमींदारी प्रथा का उन्मूलन कर दिया जो कि अंग्रेजी शासन के दरम्यान सामंती ताकत के रूप में फले-फूले थे। उन्मूलन होने के बाद लोगों में यह आस जगना स्वाभाविक ही था कि ज़मीन के बड़े हिस्से को जमींदारों के चंगुल से मुक्त होने के बाद उनका पुनर्वितरण किया जाएगा। आसार तो यह भी थे कि इस प्रथा के उन्मूलन होने से रैयतों पर कोई अतिरिक्त भार नहीं पड़ने वाला है जो उप-करों और किरायों के रूप में जमींदार पहले वसूला करते थे। लेकिन भूमि-वितरण का सही तरीका नहीं अपनाए जाने से फायदा सिर्फ उन रैयतों को हुआ जो मध्यवर्ती जातियों से आते थे। इससे निचली जाति के बटाईदारों और मजदूरों के विशाल भूमिहीन वर्ग को कोई फायदा नहीं हुआ। नतीजतन, भूमि सुधारों को कार्यान्वित करने का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य जो ग्रामीण समाज में आर्थिक और सामाजिक न्याय की स्थापना करना भी था; पूरा नहीं किया जा सका।

रामचन्द्र गुहा ने अपनी पुस्तक ‘भारत: गाँधी के बाद’ में इस बाबत गहरी तफ़्तीश की है। वे जिक्र करते हुए कहते हंै कि-‘‘उनकी भलाई भूमि सुधार के दूसरे चरण से ही संभव हो सकती थी जहाँ एक तय सीमा से ज्यादा ज़मीन रखने पर सीलिंग(पाबन्दी) लगा दी जाती और अतिरिक्त ज़मीन भूमिहीनों में बाँट दी जाती। यह एक ऐसा काम था जिसे सरकार करने में अक्षम थी या फिर अनिच्छुक थी।’’ जबकि गाँधी इस अनिवार्य जरूरत पर जोर देते हुए अपनी पुस्तक ‘ग्राम स्वराज्य’ में इसका विस्तारपूर्वक उल्लेख करते हैं-‘‘प्रत्येक प्राणी को भोजन पाने का अधिकार है। मेरी राय में भारत के प्रत्येक व्यक्ति को पूरा काम मिलना चाहिए, ताकि वह अपना जीवन-निर्वाह भली-भाँति कर सके। और यह ध्येय सर्वत्र तभी सिद्ध किया जा सकता है जब जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं के उत्पादन के साधन जन-साधारण के हाथों में हों। ये साधन सब मनुष्यों के लिए उसी तरह बिना मूल्य सुलभ होने चाहिए, जिस तरह ईश्वर की उत्पन्न की हुई हवा और पानी सबके लिए सुलभ हैं या होने चाहिए। दूसरों का शोषण करने के लिए इन साधनों को व्यापार की वस्तु नहीं बनाना चाहिए। उन पर किसी देश, राष्ट्र अथवा समूह का एकाधिकार अन्यायपूर्ण माना जाना चाहिए। इस सादे सिद्धान्त की उपेक्षा करने से ही वह गरीबी और कंगाली पैदा हुई है, जो आज हम न केवल अपने इस अभागे देश में परन्तु संसार के अन्य भागों में भी देख रहे हैं।’’

संत विनोबा भावे ने इस समस्या से सन्दर्भित ज़मीनी पहलकदमी शुरू की थी। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भूमिहीनता की समस्या को उन्होंने अपने तरीके से हल करना चाहा। विनोबा ने जो तरीका अपनाया वह यह कि बड़े जोत वाले किसानों को स्वेच्छापूर्वक कुछ ज़मीने छोड़ देने के लिए मनाया जाए। सन् 1951 में भावे ने उस वक्त के कम्युनिष्टों के प्रभाव वाले तेलंगाना इलाके में पैदल यात्रा की। पोचमल्ली गाँव में उन्होंने वहाँ के जमींदार रामचंद रेड्डी को सौ एकड़ ज़मीन देने के लिए राजी कर लिया। इस घटना ने इसे देशव्यापी अभियान में बदलने को प्रेरित किया जिसे ‘भू-दान’ आन्दोलन कहा गया। स्वयंसिद्ध संकल्प की तरह शुरू किए गये इस आन्दोलन को विनोबा अपने अथक प्रयास से सफल बनाने में जुटे रहे। उन्होंने तेलंगाना क्षेत्र के करीब 200 गाँवों की यात्रा कर लगभग 1200 एकड़ भूमि प्राप्त की।

