फ़िल्म अलीगढ़: सचाई के बाहर और भीतर बहुत कुछ

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राजीव रंजन प्रसाद
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सच के चश्मदीद नहीं होते; और हुए तो उन्हें आजकल सिरफिरा माना जाता है। यह बात सटीक बैठती है जब फिल्म अलीगढ़ ख़त्म होने की पगडंडी पर अपना आखिरी दृश्य दिखा रही होती है। ‘70 एम.एम.’ के परदे पर आप सबकुछ आँख के सामने घटित होता हुआ देखते हैं जबकि निगाहें जितनी जल्दी हो इस सच से बाहर आने के लिए शोर मचाने लगती हैं। किसी ने खूब कहा है,-‘गोली मार भेजे में...भेजा शोर करता है!’ 



ध्यान दें, अलीगढ़ शहर में सन् 1877 में नींव पड़ी एक ऐसे काॅलेज की जिसे 1920 ई. के बाद से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाने लगा। इसकी बुनियाद सर सैय्यद अहमद खान ने रखी। नाम दिया,-‘मोहम्मडन आंग्लो ओरियंटल काॅलेज’। 468 एकड़ भूभाग में फैले इस विश्वविद्यालय में पुराने-नए मिलाकर 300 पाठ्यक्रम चलते हैं। तथ्य अपने होने का सच बाँचते हैं कि इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न राज्यों से ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से पढ़ने आने वालों की कुल तादाद करीब 28 हजार है जिन्हें तकरीबन एक हजार से अधिक प्राध्यापक(गिनती में 1342) की देख-रेख में पढ़ने का सुअवसर प्राप्त होता है। यूँ तो अकादमिक रवैयों और भारतीय विश्वविद्यालयों के कर्मकाण्ड से जो लोग परिचित हैं उनके समक्ष उच्च शिक्षा की बानगी पेश करने की जरूरत नहीं है। तब भी यह कहना आवश्यक है कि इन विश्वविद्यालयों में जो लोग भलमनसाहत के साथ पढ़ना-पढ़ाना चाहते हैं; उनकी स्थिति नाजुक, तो जिंदगी कमोबेश नारकीय बनी हुई है। ईमानदारी के कपोत उड़ाने वाले अक्सर दंडित और प्रताड़ित होते हैं, जबकि ईमानदारी का स्वांग रचते हुए कबूतरबाजी-कला में पारंगत लोगों की सरेआम चाँदी है, खुलेआम नाम, प्रतिष्ठा और सम्मान है। 

एक विश्वविद्यालय की किलेबंदी में घटने वाली एक ऐसी ही हौलनाक घटना की सचबयानी है-फ़िल्म ‘अलीगढ’। यह कहानी जिनके ऊपर ‘बेस्ड’ है। वह हैं, डाॅ. श्रीनिवास रामचन्द्र सिरास। पेशे से प्रोफेसर डाॅ. सिरास आधुनिक भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष और मराठी साहित्य के ‘स्काॅलर’ थे। नागपुर विश्वविद्यालय से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और मराठी भाषा में ‘डाॅक्टरेट’ की उपाधि भी। एक दिन डाॅ. सिरास अपने कलाई की नस काट लेते हैं और वे अपने ही घर में मृत पाए जाते हैं। डाॅ. सिरास न्याय के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी, कानूनन जीते; लेकिन अपनी चोटिल स्वाभिमान और आत्मसम्मान के आगे वह हार गए। सच की कुरेद कितनी तकलीफ़देह और भयावह होती है; यह इस फिल्म को देखकर ही समझा जा सकता है। डाॅ. सिरास ने खुदकुशी करने का निर्णय जिस तरीके से और जिस समय लिया; वह समझने के लिए दिमाग नहीं दिल की जरूरत पड़ती है और यह तभी संभव है जब हम इस फ़िल्म के किरदार से तादाकार भाव स्थापित कर लें, समानुभूति के स्तर पर संजीदगी के सच को अपनी आँखों में ढलक जाने दें। पूरी तौर पर खुदकुशी करने से पूर्व डाॅ. सिरास ने जो पल जिया और जैसे जिया; वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए हँसी-ठ्ठा का खेल नहीं हो सकता है। इस नज़रिए से फ़िल्म ‘अलीगढ़’ को देखते हुए दर्शक का कलेजा एकबारगी मुँह को आ जाता है; अपनेआप के भरोसे में मन-दिल दहल उठता है।  


मनोज वाजपेयी की किरदारी से जो लोग वाकिफ़ हैं, उनके लिए यह फिल्म बेमिसाल है। वह सिर्फ इस नाते नहीं कि.....


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