पुनर्रचना के निकष पर एक लड़की

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लड़की कुदरती तौर पर लड़कों के समान ही प्रसव-वेदना देते हुए स्त्री-कोख़ से जन्मती  हैं। लेकिन लड़की अपने जन्म के बाद बार-बार रची-बुनी जाती हैं; जबकि लड़कों को जिलाया-बढ़ाया जाता है। स्त्रियों के लिए समाज की आंखों में रंगीनियत के चादर बहुपाट में फैले दिखाई देते हैं जिनके लिए खुद उसका मापदंड और निकष बेहद भेदभावपूर्ण, विषमताजनक और लिंगभेद पर आधारित है। भारतीय समाज आधुनिक इस मामले में है कि भारतीय मर्द पहले से अब अधिक उच्छश्रृंख्ल और असभ्य आचरण वाले हो गए हैं; जबकि स्त्रियों के लिए हमारे सोच का पारा/तापमन अभी भी मध्ययुगीन ज़माने की है। हम उन्हें बोलने देना नहीं चाहते, क्योंकि उनके बोलते ही हमसब मर्दों की कलई खुल जानी तय है। लेकिन अब यह जोर-दबाव एकतरफा नहीं रह गया है। औरतों ने अपना मोर्चा खोल दिया है। वह बाज़ार में घुसने लगी हैं; बाज़ार पर अधिकार ज़माने लगी और बाज़ार को अपनी इच्छानुसार अपने इशारे पर सम्बोधित भी करने लगी हैं। संभव है, मर्दों की ज़मात के इंसानी खोल में भेड़िए जो अपने खुंखार रवैए और हिंसक वारदातों के लिए जाने जाते हैं; इन स्त्रियों पर टूट पड़े; लेकिन पानी सर के उपर से निकल चुका है। अतः स्त्रियां भी अपने कदम पीछे खींचने के बजाए सीधे मुकाबला करने के लिए ताल ठोंकने में जुटी है। अब तक नैतिकता का एकतरफा पाठ किया जाता रहा है और स्त्रियां मन-मार कर सुनने को अभिशप्त रही हैं। अब समीकरण और रसायन सब पलट गए हैं। आज औरते कहेंगी और मर्दों को उनकी सुनना पड़ेगा। क्यों?

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‘‘समाज उसके लिए रंगमंच है
 और कला उसकी मेधा की क्रीड़ा है
 वह कलाकार होने के साथ मनुष्य भी है
 कहना कितनी बड़ी पीड़ा है।’’
            -डाॅ. रामदरश मिश्र

एक लड़की का अभिनयकुशल होना; कला में निष्णात होना; उसके मनुष्य होने की निशानी नहीं है। तो फिर उसके होने सम्बन्धी निशान या तारक-बिन्दु क्या है? पहचान की हाँडी में सीझती ऐसी ही लड़कियों के बारे में प्रो. कृष्ण कुमार बड़ी शिद्दत से विचार करते दिखाई देते हैं। ‘लड़की की पुनर्रचना’(hindisamay.com) नामक अपने लेख में वे एक लड़की की आत्मा, मस्तिष्क, मन और देह सबकी आपबीती अपनी कानों से सुनते हैं; तब जा कर उसे व्यक्तिगत विचार-सरणि में ढालते हैं, उसे एक मेखमाला का रूप, आकार या कि कोई ‘नज़रिया’ नाम देते हैं। उनका खुद का यह मानना है कि अध्यापकीय पेशे से जुड़े होने के कारण वे कई लड़कियों को काफी करीब से देखते रहे हैं जो सयाने होने की दहलीज पर होती हैं; जिन्हें समाज रच रहा होता है क्षण-प्रतिक्षण। बकौल प्रो. कृष्ण, ‘‘मैंने अपने अध्यापक जीवन में हजारों लड़कियों को पढ़ाया है; उनमें से ऐसी बहुत कम देखी हैं जिन पर किशोरावस्था के नाटकीय मोड़ पर लगे घाव साफ-साफ न दिखते हों। अपनी शख़्सियत को ले कर आश्वस्त लड़कियाँ सैकड़ों में एक मिलती हैं। उनमें निहित क्षमताएँ विभिन्न संस्थाओं के वातावरण में किस हद तक थोड़ा-बहुत खिल पाती हैं, यह एक कठिन प्रश्न है।’’