उत्तर भारत विशेषतया बिहार और उत्तर प्रदेश में भूदान के प्रभाव अत्यन्त असरकारी साबित हुए। अपने इस भूदान यज्ञ के मार्फत विनोबा ने 40 लाख एकड़ से अधिक की ज़मीनें प्राप्त की। गाँधी के अनुयायी और प्रथम सत्याग्रही के रूप में प्रसिद्धि पाये विनोबा के लिए यह सबकुछ कर पाना इतना आसान नहीं था। वे इस बात से अवगत थे कि साधारण नागरिक में जन-सेवा की भावना ढँकी-छिपी होती है। लोकहित की प्रेरणा उनके लिए हमेशा प्रधान नहीं हुआ करती है। उन्हें इस बात का भी पूरा भान था कि दुर्बल हृदय द्रव्य के लोभ को पूरी तरह नहीं छोड़ सकता, इसलिए उसके मन की उड़ान अधिक से अधिक दान तक ही हो सकती है। त्याग की बात शायद! ही वह सोच सके। अतः यह आवश्यक था कि जनमानस को स्वैच्छिक दान के लिए उद्बुद्ध/प्रेरित किया जाये। उन्हें यह बतलाया जाये कि-जीवन भी बाँटों, मृत्यु भी बाँटों, गरीबी भी बाँटों, अमीरी भी बाँटों, काम भी बाँटों, आराम भी बाँटों, मालकियत भी बाँटों, मिल्कीयत भी बाँॅटों। विनोबा का भूदान आन्दोलन स्व-प्रेरणा के ऐसे ही प्रतिबद्ध आश्वासन और वैचारिक-योग से निर्मित हुआ था। इस आन्दोलन में सामाजिक-आर्थिक विकेन्द्रीकरण की सार्वभौम चेतना एवं जन-राग व्याप्त थी। जैसा कि दादा धर्माधिकारी मानते थे-‘‘विनोबा ने हमारी बुद्धि में इस बात का एक प्रत्यय पैदा कर दिया कि सत्ता-निरपेक्ष और शस्त्र-निरपेक्ष आर्थिक क्रान्ति की प्रक्रिया हो सकती है। गाँधी ने जिन सिद्धान्तांे को राजनीतिक क्षेत्र में लागू करने की चेष्टा की, जिनके लिए स्वदेशी और ग्रामोद्योगों का प्रतिपादन किया और अस्पृश्यता-निवारण जैसे मूल्यों के लिए हमें झाड़ू जैसे प्रतीक दिए, उन सारे मूल्यों को एक बुनियाद देने के लिए और उन्हें आर्थिक क्रान्ति के साथ जोड़ने के लिए विनोबा ने एक नए आन्दोलन का उपक्रम इस देश में किया, जिसे हम ‘भूदान-यज्ञ आन्दोलन’ कहते हैं।’’

सन् 1953 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता जयप्रकाश नारायण इस भूदान-यज्ञ का हिस्सा बने। भूदान आन्दोलन के महत्त्व और सार्थकत्त्व को सिद्ध करते हुए उन्होंने कहा कि-‘‘भूदान आन्दोलन राज्य को अधिकृत करने के लिए किसी राजनीतिक दल का निर्माण करना नहीं चाहता है और न स्वयं इसका रूप लेना चाहता है। इसका लक्ष्य लोगों को यह समझाना है कि राज्य जो करता है या नहीं करता है; उससे स्वतंत्र होकर अपने जीवन में क्रान्ति करें और इस प्रक्रिया के द्वारा समाज में क्रान्ति करें। भूदान स्वयं तीव्र और गहन रूप से एक राजनीतिक आन्दोलन है। जो आन्दोलन मनुष्यों में और समाज में ऐसी पूर्ण क्रान्ति करना चाहता है, वह अराजनीतिक नहीं हो सकता। परन्तु, वह ऐसी राजनीति है जो दलों, चुनावों, संसदों एवं सरकारों की राजनीति नहीं, जनता की राजनीति है। वह राजनीति नहीं, लोकनीति है जैसा कि विनोबा कहते हैं। भूदान का अंतिम लक्ष्य एक दलमुक्त लोकतंत्र का निर्माण करना है।’’

