आम-आदमी की वास्तविक ज़िन्दगी को ‘रील लाइफ’ न माने


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29 जून को 'हिन्दुस्तान' समाचारपत्र में प्रकाशित सम्पादकीय ‘सरकार को सिनेमा मत बनाइए’ के सन्दर्भ में

आदरणीय शशि शेखर जी,
प्रधान सम्पादक,
हिन्दुस्तान समाचारपत्र।

आजकल मल्टीप्लेक्स सिनेमा संस्कृति फल-फूल रही है। लेकिन आम-आदमी उसका हिस्सा नहीं है। सामान्य रहबसर से कटी हुई नवढ़ा पीढ़ी जो कि विशेषतः सुविधा-सम्पन्न वर्ग से ‘बिलांग’ करती है; को यह रंग-ढंग सर्वाधिक सुहाता है। उसकी जेब में रुपल्ली कितना, कैसे, क्यों और कहाँ से आती है....यह पड़ताल करने का विषय मेरा नहीं है। परन्तु यह सचाई है कि इस पीढ़ी के ऊपर घर-परिवार के लिए कमाने की जिम्मेदारी नहीं है। यह नवढ़ा पीढ़ी अक्सर सपनों के ख़्वाबगाह में जीती है और थोड़ी-सी भी मुसीबत गले पड़ने पर टूट कर जार-जार बिलखने लगती है। बाज़ार इस पीढ़ी के लिए सबसे माकूल चारागाह है जहाँ वह हर हफ़्ते पार्टी-सार्टी कर सकता है; लव-शव-डेटिंग की प्लानिंग कर सकता है; वह सब सुख-सुविधा और ऐश्वर्य भोग सकता है जिसकी इज़ाजत उसके पर्स, एटीएम, क्रेडिट कार्ड आदि देते हैं।

खैर! यह मामूली-सी बात हिन्दुस्तान समाचारपत्र के प्रधान सम्पादक शशि शेखर को नहीं पता हो, यह सोचना अपनेआप में ही अजीब लगता है। ‘हिन्दुस्तान’ समाचारपत्र में 29 जून को ‘आजकल’ स्तंभ से प्रकाशित अपने सम्पादकीय ‘सरकार को सिनेमा मत बनाइए’ के आखि़री पैरे में आप सूत्रनुमा लहजे में कहते हैं-‘‘आशय यह है कि केन्द्र सरकार मल्टीप्लेक्स में लगा हुआ सिनेमा नहीं है, जिसे पहले शो, पहले दिन या पहले हफ़्ते की कमाई से नापा-जोखा जाए। नरेन्द्र मोदी ने कुंभकर्णी नींद में सोए प्रशासन को जगा दिया है। वह और उनके सहयोगी दिन-रात एक किए हुए हैं। थोड़ा इंतजार कीजिए। सत्ता-नायकों को भी सही परिणाम देने के लिए समय की दरकार होती है।’’

आप सही हैं। लेकिन इंतजार से पहले सत्ता-नायकों की ठीक-ठीक पहचान होनी भी जरूरी है। याद कीजिए...17 मई, 2014 को लिखी हुई अपनी ‘बाॅटम स्टोरी’ जिसका आपने बड़ी सूझ-बूझ से शीर्षक डाला था-‘नरेन्द्र मोदी के नए अवतार ने तोड़े तमाम सियासी मिथक’। यह स्टोरी पूरी तरह ‘जादूई यथार्थवाद’ के प्रभाव और रौ में लिखी हुई लगती है या फिर ‘भए प्रकट कृपाला, दीनदयाला’ के भक्ति-भाव में रंगी-डूबी हुई। आपने ‘स्पीन डाक्टर्स’ की भूमिका जैसे लगते तेवर में लिखा है-‘‘यहाँ भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के कमाल पर भी नज़र डालनी होगी। आडवाणी ने उनके सत्तारोहण पर सरेआम उम्मीद जताई थी कि वे 2013 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी का परचम फहरायेंगे। सिंह ने समूचे सिंहत्व के साथ असम्भव को सम्भव कर दिखाया। इसीलिए इस बार मतदाता ने खुद के सारे बंधन तोड़ डाले हैं। इस बार वोट देश के लिए डाले गए न कि सूबाई, साम्प्रदायिक, भाषाई या जातीय आग्रहों के लिए।’’

यह पत्रकारीय अनुभव की साफ-सूथरी, निष्पक्ष अथवा वस्तुनिष्ठ आकलन-मूल्यांकन नहीं है। आपने ‘सिंह के सिंहत्व’ की भाषिक शब्दावली दुराग्रह/पूर्वग्रह के साथ प्रयोग में लाया है ताकि ‘मोदी के मोदीत्व’ वाले प्रभाव का ‘काउंटर’ किया जा सके। अन्यथा, आपके सुर अगली ही पंक्ति में शंकालु न हो जाते-‘‘नरेन्द्र मोदी ने भी शुरुआती रुझानों में जीत का रंग चोखा होता देख ट्वीट किया-‘भारत की विजय। अच्छे दिन आने वाले हैं।’ क्या वाकई?’’ द्वंद्व ठीक है, अंतर्विरोध सही है; लेकिन चरित्र में दुहरापन या विरोधाभास से बचना नितान्त जरूरी है। जिन शंकाशास्त्रियों यानी ‘कुछ लोगों’ को लक्ष्य कर आपने यह सम्पादकीय लिखा है यह बात उनके सन्दर्भ में भी सौ टके वाजिब और खरी मानी जाएगी।