यह प्रश्न सचमुच कठिन है, क्योंकि समाज और पुरुष दोनों में दुरःभिसन्धि बनी हुई है। जिस कारण लड़कियाँ अपने ही दुःख और संत्रास का सही ‘डायग्नोसिस’ करने का अधिकारिणी नहीं हंै। ऐसे में, उनकी तड़प और हुक का गोलार्द्ध काफी विस्तृत और व्यापक हो जाता है। विडम्बना यह है कि सामाजिक नैतिकता का दहन-दोहन अधिसंख्य पुरुष करते हैं जबकि अग्निपरीक्षा से गुजरती लड़कियाँ हैं। यह भेदभाव मिथकीय परम्परा तक में अभिव्याप्त है। भारतीय वाड.मय में राम जैसे व्यक्तित्व को वीरता, साहस, तर्क, बुद्धि, वाग्मिता, देवत्व आदि के निकष पर श्रेष्ठ घोषित किया गया है जिन पर सीता जैसी राजपुत्री पहली ही नज़र में रीझ(कहीं ऐसा तो नहीं कि यह केवल कवि-मन का हृदय-प्रसंग हो) जाती हंै। राजा जनक के यह कहने पर कि-‘वीर विहीन मही मैं जानी।’ राम के निजभ्राता लक्ष्मण की भुजा फड़कती है और वे प्रत्युŸार क्या देते हैं, यह छोड़िए; जिस अन्दाज़ में वे कहते हैं उसका वर्णन अद्भुत है-‘‘लषण सकोप बचन जब बोले, डगमगानि महि दिग्गज डोले।’

प्रसंगवश यहाँ यह तर्क करना वाज़िब होगा कि जब प्राणियों में देवतुल्य राम जैसा पुरुष लोकलाज और लोकनिन्दा की डर से सीता को वन में छोड़ने के लिए लक्ष्मण से कहता है, तब लक्ष्मण की अनुश्रवण-शक्ति कहाँ चली जाती है? यह ताज़्जुब और खोज दोनों का विषय है। यहाँ तक कि जनसमाज में भी इस प्रसंग को लेकर कहीं कोई असंगति उत्पन्न होते नहीं दिखाई देता है। इस मिथकीय इतिहास के बिरवे भारतीय समाज में इतनी चालाकी से रोपे गए हैं कि वह अब विषवृक्ष का रूप धारण कर चुका है। प्रो. कृष्ण जनसमाज के इस चालाकी भरे वातावरण का हवाला देते हुए कहते हैं-‘‘चूड़ी की दुकान में प्रवेश करते समय लड़कियों की सामाजिक ढलाई का कार्यक्रम एक खास मुकाम पह पहुँच जाता है। जब कोई लड़की चूड़ियों के रंग और डिजाइन की विविधता देखती है, दुकान में रखी चूड़ियों की विपूल राशि में से अपने लिए चूड़ियाँ चुनती है, उन्हें पहनने के लिए अपने हाथ दुकानदार के हाथों के सामने पेश करती है, तो वह संस्कृति के एक लम्बे एजेण्डा की तामील कर रही होती है।’’

