वे जो जिंदा जलने से बच गए मथुरा में


मथुरा के ताजा अपराधी रामवृक्ष के प्रति सहानुभूति सही नहीं कही जा सकती है, लेकिन जो हजारों लोग उसके साथ बताए जा रहे हैं-वे कौन हैं और कहाँ अब जाएँगे इस बारे में तफ्तीश हो। ऐसी घटनाओं का पूरा परिप्रेक्ष्य सामने लाना मीडिया का धर्म है और यह बताना भी कि रामवृक्ष जैसे लोग एक दिन में इतना खुंखार नहीं बनते बल्कि हमारी खामोशी घर में बारूद की परवरिश किया करती हैं.... 
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राजीव रंजन प्रसाद
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मीडिया अब उनकी खोज-पड़ताल और शिनाख़्त में जुटी है जो रामवृक्ष के साथ थे। हम भी चाहते हैं कि बात सिर्फ रामवृक्ष की क्यों हो? बात उनकी क्यों नहीं की जानी चाहिए जो मथुरा में रामवृक्ष के साथ सत्याग्रही बनने को बाध्य थे। क्यों और कैसे विवश किया जाता रहा उन्हें? वे वहाँ कैसी जिंदगी जी रहे थे और क्यों? बड़ा सवाल यह है कि इस देश में कैसे मासूम और निर्दोष लोगों को गुलामों की तरह रखा जाता है। ऐसी वैचारिकी के प्रणेता जिसे पूरी मीडिया आंतक का पर्याय कह रही है, वह उसके जुर्म के खिलाफ़ आज ही क्यों मुँह खोल रही है? मथुरा की पत्रकारिता क्यों अब तक लकवाग्रस्त रही? क्यों इस इलाके में हजारों लोग इंसानों से बदतर जिंदगी जी रहे थे जबकि उनका सरगना एसी कमरे में हथियारबंद दस्तों के साथ रहा करता था? मीडिया सच का सिरा न पकड़े पूरा सच सामने लाए, यह जरूरी है।

हमारा यह जानने का हक है कि रामवृक्ष ने सरकार के कितनी संपत्ति हड़प कर रखा है? काले धन कितनी मौजूद है? साथ ही उसका अधिकतम बैंक बैलेंस कितना है? इस पूरे घटनाक्रम की दुखद पहलू यह है कि यह पूरी कहानी मीडिया की भाषा और आवाज़ में एकतरफा बाँची जा रही है, ऐसे में वह दिन दूर नहीं जिसमें सबका मारा जाना, बंधक हो जाना, आतंकी हो जाना, अपराधी हो जाना तय है। मिनटों में पूरी दुनिया किसी के खि़लाफ भर-भर मुँह बोलने लग सकती है। उसके लिए खतरनाक तरीके से जुमले की भाषा में प्रहार कर सकती है। एक आदमी के सनकीपन की सजा हजारों लोग भुगते यह इंसाफ नहीं है। यदि लोग खाने-पीने-रहने की व्यवस्था होने के कारण उस जगह को स्वेच्छा से चुन रहे थे, तो यह भी सरकारी लीला पर किसी तोहमत से कम नहीं है। फिलहाल खुशहाल उत्तर प्रदेश का नारा देने वालों और राग अलापने वाले शर्म करें! 

यह देखा जाना जरूरी है कि वे कौन लोग कौन थे जो अनुयायी की वेश में रामवृक्ष के साथ थे। क्या उन्होंने यह रहवास स्वेच्छा से चुना था? क्या उन सबका(सिर्फ रामवृक्ष का नहीं) राजनीतिक ‘कनेक्शन’ जबर्दस्त था। उनके बेटे-बेटियाँ करोड़पति और हर तरीके के सुख-सुविधा से सम्पन्न थे। जो लोग इतनी तादाद में रामवृक्ष के साथ थे वे अपनी पूरी जिंदगी इस तरह दाँव पर रखकर ऐसे गुर्गों में किन वजहों से शामिल थे या हो रहे थे? 

जबतक इन सवालों का हम जवाब नहीं ढूंढ लेते, तबतक भारत में जारी ऐसे अवैध और गोपनीय नरसंहारों का पता नहीं चल सकता। यह सच है कि इस देश में लोग ग़लत देखने और सुनने का आदी हो चुके हैं। वह ताबड़तोड़ ख़बर-दर-ख़बर देख रहे हैं। लेकिन इस त्रासदी की भयावहता का असली पता तब चलता है जब इसकी निष्पक्ष आलोचना, आंकलन और विश्लेषण की जाती है। आज मीडिया में ‘फटाफट न्यूज़’ दिखाने का रिवाज़ है। इस नए चलन में ‘न्यूज’ क्या, कब, कौन, कहाँ, कैसे, क्यों, कबतक, किसतरह आदि प्रश्नों से टकराने की जगह बस उसे सूचित मात्र कर देती है। इसतरह मीडिया का आधुनिक सूचनाशास्त्र संचार की नई राजनीति को पाल-पोस रही है। इस राजनीति में लोकतांत्रिक विधान की गरदन कट गई है; न्यायालय बिना सिर के रेंग रही है; भ्रष्ट व्यक्तित्व की सरकार चुने जाने, राज करने और हट जाने की प्रक्रिया में पूरी तरह फिट हैं। 

आजकल हर अपराध एक अभिनय है। हर खेल मनोरंजन है। कुछ आदमी अपने जीने के लिए अपने जैसों को निवाला बना रहे हैं। मीडिया अपने पर भूखमरी न छाए, इसलिए वह भ्रष्ट तंत्र के तलवे में मालिश कर रही है। कुकुरमुतों की तरह चाट रही है। ऐसे ख़बरों को देख-सुनकर हमें अब घिन नहीं आती शायद! हमें पता है कि हम ही कौन दूध से धुले हैं.....
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