एक याचक पिता का पत्र अपने पुत्र के नाम

प्रिय दीप,

आज देव के साथ नहीं अकेले तुमसे संवाद करना चाहूँगा। 10वीं पास किए 16 साल हो गये। उतनी ही जितनी कि उम्र में हाईस्कूल पास किया था। स्कूल टाॅप किया था। बेरोजगारी अंतिम सचाई है उसी तरह जिस तरह आज डाॅक्टर ने कहा है कि तुम बिना ‘हियरिंग मशीन’ के नहीं सुन सकते। एक हफ़्ते की भागदौड़ और जाँच रिपोर्ट के बाद यह पता चलना बेहद दुःखद है कि मेरा बेटा साफ आवाज़ साफ-साफ बोलने पर भी बिना कान में मशीन लगाये नहीं सुन सकता है। रोई तुम्हारी मम्मी दिन भर। और मैं। अवाक्। हतप्रभ। कितना अनसुना किया। अपनी कैरियर बनाने के गुमान में तुम्हारा भविष्य दाँव पर लगा दिया। तुम्हारे जन्म वाले दिन मैं बीएचयू में प्रयोजनमूलक हिन्दी पत्रकारिता का बतौर विद्यार्थी होने के नाते ‘हाॅस्टल फीस’ जमा कर रहा था। हमारे और तुम्हारे बीच अनुपस्थिति, रिक्तता, शून्यता इत्यादि ढेरों रही। जब एम. ए. का गोल्ड मेडल तुम्हारे गले में डाला तो तुम्हारी माँ ने कहा था-‘यह खाने के लिए नहीं दे देगा, इसे निहार-निहार कर आदमी पेट नहीं पाल सकता है, ज़िदगी भर खुश नहीं रह सकता है।’ मैं सुनता किसकी हूँ तुम्हारी माँ का भी नहीं सुना। आज डाॅक्टरी पर्ची में कहा गया है कि-‘आपका बच्चा बिना हियरिंग मशीन के आपको सामान्य बच्चों की तरह कभी नहीं सुन सकता है।’

दीप, इस बार 25 जुलाई को तुम सात वर्ष के हो जाओगे। लेकिन, मैं अभी तक बिना काम-धंधा का हूँ। जिस काम में खुद को रोप रखा हूँ उसकी कोई कीमत नहीं है। बीएचयू की वैकेंसी साल भर पहले निकली थी जिसमें मेरा होना लोगों ने कहा तय है...लेकिन यह कब होगा यही बस तय नहीं है। मेरे बच्चे, अब यह सब बर्दाश्त नहीं होता। अकादमिक दुनिया में बड़ी महीन राजनीति चली जाती है। सत्य और ईमान की बात करना ही आजकल शिक्षा का उद्देश्य है। उसे अमली जामा पहनाने और पहनने वाले गायब हैं। शिगूफ़े में ज़िदगी कटती है। हवाओं में ‘अच्छे दिन’ का बवण्डर नाचता है।....ज़िदगी ऐसे ही चलती जाती है। यही आज का सच है और तुम्हारा पिता भी इसी सच का शिकार है।

दीप, मैंने सबके लिए बहुत कुछ किया। लेकिन गिनती शून्य। कठघरे में मैं; मेरा मनोबल, संकल्प, दृढ़इच्छाशक्ति, साहस और आत्मविश्वास है। मैंने 1999 ई. से लिखना शुरू किया। दिल्ली प्रेस की पत्रिका ‘सुमन सौरभ’ में दो दर्जन कहानियाँ प्रकाशित हुई। सोचा, हम दुनिया बदलने के लिए लिख रहे हैं। मेरा स्वयं को इस राह पर रखना कितना महँगा पड़ा है, इसका सिला तुम्हें भी भुगतना पड़ रहा है। अपने काम के प्रति जवाबदेह रहने वाला लड़का आज अपने लिखे-पढ़े का ही शिकार है। मेरे चारों ओर पत्र-पत्रिकाओं के कतरन उड़ रहे हैं-सुमन-सौरभ, सरस सलिल, मुक्ता, सबलोग, मीडिया विमर्श, कादम्बिनी, समकालीन तीसरी दुनिया, समकालीन जनमत, समागम, परिकथा, अक्षर पर्व, नव निकष, प्रभात ख़बर, जनसत्ता.....!

दीप, मेरा कमरा इतने पत्र-पत्रिकाओं और किताबों से भरा है कि यदि उसी में मुझे ढाँक-तोप कर फूँक दिया जाये, तो राम नाम सत्य हो जाएगा। खैर! मैंने अपने काम में गुणवत्ता की हमेशा मान रखी, जितनी मेरी क्षमता है। लोग कहकहे लगा सकते हैं, लेकिन मेरे समक्ष खड़ा होकर कुतर्क करने की हैसियत किसी में नहीं है। मैं जो जानता हूँ और जितना जानता हूँ, उस पर स्वस्थ बहस कर सकता हूँ। लेकिन, ज़िदगी सिर्फ बहस-मुबाहिसे, वाद-विवाद संवाद, चिन्तन-विमर्श से नहीं चला करती है। उसके लिए यथार्थवादी दृष्टिकोण और अंतःदृष्टि के अतिरिक्त भी चीजें जुटानी पड़ती है। पौआ और पाँवपूजी के लिए अपने को तैयार करना पड़ता है। आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ने वालों की बहुत बुरी गत होती है....मेरी भी हो रही है; लेकिन, मुझे अपनी शर्तों के अलावा किसी के शर्तों पर जीना पसंद नहीं है। मेरे लिए शायद! जीना इसी का नाम है। अपने बारे में मैं और कुछ नहीं कहना चाहता हूँ। तुम मुझे सही समझो या ग़लत; मैं तुम्हारा गुनाहगार हूँ और मुझे तुम्हारी दी हर सजा कबूल है।

तुम और देव चीरंजीवी होवो, यशस्वी होवो; शुभकामना!

तुम्हारा अकमासुत पिता
राजीव  
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