Sunday, May 8, 2011

अमरीकी इरादों का डीएनए टेस्ट जरूरी

''पाक में मारा गया ओसामा!’’
‘‘अलकायदा हुआ बिन लादेन!’’
‘‘दुनिया पहले से ज्यादा सुरक्षित!’’
‘‘जस्टिस हैज बीन डन!’’

समाचारपत्र की उक्त पंक्तियाँ ओसामा बिन लादेन के मारे जाने से सम्बन्धित हैं. 1 मई की देर रात पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से सटे ऐबटाबाद में अमरीका ने सीधी कार्रवाई को अंजाम देते हुए ओसामा के अंत की घोषणा की, तो पूरे विश्व में एकबारगी सनसनी फैल गई. आतंकी संगठन अलकायदा का मुखिया 54 वर्षीय लादेन दुनिया का सर्वाधिक वांछित आतंकवादी था जिस पर अमरीका ने 1 अरब रुपए से अधिक का इनाम घोषित कर रखा था. 9/11 की चर्चित घटना के बाद ओसामा के नाम से पूरी ख़ासोआम दुनिया वाकिफ़ हो गई थी और वह विश्व की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘टाइम’ द्वारा इतिहास के 10 सबसे कुख्यात भगोड़े आतंकी की सूची में पहले स्थान पर शामिल किया जा चुका था. उसकी मौत की सूचना क्या मिली, अमरीकी जनता उसी रात सड़कों पर उतर आई. जश्न में डूबे अमरीकी नागरिक व्हाइट हाउस के सामने ‘यूएसए...यूएसए’ चिल्ला रहे थे. इस ख़बर से वे कितने आह्लादित थे, इसका अंदाजा वहाँ खड़े हुजूम को देखकर लगाया जा सकता था.

वास्तव में यह अमरीकी प्रशासन और सीआईए की जीत थी जिसने पाक को बगैर कोई अग्रिम सूचना दिए वो करतब कर दिखाया था जिसकी कल्पना इस्राइल के अलावा शायद ही कोई दूसरा मुल्क कर पाता. अमरीका की यह कार्रवाई पूरी तरह एकपक्षीय थी. अमरीकी ख़ुफिया एजेंसी सीआईए ने पाकिस्तानी-तंत्र के किसी सिपाहसलार को इसकी भनक तक नहीं लगने दी. और जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को ओसामा के मारे जाने की ख़बर मिली; तो उस वक्त पूरा अमरीका जश्न में डूब चुका था. इसके पीछे का असली रहस्य या भीतरी सचाई क्या है, यह जानने के लिए सिवाय इंतजार के और कोई चारा नहीं है.

अपनी सरज़मीं पर आतंकवादियों को पनाह देने को लेकर पाकिस्तान की पहले भी काफी छीछालेदर हो चुकी है. पाकिस्तान ने आतंकी गतिविधियों में किसी किस्म का सहयोग देने या फिर अपने देश में इनके प्रशिक्षण शिविर होने सम्बन्धी आरोप को हमेशा ख़ारिज किया है. भारत ने इस बाबत कई बार अन्तरराष्ट्रीय मंच से आतंकी गतिविधियों को पाकिस्तानी संरक्षण हासिल होने सम्बन्धी मसले को जोरदार ढंग से उठाया, लेकिन विश्व के किसी भी देश ने इस ओर अपेक्षित सहयोग नहीं किया. लेकिन इस घड़ी पाकिस्तान की स्थिति साँप-छछूंदर वाली है जिसे निगलना और उगलना दोनों मुश्किल हो चुका है. पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की जवाबदारी बनती है कि वह इस मामले में पूरी ईमानदारी बरतते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट करें. यह इसलिए भी जरूरी है कि लादेन को जिस जगह मारा गया है, वह कोई खोह या दुर्गम इलाका न हो कर अतिसंवेदनशील सुरक्षित स्थान है. ऐबटाबाद में घटनास्थल से कुछ ही दूरी पर पाकिस्तानी सैन्य अकादमी का अवस्थित होना न केवल चैंकाता है; बल्कि संदेह का भरपूर अवसर देता है. अमरीका के आतंकवाद निरोध और गृह सुरक्षा मामलों के राष्ट्रीय उप सुरक्षा सलाहकार जाॅन ब्रेनन का कहना तर्कसंगत है-‘यह नहीं माना जा सकता है कि लादेन का पाकिस्तान में कोई सहयोगी तंत्र नहीं था.’

