शोध-पत्र : भारतीय लोकतंत्र में जातिवादी सामन्ती सोच है, सीमान्त के लिए मानवीय सोच नहीं है.....!!!

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भारत में लोकतंत्रनुमा सामन्ती रियासत है। इस रियासत में पाँचसाला चुनाव होते हैं। लेकिन, इन प्रान्तीय/राष्ट्रीय चुनावों में जनता की वास्तविक हिस्सेदारी क्या है और कैसी है? यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है। सचाई की धरातल पर थोड़ा नैतिक मनोभाव से विचार करें, तो भारतीय जन सामन्तशाही के कुचक्र में इस कदर फँसे हैं कि उन्हें चारो ओर अन्धकार ही अन्धकार दिखाई दे रहा है। पार्टियाँ सत्ता के केन्द्र में लगातार बदलती रहती हैं, लेकिन गाँधी के ‘अन्तिम जन’ की स्थिति में कोई आमूल-चूल परिवर्तन नहीं होता है। दरअसल, राजनीति में वंशवाद विषबेल की तरह पनपा हुआ है। यह वंशपूजक विधान भारतीय लोकतंत्र का स्थायी भाव या कि चरित्र बन चुका है। कुनबापरस्ती अथवा भाई-भतीजावाद की यह प्रवृत्ति इस कदर खतरनाक है कि इससे हमारी समष्टीय स्वतन्त्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मानवीय गुण लगातार चोटिल हो रहे हंै।

सन् 47 में स्वाधीन हुए भारतीय लोकतंत्र में आज भी अर्थ अथवा शक्ति-सम्पन्न जातियों का वर्चस्व है। इस नाजायज़ चैधराहट को राजनीतिक शह मिले होने के कारण देश की बहुसंख्य पिछड़ी एवं दलित जातियाँ तमाम तरह की यातानाओं-अत्याचारों की शिकार है। एक बड़ी आबादी जीवन की मूलभूत सुविधाओं से मरहूम है; बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है, वह पलायित है, विस्थापित है अथवा खनाबदोश जनजातियों की भाँति किसी प्रकार अपना गुज़र-बसर करने को अभिशप्त हैं। लेकिन, लोकतंत्र के अहाते में पौ फटते नहीं दिखाई दे रहे हैं। दुर्भावनाग्रस्त और श्रेष्ठताग्रंथि की शिकार जातियाँ आर्थिक-सामाजिक मजबूती के स्तर पर पूरी तरह फीट-फाट हैं। अतएव, राजतंत्र का शासकीय बर्ताव उदीयमान है। अच्छे लोगों के ‘अच्छे दिन’ अच्छे से गुज़र रहे हैं।

यह कहना बेहद सालता है, किन्तु सचाई यही है कि देश में आज भी 85 प्रतिशत सीमान्त किसान बदहाली की राह पर हैं। उनकी भूमि पर कब्जा केवल 1.5 हेक्टेयर है। उन्हें कोई ऋण नहीं देता है। वे बाज़ार तक नहीं पहुँच पाते हैं और जब बाज़ार पहुँचता है, तो वहाँ बैठे दलाल और मुनाफाख़ोर सक्रिय हो जाते हैं। नतीजतन, वास्तविक मूल्य उस किसान को कभी नहीं मिल पाता है। इसलिए जहाँ किसानों की अपनी ज़मीन भी है, वहाँ भी वे बंधुआ मजदूरों की तरह काम कर रहे हैं। दरअसल, आज राजनीति न्यूनतम आज़ादी और सुविधा की शर्त पर अपने विरोधी को ज़िन्दा रखने का एक शातिराना उपक्रम चलाए हुए है। वर्तमान समय में भारतीय जनता आर्थिक विषमता एवं सामाजिक भेदभाव की मनोदशा एवं मनःस्थिति से पीड़ित है। स्वातंन्न्योत्तर भारत में जनतांत्रिक सत्ता की स्थापना का जो खेल हुआ; उसका लाभ सवर्णवादियों और सामन्तवादियों को छोड़कर दूसरे वर्ग के लोगों को सायासतः होने ही नहीं दिया गया। परिणाम यह हुआ है कि लोकतंत्र का हालिया सूरत बदहाली के भावमुद्रा में जड़बंध है। सवर्णवादी लोगों ने कार्यिक स्तर पर अवाम के लिए समान नीति-निर्देशक तत्त्व बनाए हुये हैं; लेकिन अपने लिए ‘बेयाॅण्ड दि बाउण्ड्री’ बहुत सी सहूलियतों की लम्बी-चैड़ी फ़ेहरिस्त कायम कर रखी है।

सन् 1990 ई. में भारत में नवउदारवाद की आँधी में घोर जातिवादी कमण्डल की पकड़ ढीली हुई, तो मंडल कमीशन को सुगबुगाने का समय मिल गया। सामाजिक वर्चस्व की एकतरफा दीवारें दरकने लगी। मंडल के विरोध की तक़रीरे गढ़ी गई; लेकिन मूल समस्या कुछ और थी जिससे निपटने के लिए इस मुद्दे को अपने हाल पर ज्यों का त्यों छोड़ दिया गया; और इस तरह ‘आरक्षण’ का बोतलबन्द जिन्न बाहर निकला और इस तरह आमजन में उपेक्षित लोगों को भी सरकारी कुर्सीयों पर बैठने का अधिकार हासिल हो गया। उन दिनों सबसे गम्भीर संकट जातिवादी लोकतंत्र के लिए यह उत्पन्न हुआ कि अब पूँजी सत्ता को केन्द्रीय महत्त्व का विषयवस्तु माने जाने लगा। इसके जवाबी कार्रवाई के बतौर कुछ अनैतिक/असामाजिक जातदारों ने पागल हाथी टाइप वहशी ‘शार्प-शूटरों’ को पालना शुरू कर दिया।बाद में इन पोसुआ हैवानों की टोली लोकतंत्र के सेहत के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध हुईं। ...और इस तरह भारत में ‘राजनीति का अपराधीकरण और अपराध का राजनीतिकरण’ बतौर मुहावरा एक नारे की तरह चर्चित हो गया।

वर्तमान राजनीति में बाहुबलियों/दागियों की घुसपैठ जिन वजहों से हुई है; वस्तुतः उनमें एक बड़ी वजह ‘सत्ता-सम्पन्न जातदारों’ के मन में समाया हुआ ‘असुरक्षा बोध’ और ‘आत्महीनता की स्थिति’ है। भ्रष्टाचार उसी की अंदरूनी प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति है। दरअसल, राजनीति में घुसी यह जातदारी प्रवृत्ति मौजूदा चुनाव(लोकसभा चुनाव-2014) में जिस तरह आलोकित-प्रलोकित हुई है; उसे देखते हुए भविष्य की राजनीति का जो खाका मन-मस्तिष्क में बनता है; वह बेहद खौफ़नाक और दहशतज़दां है। कहने को तो हमें ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ का नारा ख़ूब लुभा रहा है; लेकिन, वास्तविकता में यह सिर्फ और सिर्फ प्रवंचना साबित होने वाला है...और कुछ नहीं। यदि मेरी यह राय ग़लत साबित होती है, तो समझिए ...सिंहासन खाली हो चुकी है और जनता उस पर आसीन हो गई है!!!

आइए, उस पर इस शोध-पत्र के अन्तर्गत विवेकसम्मत एवं वस्तुनिष्ठ ढंग से विचार करें...!



(...शेष फिर कभी)
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