स्मृति ईरानी: एक आदर्श बहू का राष्ट्रीय आदर्श और राजनीतिक गुरु बनने का सफ़रनामा

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मैंने कहा-‘अमेरिकन राष्ट्रपति पर एक गरीब मुल्क को इतना रुपया सिर्फ आगवानी और आतिथ्य में खर्च नहीं करना चाहिए!’
उन्होंने कहा-इसी सोच के कारण आप जैसे लोग हमेशा परेशान-सा दिखते हैं। देश की जनता को दुःख-तकलीफ हो नहीं रही; बस आप ही को खूब चिचियाहट है।’’
बनारसी स्टाइल में गरियाए, तो चूतिए सब ऐसे बोलते हैं जैसे खुद कल ही देश का गवर्नर बनने वाले हैं या उन्हें मि. बराक ओबामा के साथ मैत्री-भोज में बुलाहट आने वाला है। छोड़ो गुरु, पढ़ो आप स्मृति ईरानी के बारे में।
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नोट: राजनीति के अपने सार्वजनिक कैरियर की दृष्टि से बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित स्मृति ईरानी के जीवन एवं व्यक्तित्व से सम्बन्धित बातें महत्त्वपूर्ण हैं। खासतौर से युवा राजनीतिज्ञ संचारकों के व्यक्तित्व, व्यवहार तथा नेतृत्व के सन्दर्भ में यह रिपोर्ट खुद मेरे लिए बेहद जरूरी एवं उपयोगी है। पत्रकार वीनू संधू और कविता चैधरी की यह रिपोर्ट स्मृति ईरानी की परवरिश, शिक्षा-दीक्षा, टेलीविज़न की दुनिया में सफल अदाकारी तथा उससे मिली अथवा अर्जित की गई लोकप्रियता आदि की ऐसी ही गंभीर पड़ताल करती हैं। यही नहीं यह आलेख स्मृति ईरानी के राजनीतिक समाजीकरण और सक्रियता के मद्देनज़र हाल की कामयाबियों पर भी दृष्टिपात करने में सफल है। आज की तारीख़ में स्मृति ईरानी भारतीय जनता पार्टी का ग्लैमर्स चेहरा मात्र नहीं हैं। वह चुनावों के दौरान मज़मा/भीड़ जुटाने वाली स्टार प्रचारक सिर्फ नहीं हैं; बल्कि आज वह बतौर लोकसभा सांसद जिस पद पर काबिज़ हैं; उसका लोकतांत्रिक एवं सांविधानिक महत्त्व अपनेआप में बहुत विशिष्ट और कहीं अधिक बड़ा है। निवर्तमान मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी का जीवन-प्रसंग, उतार-चढ़ाव और सफलता-असफलता पर अलग से भी और बातें की जानी चाहिए; और वह संभव भी है। फिलहाल पत्रकार वीनू संधू और कविता चैधरी की यह रिपोर्ट:

बात वर्ष 2000 के शुरुआती दिनों की है, जब छोटे पर्दे के नामचीन बैनर बालाजी टेलिफिल्म्स की क्रिएटिव डायरेक्टर एकता कपूर की नजर एक युवती पर टिक गई। वह युवती उन दिनों बतौर मॉडल संघर्ष के दौर से गुजर रही थी और दो साल पहले मिस इंडिया प्रतियोगिता के फाइनल तक पहुंच चुकी थी। उस युवती का नाम था स्मृति मल्होत्रा। उस वक्त उन्हें देखकर किसी के जेहन में यह खयाल भी नहीं आया होगा कि वह पारंपरिक भारतीय बहू के किरदार में भी ढल सकती हैं। एक ऐसी बहू, जिसे देश में हजारों-लाखों माता-पिता अपने घर लाना चाहेंगे। लेकिन एकता कपूर ठान चुकी थीं कि उनके नए धारावाहिक ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ में स्मृति की तुलसी की मुख्य भूमिका निभाएंगी। ईरानी बिना ऑडिशन दिए ही इस किरदार के लिए चुन लगी गईं और पूरा धारावाहिक उनके इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। चैदह साल बाद इतिहास एक बार फिर खुद को दोहरा रहा है। लेकिन इस बार मंच टेलिविजन का नहीं है बल्कि सियासत का है। कुछ समय पहले तक सियासी गलियारों में स्मृति (जो 2001 में विवाह के बाद मल्होत्रा के बजाय स्मृति ईरानी कहलाती हैं) का खास कद नहीं था और उन्हें बिना जनाधार की नेता कहा जाता था। लेकिन अचानक वह मानव संसाधन विकास मंत्रालय की कमान संभालने लगी हैं। उनकी उम्र महज 38 साल है और वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल की सबसे युवा सदस्य हैं।