यह सही है कि विनोबा भावे का यह मिशनरी निर्माण-कार्य बाद के कुछ वर्षों में शिथिल पड़ता हुआ दिखाई दिया। वजह यह कि विनोबा के इस याज्ञिक आन्दोलन को अंदरूनी खामियों और विसंगतियों ने सदा-सर्वदा के लिए लील लिया। शुरू में उनके इस कार्य को राष्ट्रव्यापी लोकप्रियता एवं प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। कई लोगों ने इसे हिंसक क्रान्ति का गाँधीवादी विकल्प तक कहा। लेकिन, बाद का आकलन और परिणाम उतना उत्साहजनक नहीं था। भूदान प्रारूप के आलोचकों का कहना था कि दान में मिली ज़मीनों का वितरण ठीक ढंग से नहीं किया जा सका। जिससे अधिकतर ज़मीन भूमिहीनों तक कभी पहुँच ही नहीं पाई और कई सालों के बाद धीरे-धीरे उसे उसके मूल मालिकों को ही लौटा दिया गया। इसके अलावा भूदान में जो ज्यादातर ज़मीनें प्राप्त हुई थीं वह रेतीली और पथरीली थी जो खेती करने लायक नहीं थी। कई ज़मीने ऐसी भी थीं जो विवादों और मुकदमेबाजी के घेरे में फँसी थी। इस तरह, भूदान आन्दोलन की ज़मीन पर शुरू हुई सामाजिक-आर्थिक क्रान्तिधर्मिता एक भव्य नाकामयाबी के अन्तर्गत समाप्त होती दिखाई देती है। इस पराभव में सरकार की पंचवर्षीय योजना भी काफी हद तक जिम्मेदार थी। आर्थिक-पैमाइशकार भूमि-समस्या की स्थिति से निपटने के लिए शासन-व्यवस्था को नए-नए तरीके सुझा रहे थे; जिनमें से एक था-‘उत्पादन, वितरण और विनिमय’ के साधनों का राष्ट्रीयकरण किया जाना।

साठ के दशक में कठिनाई और संघर्ष के जिस मार्ग पर विनोबा ने कदम बढ़ाया था, वह निश्चय ही प्रभावी और दूरगामी परिणाम दिखाने वाला था; लेकिन, उसकी संभावनाएँ परिसीमित थीं। दूरद्रष्टा भावे भूदान आन्दोलन की सीमाओं को पहचान चुके थे। अतः उन्होंने ग्रामदान के नए संकल्प-व्रत को ठान लिया। अब उनका सारा जोर लोगों को स्वावलम्बी बनाने पर केन्द्रित हो चुका था। उन्हें सैकड़ों गाँव ग्रामदान के रूप में मिले थे। अतः उन्हें यह विश्वास हो चला था कि देश के गाँव यदि स्वावलम्बी बन जाते हैं और विधायक कार्य करने वालों की शक्ति वहाँ पर उपयोग होता है, तो सारे देश में प्रचण्ड निष्ठा पैदा हो जायेगी और सभी आक्षेपों अथवा उपहासों से वे लोग बरी हो जाएँगे। उन दिनों जयप्रकाश नारायण जो कि विनोबा के भूदान आन्दोलन को ज़मीनी नेतृत्व प्रदान कर रहे थे। बाद के दिनों में भूदान के नए विकल्प के बारे में सोच रहे थे। उनका स्पष्ट मानना था कि-‘‘देश में मनुष्य-भूमि का जो अनुपात है और जिस गति से जनसंख्या बढ़ रही है, उसे देखते हुए ग्रामीण आबादी यदि केवल भूमि पर निर्भर रहेगी तो कृषि के विकास के बावजूद वह उत्तरोत्तर निर्धन बनती जाएगी। इसलिए औद्योगिकरण का घनिष्ठ सम्बन्ध कृषि से जुडना चाहिए, ताकि प्रत्येक गाँव या कम से कम प्रत्येक लघु ग्राम-समूह, कृषि-औद्योगिक समुदाय केवल गेहूँ और धान, फल और सब्जी, ईख और कपास का ही प्रसोधन नहीं करेगा; बल्कि रेडियो, साईकिल के पुर्जों, छोटे यंत्रों, विद्युत-सामग्रियों आदि वस्तुओं का जिनकी आवश्यकता क्षेत्र में हो सकती है, निर्माण भी करेगा। ऐसा होने से, नगर और गाँव के बीच बढ़ती हुई खाई कम होगी तथा नगरीकरण की बुराईयाँ भी घटेंगी।’’

