काॅरपोरेट पत्रिकाएँ : अमानुषिकता की सुनहरी(?) इबारतें


26 मई, 2014 नरेन्द्र मोदी जी प्रधानमंत्री पद का शपथ लेने वाले थे। यह ख़बर बहुत बड़ी थी। मीडिया के भाव(कीमत) उस रोज बढ़े हुए थे। अतः इलेक्टाॅनिक मीडिया ने संयुक्त अभियान चलाते हुए ‘गोरखधाम एक्सप्रेस’ के दुर्घटनाग्रस्त होने की ख़बर को नज़रअन्दाज कर दिया। सूचनापट्टी पर एकाध लाइन आई भी, तो महज़ सांकेतिक। लेकिन, पाठकबहुल पत्रिकाओं को क्यों लकवा मार गया? ये पत्रिकाएँ तो पाठकों द्वारा खूब पढ़ी और सराही जाती हैं। पाठक-वर्ग का उनपर अगाध विश्वास भी कायम है।

नज़र दौड़ाइए:

आउटलुक    1-15 जून, 2014; सम्पादक: नीलाभ मिश्र
इंडिया टुडे    1-11 जून, 2014; प्रधान सम्पादक: अरुण पुरी
शुक्रवार        30 मई से 05 जून, 2014: ‘हिन्दी का श्रेष्ठ समाचार साप्ताहिक’ पत्रिका; सम्पादक: उदय सिन्हा
तहलका        1-15 जून, 2014:: ‘स्वतंत्र, निष्पक्ष, निर्भीक’ पत्रिका; कार्यकारी सम्पादक: संजय दुबे
गवर्नेंस नाउ    1-15 जून, 2014: ‘सुशासन की आवाज़’ की पत्रिका; सम्पादक: अजय सिंह
यथावत        1-15 जून, 2014: ‘वाद-विवाद-संवाद’ की पत्रिका; रामबहादुर राय

इन पत्रिकाओं के ताज़ातरीन अंक चमचमाते पृष्ठ और खूबसूरत रंगो/रेखांकनों/दृश्यों से अटे पड़े हैं। इस वक्त शब्दों की सुनहरी इबारते सबसे ज्यादा अमानुषिक प्रतीत हो रही हैं। यह साफ दिख रहा है कि इन काॅरपोरेट पत्रिकाओं का मुनाफा चाहे जनतंत्र की बलि देकर या कि नर-बलि दे कर ही क्यों न पूरी हो, वो इस रवायत को बदलने के हामी कतई नहीं हैं। गोरखधाम एक्सप्रेस के बुरी तरह दुर्घटनाग्रस्त होने की ख़बर उपर्युक्त पत्रिकाओं में से किसी में भी नहीं है।

बंधुवर, होने या न होने से काफी फर्क पड़ता है: पत्रकारिता की शुचिता इसी से तय होती है: संकल्प, साहस, और विवेक की चेतना इसी पत्रकारीय-मूल्य में फलित होते हैं। कईयो से मैंने पूछा, तो उनका जवाब था-‘अरे! टेलीविज़न पर देख लिया न! हो गया। रोज तो कांड-ए-कांड हो रहा है। आप भी लगते हैं फ़ालतू का मग़जमारी करने।’ मैं हतप्रभ। अवाक्। आश्चर्यचकित। हम ऐसे कैसे होते जा रहे हैं। मीडियावी लिजलिजापन पसर रहा है। वह हमें आॅक्टोपस की तरह अपनी बलशाली भुजाओं में जकड़ हमारे छाती पर मूंग दल रहा है।
और हम यह राग गा रहे है-

'हम न मरैं मरिहै संसारा, हमकौ मिला जिआवनहारा'। 


कबीर की उक्त पंक्ति भले किसी और अर्थ-सन्दर्भ में हो। मुझे यहाँ इसका प्रयोग उचित लग रहा है। क्या हमारा इन बिन्दुओं पर सोचना नाहक है? क्या ऐसी ख़बरों को जानबूझकर काॅरपोरेट पत्रिकाओं द्वारा तरजीह न दिए जाने के मसले को उठाना बेवकूफी है? दो दर्जन लोगों की इस ट्रेन हादसे में मौत हो गई और सैकड़ों घायल हैं; इस बारे में चिन्ता जाहिर करना उल्टे मेरा ही किसी का ‘टाइम वेस्ट’ करना है? इस दुर्घटना में जिस तरह की लापरवाही होने के संकेत मिल रहे हैं; क्या उसे सामान्य मान रहने देना चाहिए? सब चुप हैं, लेकिन यह चुप्पी बेहद ख़तरनाक है।

आपकी तकलीफ बढ़ेगी.... इस घड़ी आप आना हाथ जगन्नाथ करने में मशगूल हैं,  लेकिन मैं आपसे आग्रह/निवेदन कर रहा हूँ कि मामला चाहे हत्या-बलात्कार का हो या दुर्घटना-आपदा का; यदि मौजूदा पत्रकारिता ऐसे मौके पर मानवीय रुख नहीं अपनाती है; संवेदनशीलता के जरूरी क्षण में भी वह अकर्मण्य बनी रहती है, तो निश्चय जानिए मौत के मुँह में जाने की अबकी बारी हम सबकी है.....! कवि रघुवीर सहाय की कविता के शीर्षक ‘हँसो, हँसो, जल्दी हँसो’ की तर्ज़ पर कहें, तो-‘चेतोे, चेतोे, जल्दी चेतो’।


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