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Showing posts from June, 2016

मेरे आत्मविस्तारक ने कहा, काम की जुनून में खपो, तो दुनिया की मत सोचो; तुम्हारी हर बदमाशियाँ काम दिखाकर औरों को चुप करा लेंगी....

वाह! रजीबा वाह!

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Virtual Popularity :  Sign & Language Propaganda in Indian Politics आँकड़ों से बात नहीं बनती, सूरत भी मिलनी चाहिए ---------   सुनो नरेन्द्र! तेरा मन बदल रहा है...तेरा मन बढ़ रहा है
''नरेन्द्र तुम्हारे पास माँ है और जिसके पास अपनी कोख से पैदा करने वाली माँ ज़िंदा हो, वह अपनी भारत माता का हमेशा जय-जय करेगा। अगर नहीं कर सका, तो यह पूरे देश का दुर्भाग्य होगा।''

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भारत में भ्रष्टाचार है क्योंकि लिखा-पढ़ी का सारा काम अंग्रेजी में होता है यानी अधिसंख्य जनता को न समझ में आने वाली भाषा में

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मैंने बस यह कहा
और मुझे उन्होंने खूब मारा
मैंने वजह पूछा?
और उन्होंने मुझे फिर मारा
मैं वजह जानने खातिर
बार-बार पूछता रहा
और वे मुझे लगातार मारते रहे

एक क्षण
मैं खामोंश
मेरी ज़बान जिबह हो गई

अफसोस! कि इस पूरे वाकये का
किसी पर कोई असर नहीं पड़ा
दुनिया अपनी रौ में बजती रहे
अविराम, अविचल, अखटक....

पृथ्वी ढलान पर है, संझावत का दीया जला दे रे, मीत!

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मीत, माटी से प्रेम अधपका नहीं है रे,
अधखिला नहीं है पुष्पों की झुंड में गीत गाना
मीत, जंगल से प्रेम जंगली होना नहीं है रे......!

खेत से पानी ओरा जाना
हीक भर न भर पाना पशुओं का पेट
गर्लफ्रंड का घुमने खातिर खखनने से
मीत, बहुत ज्यादा खतरनाक है रे.....!

यात्रा पर निकले पंक्षियों का बिला जाना
जाकर अपने देश को न लौट पाना
दीवाल पर जमे काई के न उतरने से
मीत, बहुत ज्यादा खतरनाक है रे.....!

बच्चों की पीपीहरी में शामिल
हवा का अचानक गुम हो जाना
डिस्कोथिक में आवाज़ के परपराने से
मीत, बहुत ज्यादा खतरनाक है रे.....!
अँधीली बयार का जोर-दाब से बहना
और नदी के देह का पीला हो जाना
गर्भवती स्त्री का खून कमती होने से
मीत, बहुत ज्यादा खतरनाक है रे.....!

शब्द में लिखना आसान होकर भी
अपनी भाषा के मिठास को गँवा देना
नई दुल्हन का मेकअप ख़राब होन से
मीत, बहुत ज्यादा खतरनाक है रे.....!

 पृथ्वी ढलान पर है, संझावत का दीया जला दे रे, मीत!

स्मार्ट फोन नहीं, तो सौरी!

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आजकल मार्केट के खूब काॅल आते हैं। एक काॅल आया कि आपके लिए हमारे पास ये-ये स्कीम है और उसका वे-वे फायदे हैं। बस आपको करना यह है कि अपने स्मार्ट फोन से सारा काम कर लेना होगा।

मैंने कहा, मेरे पास स्मार्टफोन नहीं है।

जवाब मिला, ‘क्या!!!’

फोन कट गया। फिर नहीं आया।

मेरा मुँह कद्दू हो गया। स्मार्ट फोन नहीं, तो क्या खाक स्टेटस। फेसबुक/ट्वीटर पर अकांउट नहीं तो झंड इटेलेक्चुअल।

ओह! सौरी, मैं तो बाज़ार की तरह भावनाओं का दोहन करने लगा। मेरे पास मोबाइल है, माइक्रोमेक्स की। कीमत एक हजार पचास रुपए।

मुझे स्मार्टफोन की जरूरत नहीं।

कृपया आप भी मुझे यह सोचकर कभी न फोन करें कि मेरे पास स्मार्टफोन है। वैसे भी आपको मेरी जरूरत क्यों हो, जरूरत तो पूरे देश को स्मार्टफोन की है।



फ़िल्म अलीगढ़: सचाई के बाहर और भीतर बहुत कुछ

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राजीव रंजन प्रसाद -----------


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सच के चश्मदीद नहीं होते; और हुए तो उन्हें आजकल सिरफिरा माना जाता है। यह बात सटीक बैठती है जब फिल्म अलीगढ़ ख़त्म होने की पगडंडी पर अपना आखिरी दृश्य दिखा रही होती है। ‘70 एम.एम.’ के परदे पर आप सबकुछ आँख के सामने घटित होता हुआ देखते हैं जबकि निगाहें जितनी जल्दी हो इस सच से बाहर आने के लिए शोर मचाने लगती हैं। किसी ने खूब कहा है,-‘गोली मार भेजे में...भेजा शोर करता है!’ 