ईरानी ने शुरुआत में ही समझ लिया था कि सत्ता में आने वालों के साथ रहना कितना अहम होता है। दिसंबर 2004 में उन्होंने मोदी के खिलाफ मोर्चा खोला था और कहा था कि-‘‘अगर गुजरात दंगों के मामले में मोदी राज्य के मुख्यमंत्री का पद नहीं छोड़ते हैं तो वह आमरण अनशन पर बैठ जाएंगी।’’ लेकिन उसी रात भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से फटकार खाने के बाद उन्होंने अपना बयान ‘बिना शर्त’ वापस ले लिया। हालांकि मोदी को आसानी से भूलने वाला या माफ करने वाला नहीं माना जाता, लेकिन ईरानी को अपवाद कहा जा सकता है, जो बेहद दुर्लभ है। मोदी ने उन्हें माफ ही नहीं किया बल्कि हरेक मौके पर वह उन्हें अपनी छोटी बहन कहकर भी पुकारते हैं। दोनों के बीच सुलह फरवरी 2005 में वरिष्ठ भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी के घर पर रात के खाने के दौरान हुई। खबरिया चैनलों के कैमरों के आगे मोदी ने उसी रात ईरानी के सिर पर हाथ रखा और उन्हें ‘गुजरात की बेटी’ कह दिया। उसके बाद से ही स्मृति का कद लगातार बढ़ता गया।
स्मृति बहुत जल्दी यह भांप जाती हैं कि किसकी सरपरस्ती में रहना सही होगा। प्रमोद महाजन के साथ काम करते हुए 2001 में उन्हें पार्टी की युवा शाखा की महाराष्ट्र इकाई का अध्यक्ष बना दिया गया। बाद में वह भाजपा महिला मोर्चा की अध्यक्ष बन गईं और 2013 में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद तक पहुंच गईं। उन्हें पार्टी का गोवा प्रभारी बनाया गया और उसके बाद तमाम पुराने और कद्दावर पार्टी नेताओं को पछाड़ते हुए वह गुजरात से राज्य सभा में भी दाखिल हो गईं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की कमान मिलते ही स्मृति सबसे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर पहुंच गईं, जिसने उनकी नियुक्ति पर सवाल उठाए थे। हालांकि यह कहना भी नाइंसाफी होगी कि ईरानी को कामयाबी केवल इसीलिए मिली क्योंकि वह सही वक्त पर सही व्यक्ति के साथ सही जगह मौजूद थीं। शायद यह भांपने का हुनर भी उनके भीतर सालों की जद्दोजहद के बाद आया है। ईरानी दिल्ली के एक मध्यवर्गीय परिवार से आती हैं। उनकी मां बंगाली हैं और पिता पंजाबी। उनके पिता का कूरियर का काम था। बचपन में ईरानी काफी मृदुभाषी थीं और सादगी से रहती थीं। लेकिन 16 साल की उम्र में उनकी शख्सियत एकाएक बदल गई। उन्होंने नाटकों में काम करना शुरू कर दिया और उसके बाद कॉलेज की पढ़ाई भी छोड़ दी। उन्होंने पत्राचार से स्नातक की पढ़ाई करने का फैसला किया। जब वह 22 साल की थीं तो उन्हें मिस इंडिया प्रतियोगिता के लिए चुन लिया गया। ईरानी ने अपने पिता से 2 लाख रुपये उधार लिए और प्रतियोगिता के लिए पोशाक बनवाने के इरादे से डिजाइनर मनीष मल्होत्रा के स्टूडियो में पहुंच गईं। मल्होत्रा कहते हैं, ‘मुझे वह दोस्ताना, जोशीली, केंद्रित और प्रेरित लड़की लगी थीं।’