एक और बात आपने अपनी सम्पादकीय में ‘पहले मारे सो मीर’ मुहावरा प्रयोग में लाया है। बचपन में हम भी ‘जो पहले खाई सोई राजा’ के ललक संग थाली से कवर उठाते थे। लेकिन अब उस बचकानेपन से ज़िन्दगी नहीं जी या गुजारी जा सकती है। आपने ठीक कहा है कि जंग जीतने के लिए हालात से लोहा लेना पड़ता है। बकौल आप-‘‘बरसों बाद ऐसा हुआ है, जब जाति, धर्म, क्षेत्र, सम्प्रदाय और भाषाओं के आग्रह पीछे छूट गए। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और असम से अरब सागर तक लोगों ने वोट की शक्ल में उन्हें अपनी उम्मीदों का अक्षय-पत्र सौंपा। आशा है कि वह बिना समय गंवाए देश की जन-भावनाओं के अनुरूप काम करेंगे।....नरेन्द्र मोदी को मनमोहन सिंह से कंपकंपाती अर्थव्यवस्था मिली है, पर निराश होने की जरूरत नहीं है।’’

आप यहीं नहीं रूकते हैं। आपको पता है कि देश की स्थिति नाजुक है। बीमार व्यक्ति के लिए ‘इमरर्जेंसी’ का अर्थ तत्काल राहत होता है। अर्थात् ‘फास्ट रिलिफ’ बिना किसी लेकिन, किन्तु, परन्तु के। तभी तो आप अपने सम्पादकीय(18 मई, 2014) में सच को कुछ इस तरह नमूदार करते हैं-‘‘यकीनन, नरेन्द्र मोदी को तेजी से अपना एजेण्डा लागू करना होगा। महंगाई और बेरोजगारी लोगों को जीने नहीं दे रही, नए रोजगार सृजित नहीं हो रहे और ऊपर से रुपए की गिरावट ने हमारी अर्थव्यवस्था को बेहाल कर रखा है। अनेक राज्यों में गैर-भाजपा सरकारें हैं। उनका सहयोग हासिल करना भी एक चुनौती होगी। उम्मीद है, मोदी का अनुभव और दृढ़ संकल्प उनकी राह हमवार करेगा। हालांकि, इस सबके लिए नरेन्द्र मोदी के पास समय बहुत कम है। हमारे देश की युवा पीढ़ी बेताब है। सोशल मीडिया जिस तरह उनका मोह बढ़ाता है, वैसे ही उसे भंग भी कर देता है। फिर अगले कुछ महीनों में हरियाणा, महाराष्ट्र, अरुणाचल प्रदेश, झारखण्ड और जम्मू-कश्मीर में चुनाव होने हैं। ये चुनाव उनकी पहली अग्निपरीक्षा होगी।’’

भारतीय जनता बेहद धीरजधर्मी है। वह अपनी ज़िन्दगी को ‘रील लाइफ’ नहीं मानती है। उसे बख़ूबी पता है कि-‘‘दिल्ली की सत्ता सदन में बैठे शख्स के हाथ में जादू की छड़ी होती है, जिसे वह हिलाएगा और महंगाई सहित सारी दिक्कतें दूर हो जाएगी।’’ दरअसल, सारी दिक्कत उन कथित बौद्धिक विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों के साथ हैं जिन्हें पहली बात बोलना नहीं आता और जो बोलते हैं उसका दूरगामी, ठोस एवं निर्णायक कोई अर्थ नहीं होता। फिलहाल, आप अपनी सोच को नई सरकार की धारा में बेवज़ह बहने से रोकें। आप इस बात से भली-भाँति परिचित हैं कि-‘‘आत्मप्रशंसा और खुशामद राजनेताओं की सबसे बड़ी शत्रु हैं।’’(01 जून, 2014) मोदी सरकार बनने के एक माह के भीतर आपने सम्पादकीय पृष्ठ पर आने वाली अपनी  तस्वीर का ‘पोज-पोजिशन’ बदला दिया है.....शशि शेखर जी, हमें पुराना वाला सम्पादक चाहिए जो चुनाव-पूर्व ‘आओ राजनीति करें’ की घोषणा करता है; तदुपरान्त ‘अब राजनीति ख़त्म, काम शुरू’ करने जैसी पत्रकारीय भूमिका का विधान रचता है; यदि वह ‘सिंह के सिंहत्व’ या ‘मोदी के मोदीत्व’ की राजनीति में फँस गया, तो फिर इन राजनीतिक शख़्सियतों का नीर-क्षीर मूल्यांकन कौन करेगा?

यदि आप इस पत्र को प्रकाशन योग्य समझें, तो मुझे अपनी ‘अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता’ सम्बन्धी मूल्य एवं प्रतिबद्धता को आपका वास्तविक संबल और सहयोग प्राप्त हो सकेगा। आशा है, आप स्वस्थ एवं सानंद होंगे।
सादर,

भवदीय
राजीव रंजन प्रसाद
वरिष्ठ शोध अध्येता
प्रयोजनमूलक हिन्दी पत्रकारिता
हिन्दी विभाग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
वाराणसी-221005
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