अँकवारी में घर-परिवार के भाखा

राजीव रंजन प्रसाद
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अन्तरराष्ट्रीय परिवार दिवस/15 मई

मम्मी हमार भोजपुरी बोलेली। बाकी सब लोगन हिंदी। हमनी के ऊँचा क्लास में पढ़े लिखे-लगलिं जा त इ बुझाइल कि ऊहाँ आपन भोजपुरी नाहीं चली। ओइजिग खाति हिंदी सीखेला पड़ी सबकन के। छोट-बड़ सब रेंगा-बेगारी स्कूल के मास्टर से हिंदी पढ़े शुरू कइलिं जा, त लागल जइसे कलेजा के बात बाहर नइखे आ पावत। एकदम दूजी किसिम के भाषा बुझात रहे हमनी के। बाद में धीरे-धीरे ऐसे सधाइल कि हिंदी त मजे से कह-सुन-पढ़-लिख लिहिंला पर भोजुपरी के खिसा खतम हो गइल एकदम से। पापा जहाँ रहत रहिं ऊहाँ त एगो आऊर नया समस्या रहे। ऊ इ कि एई जगिहा प मगही बोलल जात रहे। हम घरे जात रहिं त जानबूझ के मगही बोलत रहीं। मगही भाषा सुन के लोग कहत रहन जा-‘बाबू एइजिग ना रहेल का..., तबे न अइसे बोलताड़....’। आदमी के पहचान बोले मात्र से हो जाला। ई तखनिए बुझाइल। लगल कि भले हर जगह एकही नाक-मुँह-नाक-नक़्श के आदमी होखस जा पर बोले वाला भाषा सेम हो जरूरी नईखे।

पर चाहे जो हो, एक चीज त जरूर बुझात रहे हमरा कि ई हिंदी में ऊ बात, रस और मिठास नइखे जवन में हमनी के पलल-बढ़ल बानी जा। जवना भाषा में छुटपन में डाँट खाए के मिलल बा। बड़ा हो गइला के बाद जब ‘भाषा’ जैइसन शब्द के मास्टर अर्थ बतावे लगनन तब बुझाइल कि हमनी के जो बोलिला जा, कहिंला जा, बतियांईला जा; सब किताबन में बड़ी महत्त्व के बात है। मास्टर स्वर और व्यंजन में भेद बतावे शुरू कइलें, कवन ध्वनि कहंवा से निकलेला, हमनीं के इ सिखावेला शुरू कइलें त लागल कि एतना काम के चीज हमनी के एतना आसानी से कइसे जान गइनी जा।.....


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