ईरानी मिस इंडिया की प्रतियोगिता नहीं जीत पाईं और उनके ऊपर ढेर सारा कर्ज भी चढ़ गया। वह हताश थीं, लेकिन झुकने को तैयार नहीं थीं। इसीलिए उन्होंने बांद्रा में मैकडॉनल्ड के आउटलेट में काम करना शुरू कर दिया, जहां उनका काम लोगों की बर्गर की प्लेट देना था और मेज तथा फर्श साफ करना भी। कुछ वक्त के लिए उन्होंने दिल्ली के मशहूर पटरी बाजार जनपथ पर सौंदर्य प्रसाधन भी बेचे। उन्होंने संघर्ष किया और उसी संघर्ष से सीख भी ली। आखिरकार एक दिन एकता कपूर की नजर उन पर पड़ गई। उसके बाद वह वीरानी परिवार की बहू तुलसी वीरानी बन गईं। उसी वक्त उन्हें समझ आया कि छवि यानी छाप की कितनी अहमियत होती है और यह बात वह कभी भूली नहीं हैं। शायद छवि की ही बात है कि वह संसद में लाल रंग की बड़ी सी बिंदी लगाए, मांग में सिंदूर भरे, सलीके से साड़ी पहने और उस पर भाजपा के चिह्न कमल का बिल्ला लगाए दिखती हैं। दस साल पहले जब दिल्ली के चांदनी चैक में उन्होंने कांग्रेस के कपिल सिब्बल के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ा था तब भी वह इसी रूप में नजर आई थीं। उस वक्त वह जहां भी जाती थीं, भीड़ ‘घर-घर की कहानी, तुलसी वीरानी’ का नारा बुलंद करती रहती थी। हालांकि स्मृति चुनाव हार गई थीं, लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा था। उन्होंने कहा था, ‘अब आपको मैं पहले से ज्यादा नजर आऊंगी।’

एक दशक बाद जिंदगी की सुई उसी जगह लौट आई है। ईरानी की शैक्षिक योग्यताओं पर पिछले दिनों अच्छी खासी बहस हुई है, लेकिन सच यही है कि वह उस मंत्रालय की कमान संभाल रही हैं, जो कुछ हफ्ते पहले तक सिब्बल के हाथ में था। 2004 में शायद ही किसी बड़ी राजनीतिक हस्ती ने उनके लिए चुनाव प्रचार किया था। उस वक्त उनके पति जुबिन ईरानी ही साये की तरह उनके साथ रहते थे। जुबिन उनके बचपन के मित्र हैं और 2001 में दोनों ने विवाह किया। उनके दो बच्चे हैं और जुबिन को पिछली पत्नी से एक बेटी भी है, जिसे ईरानी अपनी बेटी की ही तरह प्यार करती हैं। उनके पति ने 2004 में कहा था, ‘आगे चलकर राजनीति ही उनका मैदान होगी। उनके भीतर बहुत ऊर्जा है और वह घंटों काम करती रह सकती हैं।’ जुबिन की बात गलत नहीं है। कम से कम इस बार के चुनावों में अमेठी में तो यही दिखा। भाजपा के अमेठी मीडिया प्रभारी और स्मृति के चुनाव प्रबंधक गोविंद सिंह चैहान बताते हैं, ‘37 दिन में उन्होंने 1,617 में से 1,200 बूथों का दौरा कर लिया। इतने कम वक्त में ही उन्हें हजारों भाजपा कार्यकर्ताओं के नाम याद हो गए थे।’ अमेठी के भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए स्मृति उनकी ‘दीदी’ थीं। इसे संयोग ही कहेंगे कि वहां के कांग्रेस कार्यकर्ता राहुल गांधी को ‘भैया’ कहते हैं। एक बार एक कार्यकर्ता ने गलती से स्मृति को ‘मैडम’ कह दिया तो उन्होंने फौरन पलटकर कहा, ‘मैडम तो सोनिया गांधी हैं। मैं आपकी दीदी हूं।’

