भाषा के हलवाई

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माफ करना डियर, जरूरत पड़ने पर सम्पर्क की जाएगी।
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''हमारे लिए जनता गौण नहीं, बल्कि वह गण है, समस्त सांविधानिक अधिकार दिए जाने के लिए वह हमारी गणना में भी है....और देवताओं का देवता वह गणपति है....; ऐसा मैं हमेशा कहता रहा हूं...और आज भी खुलेआम कह रहा हूं।''

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जिस शख्स ने यह कहा था। वह जनप्रतिनिधि हैं। लेकिन उसने जो कहकर वाहवाही बटोरी थी वह उस काबिल नौज़वान के दिमाग की उपज थी जिसने हिन्दी में पत्रकारिता की है, अध्यापकी का परीक्षा उत्तीर्ण किया है। लेकिन आजकल बेरोजगार है। इन दिनों इस-उस की बेगारी खट रहा है। सब उससे कहते हैं कि समझौता करो, झूठ एक सफल कार्रवाई है। अहंकारी इस लड़के ने दरेरा देकर अपनी बात मनवानी चाहिए, उसे सबने अपनी ज़मात और महफ़िल से बाहर कर दिया। आज वह सड़क का आदमी है। आम-आदमी पार्टी का आम-आदमी नहीं जो चाहे जितना सच बोले; लेकिन है तो करोड़पति ही न!

खैर! मरता क्या न करता वाली तर्ज़ पर दिल्ली में रहने का जुगाड़ खोजते हुए; उसे यही काम मिला है। उससे धांसू संवाद लिखने को कहे जाते हैं। प्रति शब्द 10 रुपए का भुगतान किया जाता है।

दो दिन पहले तो उसका एक डाॅयलाॅग इतना पसंद आया कि उन्होंने चट 1000 रुपया थमा दी। लिखा था-‘‘देश की ताकत का रिश्ता जनता के पेट से जुड़ा हुआ है। पेट में जिस तरह छोटी आंत और बड़ी आंत होनी जरूरी है; उसी तरह इस देश में ज़िन्दा रहने के लिए काॅरपोरेट कंपनियों और बहुराष्ट्रीय कारोबारियों की भी जरूरत है। अब उनकी अपनी क्षमता और पाचन-क्रिया पर है कि वह कितना खाती और हजम करती हैं। हमारा काम हाज़मा दुरुस्त रखने का है। और एक और बात जैसे तबीयत शरीर की बिगड़ती-बनती रहती है।...वैसे ही देश की जनसंख्या भी अमीर-गरीब होती रहती है। ज़माना बेहद वहशी, कातिल और क्रूर है। कोरी भावुकता विनाश के कगार पर ही खड़ा कर सकती है, विकास के रास्ते पर कभी नहीं ले जाने देगी। सरकार चलाना बच्चों का खेल नहीं है। और जो इसे खेल मानते हैं उन्हें इस सरकार के डीएनए में जगह नहीं मिल सकती है। देश में तब्दीली तेजी से आये इसके लिए बाज़ारीकरण, भूमंडलीकरण, निजीकरण, अधिग्रहण, विदेशी निवेश सब स्वीकार्य है। यह सच्चाई है जिसे स्वीकारे बिना न तो सीमा पर हम सुरक्षित रह सकते हैं और न ही देश में पेट्रोल, डीजल और गैस के दाम घट सकते हैं। जिन्हें देश की जनता को बरगलाना है, अपने झूठे वादे के लिए भरमाना है, आन्दोलन करना है, तमाशा और अराजकता फैलानी है....वह अपने लिए कोई दूसरा मुल्क चुन लें। हमारा विकास सबके हित और विकास में विश्वास रखता है।...हमें जनता ने चुना है; अभी भी हमें ही चुन रही है; हम दादागिरी करके सत्ता पर काबिज नहीं हुए हैं। अतः हमारी आलोचना का मतलब है जनता की आलोचना...और हम यह किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे। हम किसी को सिस्टम के खिलाफ होने नहीं दे सकते हैं।’’
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यह संवाद काफी चर्चित हुआ। पार्टी के कई लोगों ने मिलकर, फोनकर बधाई दी, तारीफ की। इधर बीच चार दिन से मकान-मालिक किराए के लिए हंगामा खड़ा किए हुए है। इधर बीच काम नहीं मिल रहा है। जिस आदमी ने उस निगोड़े को काम और अच्छे-खासे पैसे दिलाए थे; वह आजकल आगामी चुनाव में व्यस्त है।फोन करो, तो भाईसाब! का टका-सा जवाब सुनाई पड़ता है-'माफ करना डियर, जरूरत पड़ने पर सम्पर्क की जाएगी।'

वह कभी-कभी सोचता है कि इससे तो अच्छा था कि वह मैदा की निमकी बनाता, बेसन का लड्डू गढ़ता या समोसा और जलेबी बेच रहा होता। फिर सोचता है, अच्छा जैसे चुनाव जीतने वाले के अच्छे दिन आए वैसे ही उसकी भी आए।


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