Tuesday, May 28, 2013

मेहरारू की पाती


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प्रिय राजीव,

हमारे समय के सूरमा बुद्धिजीवी अकर्मण्य हैं। अव्वल दरजे के कायर। वे सिर्फ शब्दों के उपले बनाते हैं। यह एक तरह से भाषा में गढ़ी गई चैथी दुनिया है जिनमें सिर्फ और सिर्फ वंचितों/शोषितों/पीड़ितों के बारे में बात-विमर्श या बहस की जाती है; लेकिन इससे उनका उद्धार कतई नहीं होता है। अपने मौत तक को अंजाम देने के लिए इन बेचारों को अपनी ही देह-भुजा और जांगर जलानी पड़ती है। यह मार दोहरी-तिहरी....है।

कहूँगी, तो हँसोगे....इन बुद्धिजीवियों(जिसमें तुम भी शामिल हो) को ब्लेड से अपना नाखून काटने तक में डर लगता है जबकि वे ‘खून का बदला खून’ का नारा लिखते(कोल्डनुमा पानी से गला तर करते हुए) हैं। ये बुद्धिजीवी जिस बदलाव के वाहक या खुद को उनका समर्थक कहते हैं, उससे कहीं ज्यादा वे स्वयं के ‘प्रमोटर’ होते हैं। ऐसे लोगों का आलीशान बंगला/मकान एसी, कुलर, फ्रीज, टीवी, सोफा और महंगे अलंग-पलंग जैसे वाहियात साजोसामान से भरा होता है। ये जिन पदों पर शासित होते हैं और जितनी भारी-भरकम तनख़्वाह पाते हैं; यदि वे इसका आधा हिस्सा भी बाँट दें, तो भी उनके बच्चे चाँदी के चमच्च से ही दूध पियेंगे। उनकी बीवियाँ अगले पायदान की ही आईपीएल क्रिकेट की टिकट खरीदेंगी, उनके बेटे बेसबाॅल और कत्थक-भरतनाट्यम नृत्य का हुनर सीखते हुए मिल जाएंगे।

राजीव, कम से कम तुम्हारे बारे में मेरी राय यही है। और मैं सही हँू। आजकल तुम इसी पंथ का पंथी/लती/चाटुकार/ढोंगी/आपस्वार्थी बनते जा रहे हो। तुम एक चईं काम नहीं करते और सारी दुनिया को सीख देते फिरते हो। कभी इस पर टिप्पणी, तो कभी उस पर। मैं वैसे तुम्हारा लिखा पढ़ती नहीं और कभी-कभी तुम जबर्दस्ती(तुममें आत्ममुग्धता जबर्दस्त है) पढ़ाते हो, तो मुझ हँसी आती है। तुम देखते होगे कि मैं खाना बनाती हूँ इसलिए नहीं कि मुझ अकेले को खाना है बल्कि इसलिए कि मुझे अपने पूरे परिवार को खाना खिलाकर संतुष्ट करना है, उन्हें भोजन से तृप्त करना है।

बताओ राजीव, लिख-लाखकर तुम कितने जरूरतमंदों को तृप्त और संतुष्ट करते हो? कितने वैसे लोग जिनके थैली में जरूरी रुपया तक नहीं है उनके थैलों को हरी सब्जियों से भर पाते हो? कितने बच्चों को जरूरी स्कूली किताब खरीदकर पढ़ने के लिए देते हो? किसी असहाय को देखते ही सहायता करते हो? तुम औरों को मत देखो। अपनी गरदन देखो....अपने किए से मतलब रखो। ऐसी ही बात पोस्ट करो, शेयर करो, लाइक करो।

अगर नहीं, तो किसी दिन तुम्हें भी नक्सली या सरकारी सेना गोली मार दे, तो मुझे तनिक गम न होगा। कोई अफसोस नहीं। कोरी विचारधारा के पालतू जीव संग आजीवन जिन्दगी बिताने से अच्छा है कि तुम अपना रास्ता लो बाबा और मैं अपना। पहले लायक करने की सोचों, लायक करने की ठानों और फिर लायक बनकर लायकियत लायक काम करो....दुनिया से पहले सीखो और फिर लिखो। दुनिया और अधिक खूबसूरत दिखाई देगी।

तुम्हारी पत्नी
सीमा

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हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...