मानव संसाधन विकास मंत्रालय का दफ्तर राजधानी के शास्त्री भवन के ‘सी’ विंग में हैं। वहां वह तुलसी के किरदार में ही नजर आती हैं, जिनके हाथ में पूरे मंत्रालय की चाबियां हैं। भाजपा के ही एक नेता कहते हैं कि उन्होंने सब कुछ अपनी कुंडली में ले रखा है। बहरहाल ईरानी के मातहत यह मंत्रालय पूरी तरह काबू में है। वहां के कर्मचारी उनके हाव-भाव समझने में जुटे हैं। मसलन उन्हें पता होना चाहिए कि उनकी मुस्कान अगर आंखों में नहीं झलक रही तो वह मुस्कान नहीं बल्कि चेतावनी है। अहमदाबाद हवाई अड्डे पर एक भाजपा कार्यकर्ता के साथ ऐसा ही हुआ, जब उसने सामान उठाने में ईरानी की मदद करनी चाही। उन्होंने फर्राटेदार गुजराती में उसे डपटते हुए कहा, ‘तमने खबर छे, हू मारो लगेज जातेच उपाड़ू छू’ यानी तुम्हें पता है, मैं अपना सामान खुद उठाना पसंद करती हूं। हंसी-मजाक उनके वश की बात नहीं लगती। उन्होंने ‘मणिबेन डॉट कॉम’ नाम के धारावाहिक में हास्य भूमिका में हाथ आजमाए थे, लेकिन दर्शकों ने उन्हें पसंद नहीं किया। हाल ही में वह लाइफ इज ओके चैनल पर प्रकाषित होने वाले लोकप्रिय जनहित कार्यक्रम ‘सावधान इंडिया’ में बतौर प्रस्तोता दिखाई दी थीं। बतौर मंत्री उनके 90 दिन पूरे होने वाले हैं, लेकिन किसी वक्त भाजपा की आवाज बन चुकी ईरानी ने इस दौरान एक भी संवाददाता सम्मेलन नहीं किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के चार साल के पाठ्यक्रम पर जब विवाद चरम पर था, उस वक्त भी उन्होंने पत्रकारों से सीधे बात नहीं की। एक बार मीडिया के पास एक आमंत्रण पहुंच गया, जिसमें शिक्षा के बारे में जिला सूचना तंत्र की वार्षिक सांख्यिकी रिपोर्ट जारी करने की बात लिखी थी। न्योता अभी पहुंचा ही था कि आनन फानन में पत्र सूचना कार्यालय का एक और संदेश आ गया कि इस कार्यक्रम में मीडिया का प्रवेश नहीं हो सकता। बाद में बहाना बनाया गया कि किसी कर्मचारी की गलती से यह न्योता मीडिया के पास पहुंच गया है।