यह तामील एक लड़की के दिमाग में इस तरह टँका होता है कि वह इन बंधनों से ही ताउम्र सबसे ज्यादा प्रेम करती दिखाई देती है। यथा-फ्राॅक के गोल घेरे, ओढ़नी के चौड़े पाट, समीज-सलवार पर काढ़ा हुआ कसीदा, साड़ी पर रंगीन बाॅर्डर या छापदार डिजाइन इत्यादि। परिधान का मामला सुलटता है, तो हाथ, पैर, होंठ, आँख, चेहरे को रंगने-पोतने की बारी आ जाती है। इसके बाद फिर आभूषण का मामला सामने आ खड़ा होता है। लड़की खुद पर यही सब वारती हुई कब सयानी हो आती है, पता तक नहीं चलता है। एक लड़की बचपन के भेदभाव और अनदेखेपन को शायद ही नोटिस करती हो। उसे सर्वप्रथम इस दोहरेपन का अहसास तब होता है जब वह अपने देह में कई प्रकार के बदलाव उमगते हुए देखती है; उसे अपने ही वय के लड़कों के संगत में रहने से अलगाया जाने लगता है; यह करो और वह न करो की शब्दावली में जब उस पर एक के बाद एक चीजें थोपी जाने लगती है; या उसके हँसी-बोली के नाप को बड़े तो बड़े छोटे तक तय और नियंत्रित करने लगते हैं; उस घड़ी लड़की की पीड़ा कितनी कष्टप्रद और असह्î होती है? उसकी आत्मा पर कैसी और किस तरह की रेघारी या खरोचें उगी होती हैं; इस बारे में स्त्रियाँ ही सटीक और निष्पक्ष अभिव्यक्ति दे सकती हैं। नितान्त निजी मौके पर स्त्रियों के सन्दर्भ में अधिसंख्य पुरुष खोखले सिद्ध होते हैं जबकि स्त्रियाँ तब भी उनके प्रति आशावान और गहरे संवेदनाओं से सम्बलित होती हैं। स्त्रियों की भाषा में प्रायः वक्रता अधिक होती है, कटुता नाममात्र भी नहीं।

वर्तमान 21वीं शताब्दी के इस खुले माहौल की बात करें, तो आज भी पितृसत्तात्मक समाज लड़कियों के खुलापन को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। कोई लड़की जैसे ही किसी दुर्घटना या मानवीय-दुव्र्यवहार का शिकार होती है। तथाकथित शुभेच्छु-जन लड़कियों को सामान्य वस्त्र नहीं चादर लपेटकर चलने की सलाह देते नजर आ जाते हैं। लड़कियों को ले कर समाज के मन में असुरक्षा-बोध और अकर्मण्यता दोनों जबर्दस्त है। लैंगिक भेदभाव की पराकाष्ठा ऐसी कि घुप्प अन्धेरी रात में ‘फिल्मी शो’ देखकर लौटता लड़का चारदिवारी फाँदकर घर में घुस सकता है; लेकिन, एक लड़की अन्जोरिया रात में भी अपनी सहेली की शादी से अकेली वापिस नहीं लौट सकती है। यदि लौटती दिख गई, तो कहने वाला टोला-मोहल्ला अगले दिन दरवाजे पर हाज़िर होंगे, ‘युग-ज़माना ख़राब है, और राऊर बिटिया....., भगवान! न करे कि....,’’

किसी भी लड़की के लिए ये वाक्य सुभाषितानी नहीं कहे जा सकते है। दरअसल, यह एक प्रकार की सामाजिक-मानसिक कुंठा है जो लड़कियों को बेड़ियों में जकड़ कर ही उनकी स्वतन्त्रता को परिभाषित करता है। उनकी दृष्टि में एक लड़की का तर्कशील या विचारवान होना(जिसे प्रायः शहराती बुद्धि का मान लिया जाता है) भारतीय समाज के लिए बाँस का फूल होने जैसा है जिसके बारे में बहुश्रुत है कि यह किसी बड़ी विपत्ति या अपशकुन का द्योतक है। ऐसे में उस लड़की को तत्काल सामाजिक अपकृति या समाज के लिए खतरा घोषित कर देना आमबात है। यही कारण है कि बहुसंख्यक लड़कियाँ खुद ही मन मारकर मौन रहना सीख जाती हैं या कि अपनी ही देह में लज़्जा और संकोच को एक आवरण की तरह लपेट कर अपनेआप में सिकुड़ी-सिमटी रहने लगती है। उनके भीतर डर या खौफ इस कदर व्याप्त होता है कि उन्हें लगता है कि वह जैसे ही परिधान बदलेंगी या कि अपने पोशाक की नाप में कटौती करेंगी; नैतिक-ठेकेदार उन्हें ग़लत करार दे देंगे। और कुछ नहीं तो कोई शोहदा सरेराह यह कहता मिल ही जाएगा-‘तनी-सा जिंस ढिला करऽऽऽ...,’