ग्राम-स्वराज एवं सर्वोदय से जुड़े उपर्युक्त प्रणेताओं के भूमि-वितरण सम्बन्धी प्रयास भले ही नाक़ाफी साबित हुए हों; किन्तु समग्रता में देखें, तो सामुदायिक-सामूहिक असंतोष, दबाव, विरोध, प्रतिरोध, संघर्ष, ज्वार आदि की जो हस्तक्षेपकारी भूमिका आज के लोक-समाज और लोक-जीवन में उजागर दिख रही है; उसकी पूर्वपीठिका किसी न किसी रूप में भूदान और ग्रामदान के मूल्यों में विद्यमान है। विनोबा भावे की भावभूमि या मनोभूमि पर जो मंत्र टंका था; वह था-‘सबै भूमि गोपाल की।’ विनोबा महात्मा गाँधी के अनुयायी या सत्याग्रही मात्र नहीं थे। वे अपने समय के वास्तविक सार्थवाह थे। इस घड़ी हमारे सामने मुख्य संकट ऐसे सार्थवाह की अनुपस्थिति ही है। आज की तारीख़ में जब ‘रूकेगी नहीं मेरी दिल्ली’ का राजनीतिक राग अलापा जा रहा है; मन-मस्तिष्क में विनोबा के इन विचारों का कौंधना स्वाभाविक है-‘‘हिन्दुस्तान को स्वराज्य तो मिला, पर गाँवों को क्या लाभ हुआ? लंदन से दिल्ली में सत्ता आयी और कुछ बम्बई(अब मुंबई), मद्रास(अब चेन्नई) भी पहुँची, पर अभी तक वह गाँव में नहीं पहुँच पायी। दिल्ली में सूर्योदय होगा, तो क्या गाँवों में अन्धेरा रहेगा? यह कौन कबूल करेगा?’’

अतः वर्तमान समय की गाढ़ी चुनौतियों के मद्देनज़र हमें इस बिन्दु पर ठहरकर सोचना ही होगा कि-‘‘हमारे जीवन को नियंत्रित कर रही व्यवस्था अपने मोहरों को बड़ी ही चतुराई से खेलती है-ऐसी चतुराई के साथ कि हमारा सारा क्रोध तथा असंतोष किसी भी ढंग से अपनी स्थिति सुरक्षित बनाए रखने में ही बिखर जाता है। हमें अक्सर बताया जाता है कि हमारी आर्थिक समस्याओं की मूल जड़ हमारी बढ़ रही जनसंख्या, उत्पादकता में अरुचि, प्रतियोगी भावना का अभाव, निरक्षरता तथा जड़ता में निहित है। इस सारे प्रचार का मुख्य लक्ष्य हमें यह विश्वास दिलाने में है कि हम लोग स्वभाव से ही दायित्वहीन हैं तथा हमारी अनुशासनहीनता को नियंत्रित करने के लिए राजनीतिक सत्ता के और भी अधिक केन्द्रीयकरण की आवश्यकता है। राष्ट्र की अखण्डता, प्रभुसत्ता तथा स्वतंत्रता के बारे में कई प्रकार की आशंकाएँ जगाकर हमें यह अहसास कराया जाता है कि जो भी शासकों के साथ सक्रिय संगठित असहमति व्यक्त करने की हिमाकत करेगा उसे तो अनुशासन के नाम पर ही निपटा दिया जाएगा।’’
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