मशहूर अमरीकी पत्रकार जाॅन रीड की एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है-‘‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी.’ लेकिन जब जनमाध्यमों ने ओसामा के मारे जाने से सम्बन्धित ख़बरें देनी शुरू की, तो दुनिया तनिक भी हिली-डुली नहीं. अमरीका को छोड़ दुनिया भर में जश्न का माहौल भी कम ही देखने को मिला. भारत की ओर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बेहद सयंत लहजे और संतुलित भाषा में प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ‘‘ओसामा का मारा जाना अलकायदा और सैन्य आतंकी संगठनों से निपटने की दिशा में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है.’’ यह जरूर है कि अमरीका से आयातित इन ख़बरों को दुनिया ने बड़े ही चाव से देखा, पढ़ा-सुना और गुना. इस अभियान को सीआईए ने आॅपरेशन जेरोनिमो नाम दिया था जिसकी सफलता ‘जेरोनिमो-ईकेआईए’ के रूप में कूटीकृत थी जिसका अर्थ था-‘ओसामा-दुश्मन को मार गिराया गया.’ अमरीकी उच्चाधिकारियों के बीच लाइव आॅपरेशन देख रहे बराक ओबामा की देहभाषा ‘आउट आॅफ फार्म’ और उनका ‘एड्रिनलिन लेबल’ निम्न दिखा. लेकिन अभियान के सफल होने के तुरंत बाद उन्होंने दुनिया के सामने जो कहा-‘हम जो चाहते हैं वो कर दिखाते हैं.’ उस घड़ी बराक ओबामा में अमरीकी हेकड़ी साफ दिख रही थी. उन्होंने बेहद संक्षिप्त एवं नपे-तुले शब्दों में जितना असरदार कहा, वह दरअसल अमरीका की कूटनीतिक विजय थी.

अमरीकी विशेष बल ‘नेवी सील्स’ ने पूरे अभियान को चार हेलिकाॅप्टरों के माध्यम से अंजाम दिया. ओसामा को ख़त्म करने में अमरीकी रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ 40 मिनट लगे. इस दौरान उनका एक हेलीकाॅप्टर भी नष्ट हो गया. ओसामा के परिजनों में से कुछ को अमरीकी सेना अपने साथ लेती गई ताकि उनसे गहन पूछताछ की जा सके. अमरीकी सेना कंप्यूटर हार्ड डिस्क भी अपने साथ ले गई है जिसमें आतंकी गतिविधियों से सम्बन्धित अहम सुराग होने का दावा किया जा रहा है. वैसे तो अमरीकी ख़ुफिया विभाग उन समस्त सूत्रों एवं सुरागों पर कड़ी निगरानी रखने का काम पहले घंटे से ही शुरू कर चुकी होगी जो हार्ड डिस्क के माध्यम से उसके हाथ लगी है. लेकिन हार्ड डिस्क ड्राइव मिलने की पुष्टि और खुलासा अमरीका ने सार्वजनिक तौर पर तकरीबन 6 घंटे बाद किया.

सन् 2001 में अलकायदा ने जब ‘वल्र्ड ट्रेड सेन्टर’ पर हमला बोला तो उसमें तकरीबन 3000 लोग मारे गए. 9/11 की इस ख़ौफनाक घटना के बाद ओसामा बिन लादेन को लेकर अमरीकी महकमें में धर-पकड़ सम्बन्धी गतिविधियाँ तेज हो गई. वैसे सीआईए उसे दबोचने के फि़राक में 1990 से ही जुटी थी; लेकिन वह अमरीका और गठबंधन सेना को चकमा देने में हमेशा सफल रहा. यह वही सीआईए है जिस पर आरोप है कि उसने 1979 में सोवियत रूस के खिलाफ ओसामा को ट्रेनिंग दी थी. लेकिन खाड़ी युद्ध के दौरान उपजी तनातनी में ओसामा अमरीकी नीतियों के खिलाफ हो गया. फिर उसके बाद अमरीका से जो सम्बन्ध बिगड़े, तो अंत तक सुधरने का नाम नहीं ले सके. ताज्जुब भले हो, किन्तु सचाई है कि अमरीका अपनी हित-साधना में बेहद प्रवीण है. वह कब किसका हितैषी बन जाए; और कब किसका दुश्मन, इसका पता लगाना टेढ़ी खीर है. यों तो नीतिशास्त्र की एक बहुश्रुत कथन है-‘‘राजनीति में न तो कोई स्थायी मित्र होता है और न ही दुश्मन.’’