कहने को तो हम 21वीं सदी के उत्तर आधुनिक समाज में हैं लेकिन प्रकटतः लैंगिक भेद, असुरक्षा-बोध, भेदभाव, दोहरापन, लांछन, सामूहिक बलात्कार इत्यादि की शिकार लड़कियाँ ही सबसे अधिक हैं। वे मौन रहकर सबकुछ करते रहने के लिए स्वतन्त्र हैं जबकि अपने मन का कुछ भी न करने के लिए अभिशप्त हैं। प्रायः लड़कियों के जिस सौन्दर्य-बोध का गुणगान/महागान किया जाता है, वह उनका नैसर्गिक गुण कम आरोपित-कर्म ज्यादा है। आभूषण धारण करने के लिए शरीर-छेदन की जिस पीड़ाजनक प्रणाली से उन्हें गुजरना होता है; वह उनकी स्वैच्छिक चयन-प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। दरअसल, ये रवायतें एक लड़की को सामाजिक उŸाराधिकार में प्राप्त है। आमोखास सभी वर्ग में आधी-आबादी को सामाजिक कारागार के भीतर ही कुलरक्षिता के रूप में अधिष्ठित किया गया है। एक लड़की अपनी कर्म-चेतना में चाहे कितना भी प्रखर, गुणी, निष्णात अथवा पारंगत क्यों न हो; वह लैंगिक-पूर्वग्रह और लैंगिक-भेदभाव से बच कम ही पाती है।

अपने इर्द-गिर्द को ही प्रतिदर्शात्मक इकाई मानकर देखें, तो कमोबेश सभी लड़की जवाबदेहियों का पठार आजीवन ढोते हुए मिल जाएंगी जबकि उनका श्रम-मूल्य ‘भारहीनता’ का शिकार है। उस पर आरोपित पारिवरिक एवं सामाजिक गुरुत्वाकर्षल बल(g और G) पीड़ाजनक है। एक लड़की भ्रम और भुलावे की जिस परिधि में जन्म के बाद से निरन्तर चक्कर काटती है, एक दिन यकायक उसे उस वृत्तीय-परिक्षेत्र से बाहर कर दिया जाता है। सोने, ओढ़न,े बिछाने का मामूली साजोसमान दे कर किसी लड़की के सम्पूर्ण मानवीय अधिकार को छीन लेना सरासर अन्याय नही ंतो और क्या है? लेकिन, न्याय की परिभाषा गढ़ने वाले होते, तो आखिरकार पुरुष ही हैं; अतः सामाजिक अन्याय उन्हीं के हितों का समर्थक और मुखापेक्षी बना हुआ है।

पितृसत्तात्मक समाज अपनी प्रवृत्ति और निर्णय में कितना पक्षपाती है; कवयित्री अनामिका का मत इसे समझने की दृष्टि से उपयुक्त है-‘‘स्त्रियों का दोहन क्यूंकि दोहरा होता है(विस्थापन का दुःख, यौन शोषण के नए सिलसिले एक साथ झेलने पड़ते हैं उन्हें), अपनी मूल भाषा से उनका लगाव भी दोहरा हो जाता है। यही कारण है कि अपनी सन्तति को क्षेत्रीय लोककथाएँ, लोरियाँ, पहेलियाँ और चुटकुले वे भरपूर सुनाती हैं। वैसे भी अतृप्त मनुष्य ही बोलना चाहता है, पर संरचनागत दबाव कुछ ऐसे होते हैं कि जो कहना चाहता है, साफ कह नहीं पाता और कई दरारें निकल आती हैं। शब्द और शब्द के अनन्तर जिसमें कई अर्थ-छवियाँ फँसी पड़ी होती हैं। स्त्रियाँ इस अतृप्ति का उपाय अधिक सर्जनात्मक और हँसमुख ढंग से कर लेती हैं। जिसे भी अधिक त्रास झेलने होते हैं, वह विपरीत परिस्थिति में भी मस्त रहना सीख जाता है।’’

