स्वाधीन, चेतस और बहुरंगा युवजन

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अस्सी के दशक में संयुक्त राष्ट्र संघ ने सन् 1985 को ‘अन्तरराष्ट्रीय युवजन वर्ष’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी। 12 अगस्त संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अन्तरराष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में घोषित है। इस घोषाणा के पीछे मूल उद्देश्य बीसवीं शताब्दी के युवकों की अत्यन्त विविधतापूर्ण और परस्पर विरोधी सामाजिक गतिविधियों को लक्षित करना था। साथ ही, सामाजिक परिवर्तन में युवाओं की उस भूमिका को चिह्नित करना था जिसके बगैर यह पटकथा पूरी ही नहीं की जा सकती है। युवावस्था गहन समाजीकरण की अवधि है। आधुनिक विज्ञान समाजीकरण को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित करता है जिसके दौरान व्यक्ति समाज के एक पूर्ण और समान सदस्य के रूप में कार्य करने हेतु अपनी भूमिका निर्धारित करता है और ज्ञान सन्दर्भित आवश्यक मानकों और मूल्यों की सुनिश्चित एवं सुस्पष्ट पद्धति ग्रहण करता है।
    इस सन्दर्भ में जवरीमल्ल पारख का यह कहना समीचीन प्रतीत होता है कि युवावस्था कर्म की अवस्था है; लेकिन, यह अवस्था विवेक और विश्वास की भी अवस्था है। यह दुनिया को एक बेहतर दुनिया बनाने के संघर्ष में शामिल होने की अवस्था भी है और यही अवस्था दूसरों को कोहनियों से धकेलकर अपने लिए ज्यादा से ज्यादा जगह घेरने की भी अवस्था है। वस्तुतः किसी भी तरह के समाज में युवा वर्ग अपने लिए जगह चाहता है। अपनी प्रतिभा और अपनी क्षमता के अनुरूप अपनी भूमिका चाहता है। यह भूमिका स्वार्थों को पूरा करने तक सीमित रहती है या व्यापक समाज के हित में इसका विस्तार देखा जा रहा है, यह प्रश्न भी कम महŸवपूर्ण नहीं है। जब हम व्यापक हित की बात करते हैं तो इसका अर्थ यह भी है कि इसे धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र आदि द्वारा सीमित नहीं किया जा रहा है। ऐसी कोई भी संकीर्णता जो आत्मा को उन्मुक्त होकर विचरण करने से और अपने सर्वोŸाम को प्रकट होने से रोकती है, तो युवाओं की ऊर्जा ऐसे मार्गों से निकलने लगेगी जिससे किसी भी समाज में न शान्ति रह सकती है और न ही उसका विकास हो सकता है।(युवा अंक, नया पथ)
    यह निर्विवाद तथ्य है कि अपनी प्रकृति और व्यवहार में युवजन की सक्रियता एवं उसकी मानसिक क्रियाशीलता अन्य वय के बनिस्ब़त सर्वाधिक तीव्र और प्रतिक्रियावादी होती है। उनमें जोश एवं वर्गीय अंतःप्रवृŸिा की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। वास्तविक अर्थों में यह वय उन्मुक्तता, ऊर्जस्विता और नवोन्मेष का धारक है। तब भी युवजन किसे मानें? यह प्रश्न महŸवपूर्ण है। सन् 2011 में विश्व बैंक ने जीवन-विस्तार(लाइफ स्पैन) से सम्बन्धित एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में जीवन-प्रत्याशा सकारात्मक अभिवृद्धि के साथ औसत लगभग 65 वर्ष है। इस बढ़ोतरी के मद्देनज़र देखें, तो युवाओं के वय-निर्धारण के लिए पूर्व में जो मानक तय किए गए हैं, उन्हें 25-35 आयु-वर्ग से बढ़ाकर अब 35-45 आयु-वर्ग मानना उपयुक्त कहा जा सकता है। यद्यपि व्यक्तित्व के अनुरूप युवामन की कोटियाँ अनगिनत है, तथापि अधिसंख्य युवा अपने जीवन, कर्म, विचार और व्यवहार में अप्रत्याशित साम्य-संतुलन प्रदर्शित करते हंै। सार्वजनिक जीवन में युवाओं का यह प्रयत्न स्वाधीनता, समता एवं आधुनिक भावबोध से अनुप्राणित है जो उनके लिए सबसे बड़ा मूल्य है और सांस्कृतिक-राजनीतिक चेतना का मूलाधार भी।
    आधुनिक समाज में युवजन ‘स्वयं में’ एक वर्ग बन चुका है, लेकिन अभी स्वयं के लिए स्वतन्त्र नेतृत्व की भूमिका में नहीं है। राजनीति की मुख्यधारा में युवाओं की भागीदारी आज भी चिन्ताजनक बनी हुई है। वर्तमान में ज्वलंत सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को उठाने वाले जनान्दोलनों में युवा पीढ़ी की सहभागिता बढ़ी है। देखना होगा कि ऐसे किसी भी आन्दोलनों में से एक भी आन्दोलन नौजवानों की, जिनका इन देशों की जनसंख्या में काफी बड़ा भाग शामिल है, सशक्त और प्रायः निर्णायक भागीदारी के बिना नहीं फैला, बढ़ा। आज इन देशों में नवसाम्राज्यवादी ताकतों से मुक़ाबला करने और आर्थिक पिछड़ापन ख़त्म करने हेतु छेड़े गए जनसंघर्ष में युवजन  चालक-शक्ति(प्राइम मूवर) की भूमिका में है जबकि यह सचाई है कि युवजन समजातीय समूह नहीं है।




(जारी....)
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