फिर भी, ओसामा की अमरीकी-विरोध सम्बन्धी नीति स्पष्ट थी. उसका सार्वभौमिक लक्ष्य इस्लामी कट्टरवाद का समर्थन तथा आतंकी संगठनों के बीच जेहाद था. अलकायदा के कई लड़ाकों का मानना था कि ओसामा जंग के दौरान आगे की पंक्ति में खड़ा हो कर दुश्मनों पर वार करता है. मृत्यु के अंतिम क्षण में भी ओसामा अपने बचाव के लिए एक औरत को ढाल की तरह इस्तेमाल कर सकता है, ऐसा मानने वाले उसके गिरोह में शायद ही कोई हो. उनका मानना है कि ओसामा अलकायदा के मुखिया की तरह कम दोस्त की भाँति ज्यादा व्यवहार करता था. क्या इन्हीं सब वजहों से तालिबानी लड़ाकों में उसकी लोकप्रियता शिखर पर थी. उसका मजबूत संगठन आन्तरिक टूट-फूट से बचा रहा. और उसके समर्थित लोग उसे मसीहा की तरह पूजते रहे. ये सवाल ऐसे हैं जो ओसामा के शव को समुद्र में बहा दिए जाने के बाद भी सभी को झिंझोड़ती रहेगी.

अमरीका ने ओसामा की छवि को न सिर्फ महिमामंडित किया, सर्वाधिक भुनाया भी. अब उस प्रेतछाया से मुक्ति काफी हद तक संभव है. उम्मीद की जानी चाहिए कि अफागानिस्तान से अमरीकी सैनिक-बल हटेंगे और वहाँ आन्तरिक लोकतंत्र बहाल होगा. अमरीका की वापसी पूरी दुनिया के लिए एक नज़ीर बन सकती है. अमरीका के बारे में एक आमफ़हम धारणा है कि उसके पैर जिस सरजमीं पर पड़ जाते हैं; वह वहाँ की चैहद्दी, सरहद और हद सबकुछ भूल जाता है. फिलहाल, ओसामा के मारे जाने से उसके मौत से सम्बन्धित अटकलों से छुटकारा मिलेगी. कई प्रतिष्ठित समाचारपत्र उसके ख़ात्में से जुड़ी ख़बरें छाप चुके हैं. कईयों ने तो पर्याप्त सबूत पेश कर अपने दावे की पुष्टि भी की है. स्वर्गीय बेनजीर भुट्टो सहित मौजूदा राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी तक यह कह चुके हैं कि ‘ओसामा दुनिया को अलविदा कह चुका है.’ खुद अमरीका अफगानिस्तान स्थित तोराबोरा की पहाडि़यों पर भीषण गोलीबारी कर चुका है जहाँ उसे ओसामा के छुपे होने का अंदेशा था. आज वे सारे कयास बेमतलब साबित हुए जब अमरीका ने दुनिया को बताया कि ओसामा अभी तक जिन्दा था जिसे उनके जांबाज लड़ाकों ने बीती रात मार गिराया.