कवयित्री अनामिका अपने आकलन में दुरुस्त हैं। आज हर लड़की वाकई अपने मनुष्य होने के पूरेपन को जीना चाहती है। अतएव, उसकी मस्ती और हँसी-ठिठोली में जागृति का रंग गहरा है। ‘गंगा से वोल्गा’ तक यात्रा कर चुकी ये लड़कियाँ प्रवाह में बहते जाने के विपरीत जीवनधारा में हमेशा बने रहने की इच्छुक हैं। देखना होगा कि वे शरीर उघाड़ने वाली (अप)संस्कृति का ‘कोर मेम्बर’ नहीं हैं जबकि अपनी स्वाधीनता के उजास में उन्हें अपनी आत्मा, मन, दिमाग और देह सब को मुक्त छोड़ देना क़बूल है। इन आधुनिक लड़कियों के स्वभाव में जो बेलाग-बेलौसपन दिखाई दे रहा है; वह मुक्ति का मुक्तकंठ पाठ है। ‘माइलस्टोन’ पर बिना आँख रखें आगे बढ़ती इन लड़कियों के सामने दुश्वारियाँ पहले से कहीं अधिक है, चुनौतियाँ और संघर्ष तो और भी असीमित। कुल के बावजूद निर्भय-निडर इनमें से अधिसंख्य साहसी और आत्मविश्वासी लड़कियाँ ज्ञान और चेतना का ‘कोलाज’ या कि ‘मास्टर काॅपी’ बनाने में लड़कों से काफी आगे हैं।

वैश्वीकरण के इस संकटकालीन दौर में यह भी स्पष्ट दिख रहा है कि ‘मार्केट कारपोरेटलिज़्म’ इन लड़कियों को वस्तु-छवि या कि ‘कमोडिटी’ के रूप में भुनाने की जबर्दस्त जुगत में है। बाज़ारवादी ताकतें उनकी आजादी को अलग ढंग से विज्ञापित/विरुपित कर रही हैं जिसमें उन्हें आंशिक सफलता भी प्राप्त है। तब भी बहुसंख्यक भारतीय तरुणी इन सम्मोहनास्त्रों से स्वयं को बरका ले जाने या बचाए रखने में सफल हैं। असल में, उपभोक्तावादी संस्कृति के मकड़जाल से खुद को बरका ले जाना इन लड़कियों के प्रखर चेतना और उपयुक्त निर्णय-क्षमता का प्रतीकीकरण है जो ‘डाउ जोन्स’(अमेरिकी प्रकाशन व वित्त सूचना संघ) से नहीं तय हो रही होती है। यह तो तय उनसे भी नहीं हो रही होती है जो नैतिकता के झण्डाबदार हैं या कि सामाजिक व्यासपीठ पर आसीन हैं। भूमण्डलीकृत विश्व का उपभोक्ता माने जाने के कारण यूँ तो पूरी दुनिया इन लड़कियों के कदमों का वजन नाप और तौल रही है; लेकिन, पुनर्रचना के निकष पर सवार ये लड़कियाँ अपनी गति, ऊर्जा और संभाव्य चेतना से निरन्मर अपना कदम आगे की ओर बढ़ा रही हैं। यद्यपि तराजू की तौल पर लड़कियों का वजन लगातार वजनदार सिद्ध हो रहा है, तथापि ये लड़कियाँ झूठी गुमान की जगह गर्वीली मुसकान के साथ हाट-बाज़ार में बैठी हुई चूड़ीहारिनों के आगे अपनी दोनों हाथ बढ़ाए हुए मानों कह रही है...रिंग-रिंग-रिंगा....2 रिंग-रिंग-रिंगा...रिंगा-रिंग।  
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