स्त्री


......

मेरे भीतर एक स्त्री
बना रही है मेरे लिए नाश्ता
और मैं खाना चाह रहा हूँ उसका गोश्त

मेरे भीतर वही स्त्री
मेरे पस्त हौसले की मालिश कर रही है
और मैं उसकी पीठ पर करना चाहता हूँ प्रहार

मेरे भीतर की स्त्री ने
शायद भाँप ली है मेरे मर्दाना चालाकियों को
इसलिए वह भोजन में मिला रही है जहर की थोड़ी मात्रा
तेल में धीमी असर करने वाले जीवाणु
ताकि वह अपने स्त्रीत्व को मार सके

मैं आक्रांत, भयंकर भयभीत, आकुल, परेशान, हैरान, बेचैन, बदहवाश,
क्योंकि उस स्त्री के मरते ही मर जाएगा यह पूरा विश्व।

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