ओह! पेरूमल मुरुगन!!!


यह खबर और खबरों की तरह ही एक सामान्य खबर-सी लगती है जो है कतई नहीं। तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन का लेखन से अलविदा कहना हमारे सत्य के सांचे का उलट जाना है। मुरुगन को लेकर उठे विवाद और उनके निर्णय से कई आहत होंगे, कई दुःखी और कई इसे अपूर्णनीय क्षति बतायेंगे; लेकिन पेरूमल की पुनः लेखन में वापसी के बाद भी शायद यह सत्य न मिटाया जा सके कि इस वक्त सत्य सबसे अधिक असुरक्षित है और इसे बचाने को लेकर कोई हलचल या सरगर्मी नहीं दिखाई दे रही है। यह प्रवृत्ति हमारे बीच से कई संवेदनशील लेखकों और उनकी कालजयी कृतियों से हमें वंचित कर दे रहा है जो एक विकल्प की तरह सत्ता और वर्चस्व के खिलाफ मानवता के पक्ष में खड़ी होती दिखाई देती हैं। अतः पेरूमल का यह निर्णय भले ही वर्तमान चर्चा-परिचर्चा और प्रायोजित ‘तुमुल निनाद’ के बीच शोराफ्ता ढंग से हवा में विलिन हो जाए; लेकिन यह निर्णय वर्तमान समाज की अपंगता और उसके रोगग्रस्त मिजाज का परिचायक है; इससे इंकार बमुश्किल ही कोई कर सकता है।

पेरूमल मुरुगन तमिल भाषाभाषियों के लोकप्रिय लेखक हैं; यह मैंने 'जनसत्ता' से जाना। यह मेरी सीमाएं हैं, लेकिन पिछले सात वर्षों से ‘विद्या की राजधानी’ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को कभी उनका नाम लेते नहीं देखा; उनके लेखन पर गंभीरता से बहसतलब होते नहीं पाया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में उत्तर का साहितय उत्तरोत्तर बढ़ रहा है जबकि दक्षिण और दक्षिण के राज्यों के लेखक हाशिए पर हैं या हैं भी तो अकादमिकजनों के उन शोध्-पत्रों में जो साहित्य की ‘एपीआई’ बढ़ाने के काम आते हैं। खैर! तनख़्वाह तो इसी से मिलते और सरकारी बढ़ोतरी पाते हैं।
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