ईरानी के मंत्री बनने के कुछ दिन बाद ही पत्रकारों का एक जत्था शास्त्री भवन के दूसरे तल पर उनके दफ्तर में उनसे मिलने पहुंच गया था। उन्हें देखते ही स्मृति का पारा चढ़ गया। जो पत्रकार उनसे अनौपचारिक मुलाकात करते हैं, उन्हें भी अपने सेलफोन, कलम और नोटबुक कमरे के बाहर छोडने पड़ते हैं। डीयू में चार वर्षीय पाठ्यक्रम पर जब तीखा विवाद चल रहा था, उस वक्त उन्होंने यही कहा कि वह मामले में दखल नहीं देंगी और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ही आखिरी फैसला करेगा। लेकिन यूजीसी के चेयरमैन वेद प्रकाश का उस हफ्ते शास्त्री भवन में आना-जाना लगा ही रहा। जाहिर है कि आयोग इस दौरान मंत्रालय से ही निर्देश लेता रहा कि उसे क्या करना है। ईरानी उन दिनों डीयू के कुलपति दिनेश सिंह से भी मिलती रहीं। ईरानी ने एक बार कहा था कि वह नई भूमिकाओं में दिखती रहना चाहती हैं। अब तक तो वह इस काम में कामयाब भी रही हैं। इस साल के आखिर में आप उन्हें एकदम नई भूमिका में देख सकते हैं। फिल्म अभिनेत्री असिन की मां की भूमिका में। जी हां, वह बॉलिवुड में अपनी पारी की शुरुआत करने जा रही हैं। उनकी पहली फिल्म ‘ऑल इज वेल’ है, जिसमें अभिषेक बच्चन और ऋषि कपूर भी हैं।
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युवा राजनीतिज्ञ संचारकों के व्यक्तित्व, व्यवहार और नेतृत्व आदि को केन्द्रीय आधार मानकर शोध-कार्य कर रहे शोध-छात्र राजीव रंजन प्रसाद की अतिरिक्त टिप्पणी :

भारतीय राजनीति में पद की महिमा अपरंपार है। जनमानस हर उस व्यक्ति का पांव पूजती है जिसे येन-केन-प्रकारेण महिमामंडित किया गया हो; प्रचार के बलबूते स्थापित किया गया है। राजनीति में राजनीतिज्ञों का कद तेजी से घटा है; लेकिन पेट और पाॅकेट अप्रत्याशित ढंग से भारी हुए हैं। ऐसे में आप चाहे जितने भी मनोवैज्ञानिक, मनोसामाजिक, मनोशास्त्रिक, मनोसंचारिक शोध-अन्वेषण, अनुसंन्धान, गवेषणा करा लीजिए और अपना उचित मंतव्य निष्कर्ष रूप में शोध-ग्रंथ में दर्ज कर लीजिए। अंततः ये कागजी आंकड़े, सूचना-संसाधन, संदेश, टिप्पणियां, साक्षात्कार, प्रश्नानावली, आलेख, विश्लेषण, संश्लेषण; सबका निचोड़ यही है कि इससे होना-जाना कुछ नहीं है। वह भी तब जब वह आपको अपनी योग्यता पर मिलने वाली शोध-अध्येतावृत्ति तक महीनों रूला-तड़पा कर देती है जिसके बारे में किसी से कहो, तो कहेंगे-‘भाई आजकल यही चलन में है।’ दरअसल, आजकल कामयाबी का जनेऊ पहनने के लिए उन्हीं लोगों के पैर पड़ना/लोटना पड़ता है जिन्होंने भले संस्कृति और सभ्यता पर एक किताब भी बमुश्किल से पढ़ी हो; लेकिन दुनिया भर की सभ्यताओं और संस्कृतियों पर बोलने का अधिकार उन्हें प्राप्त है, आमंत्रण और भौतिक आह-जाह से भी वही तथाकथित विप्रजन लदे-फदे हैं। बाकी बचे लोग जिनकी जुबान बंद है वह राम-श्याम-घनश्याम की कृपा से जितने दिन जिंदा रह सके रहे; अन्यथा राम नाम सत्य, तो दुनियावी क्रियाकर्म है। खैर! दुखयारियों के लिए जिग़र मुरादाबादी का मुफ़लिसी में अपनी पीठ थपथपाता यह लाजवाब मिसरा देखिए:
‘‘आपस में उलझते हैं अब शेखों बिरहमन,
काबा न किसी का है न बुतखाना किसी का।’’

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