ध्यान दें, अलीगढ़ शहर में सन् 1877 में नींव पड़ी एक ऐसे काॅलेज की जिसे 1920 ई. के बाद से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाने लगा। इसकी बुनियाद सर सैय्यद अहमद खान ने रखी। नाम दिया,-‘मोहम्मडन आंग्लो ओरियंटल काॅलेज’। 468 एकड़ भूभाग में फैले इस विश्वविद्यालय में पुराने-नए मिलाकर 300 पाठ्यक्रम चलते हैं। तथ्य अपने होने का सच बाँचते हैं कि इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न राज्यों से ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से पढ़ने आने वालों की कुल तादाद करीब 28 हजार है जिन्…

मोदी का ‘पाॅवर इमेज’ और अमेरिकी-भारत

व्यापारिक हित-लाभ में पारस्परिकता और पूरक सहयोग-समर्थन का होना अनिवार्य है। आर्थिक मसले को वैश्विकता के दायरे में देखना और अपनाना मुनासिब है; लेकिन इसका लिहाफ़ लेकर किसी की क्रूरता, बर्बरता और अमानुषिक कार्रवाईयों के खि़लाफ न बोलना वाज़िब नही कहा जा सकता है। अमेरिका में हजारों अच्छाइयाँ हैं और हम उसकी सराहना करते हैं; पर अमरिकी मूलप्रवृत्ति में शामिल कुछ बुराइयाँ इतने घातक-विध्वंसक हैं जिन्हें अमेरिकी सीनेटरों के तालियों की गड़गड़ाहटों के बीच नहीं खोने देना चाहिए।  ........................ राजीव रंजन प्रसाद

अमेरिका भारत से बाहर एक संयुक्त राष्ट्र है। भारतीय प्रधानमंत्री कल वहीं थे। हमने उन्हें वहाँ से अंग्रेजी में बोलते देखा और सुना। उनके कहन का अंदाज सधा हुआ था और वे सुस्थिर चित्त के साथ रणनीतिक राजनीति का काबिलेतारीफ वक्तव्य देते नजर आए। इन दिनों भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा से अमेरिका परिचित है। इस सम्बन्ध को अमेरिकी संसद ने भारतीय प्रधानमंत्री के पूरे भाषणकाल के दौरान तालियों से तवज्जों दी। यह भारतीय प्रधानमंत्री के ‘पाॅवर इमेज’ का ही मिसाल है कि अमेरिकी सीनेटर एवं मौजूद गणमान्य लोग भाषण के द…

वे जो जिंदा जलने से बच गए मथुरा में

मथुरा के ताजा अपराधी रामवृक्ष के प्रति सहानुभूति सही नहीं कही जा सकती है, लेकिन जो हजारों लोग उसके साथ बताए जा रहे हैं-वे कौन हैं और कहाँ अब जाएँगे इस बारे में तफ्तीश हो। ऐसी घटनाओं का पूरा परिप्रेक्ष्य सामने लाना मीडिया का धर्म है और यह बताना भी कि रामवृक्ष जैसे लोग एक दिन में इतना खुंखार नहीं बनते बल्कि हमारी खामोशी घर में बारूद की परवरिश किया करती हैं....  ..............................   राजीव रंजन प्रसाद -----
मीडिया अब उनकी खोज-पड़ताल और शिनाख़्त में जुटी है जो रामवृक्ष के साथ थे। हम भी चाहते हैं कि बात सिर्फ रामवृक्ष की क्यों हो? बात उनकी क्यों नहीं की जानी चाहिए जो मथुरा में रामवृक्ष के साथ सत्याग्रही बनने को बाध्य थे। क्यों और कैसे विवश किया जाता रहा उन्हें? वे वहाँ कैसी जिंदगी जी रहे थे और क्यों? बड़ा सवाल यह है कि इस देश में कैसे मासूम और निर्दोष लोगों को गुलामों की तरह रखा जाता है। ऐसी वैचारिकी के प्रणेता जिसे पूरी मीडिया आंतक का पर्याय कह रही है, वह उसके जुर्म के खिलाफ़ आज ही क्यों मुँह खोल रही है? मथुरा की पत्रकारिता क्यों अब तक लकवाग्रस्त रही? क्यों इस इलाके में हजारों लोग इ…