कविता : देखन में छोटन लागे, घाव करे गंभीर

विशेष सन्दर्भ: हिंदी कविता
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राजीव रंजन प्रसाद 
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कविता लघुता में विराट का दर्शन करा सकती है, यदि पाठक सहृदय हो। सहृदयता समष्टि की सोच है जिससे यह सृष्टि विराजमान है। भाव-संवेग द्वारा इस शब्दज संसार को अनुभूत एवं अभिव्यक्त करना कविता का धर्म है। यहाँ धर्म का अर्थ धारिता से है यानी ग्रहण करने की क्षमता से। आजकल यहीं हम सर्वाधिक चुक रहे हैं। हममें ग्रहणशीलता का आवेग तो दिखाई देता है; किन्तु उसकी उपयुक्त पात्रता नहीं है। सबसे बड़ा पेंच यह है कि कविता को हमने एक ढर्रे की तरह देखना शुरू कर दिया है। उसके आने की गति तीव्र है। अब चूँकि आने वाली हर चीज ‘कविता’ घोषित कर दी जा रही है; इस कारण समस्या बढ़ी हुई है। मुर्दा आलोचकों पास ज़बान है, लेखन की तबीयत नहीं। जब तक हम लेखन के माध्यम से आलोचनापरक प्रतिपाद्य नहीं प्रस्तुत करते; अच्छी और बुरी कविता के बीच अंतर कर पाना आसान नहीं होगा। 

लिहाजतन, 'बिकाऊ कवि' कई बार सहृदय आलोचकों के अभाव में कवि बना रहता है क्योंकि वह अपने ‘कवि’ होने की घोषणा करता है। आजकल हिंदी में ‘कवि’ ऐसे हैं। वे कवि होने का ‘टैग’, ‘लेबल’, ‘बैनर’ आदि लटकाए फिर रहे हैं; पर ऐसे धांसू/जुगाड़ू कवि भी पाठकों के न होने का रोना रोते हैं। ध्यान दें कि सहृदय पाठक अपनी चेतना में भावग्राही होता है। उसे जो बातें निक लगती है, उनकी वह तत्काल वाहवाही करता है; बकियों को खारिज कर देता है। अब खारिज होने वाले गरज के कवि ज्यादा हैं। ये गरजू कवि असली कवियों तक को ढाँक-तोप चुके हैं। यह स्थिति क्योंकर बनी, इसकी पड़ताल आवश्यक है।...  
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