सचाई जो हो, लेकिन जाहिरा तौर पर ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने ऐसे समय में मारा है जब अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की छवि धूमिल हो रही है और उनकी लोकप्रियता का कद नित घट रहा है. हालिया कार्रवाई को बराक ओबामा ने आगामी चुनावों के मद्देनज़र हरी झण्डी दी है, यह काफी हद तक सच प्रतीत होता है. आर्थिक मंदी से उपजे हालात में अमरीका की अर्थव्यवस्था जिस ओर करवट ले रही है, उसमें बराक ओबामा की पुरातन छवि एकदम मिसफिट बैठती है. लिहाजा, यह माना जाने लगा है कि ओबामा भी अब पिछले राष्ट्रपति जार्ज डब्लयू बुश के नक्शेकदम पर चलना चाहते हैं; ताकि अमरीकियों की आक्रामकता और सर्वश्रेष्ठ-ग्रंथि को भुनाया जा सके.

यह इसलिए भी जरूरी हो चला है कि इस समय अमरीका अरब देश लीबिया में बुरी तरह फँसा है. वह वहाँ अपने युद्धक पंजे से लोकतंत्र-विरोधी कार्रवाइयों को अंजाम दे रहा है जिसकी विश्वभर में तीखी आलोचना की जा रही है; उसके मद्देनज़र ‘ओसामा के अंत’ सम्बन्धी ख़बर ‘प्लाॅट’ किया जाना साफ समझ में आती है. कर्नल मुअम्मर गद्दाफी जिन्हें अपने ही देश लीबिया में जनता के भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है; पर निशाना साधते हुए अमरीकी सेना जिस प्रकार ताबड़तोड़ हमला बोल रही है वह हरगिज़ तर्कसंगत या उपयुक्त कार्रवाई नहीं है. पिछले दिनों कर्नल गद्दाफी के बेटे सहित उनके छोटे-छोटे नाती-पोतों को मौत के घाट उतार दिया जाना, अमरीका और नाटो देशों को कठघरे में खड़ा करता है. बर्बर हमलों के द्वारा अमरीका आखि़र अपनी किस लोकतांत्रिक पक्षधरता और वैश्विक जवाबदेही को प्रदर्शित करना चाहता है, यह सोचने का विषय है? ऐसे निर्णायक समय में अमरीका ने एक गंभीर चाल चलने की कोशिश की है. लीबिया से सारी दुनिया का ध्यान बँट सके, इसके लिए उसने ओसामा के गुप्त ठिकाने पर अचानक धावा बोला जिसका सुराग पिछले साल के अगस्त महीने में ही मिल चुके थे. लेकिन अमरीका सीधी कार्रवाई से कतराता रहा. सटीक निशानदेही के बावजूद अमरीकी खुफिया विभाग सीआईए द्वारा नौ महीने तक कुछ नहीं किए जाने के पीछे अमरीका की असली मंशा क्या हो सकती है? यह सभी राजनीतिक विश्लेषकों एवं अन्तरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों के लिए चुनौतीपूर्ण मसला है.

अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा का यह कहना कि ‘न्याय हो चुका है(जस्टिस हैज बीन डन), चकित करता है. स्वयं को वैश्विक न्यायमूर्ति की भूमिका में रखकर देखने वाला अमरीका अक्सर यह भूल जाता है कि उसके इस कथित न्याय से दुनिया में आतंक, खौफ और भय का वातावरण ज्यादा गाढ़ा हुआ है. सद्दाम हुसैन को रसायनिक जैव-हथियार रखने के निराधार आरोप में नेस्तानाबूद कर चुका अमरीका आज वहाँ की जनता से कैसा न्याय और सलूक कर रहा है, यह सचाई छुपी नहीं है. उसने अभी तक जितनी भी लड़ाइयाँ लड़ी हैं; उसके पाँव हर जगह ‘हाथी पाँव’ की तरह रोगग्रस्त दिखें हैं. अंतोनियों ग्राम्सी का एक मशहूर कथन है-‘‘लड़ाइयाँ व्यापार के लिए लड़ी जाती हैं, न कि सम्यता के लिए.’’ यहाँ भी अमरीकी युद्ध का मुख्य लक्ष्य अरब देशों के कच्चे तेल-संसाधनों पर कब्जा जमाना है. पूँजीवादी शोषण-व्यवस्था के विकेन्द्रीकरण में जुटा अमरीका आज जिन वजहों से आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है, उसमें उपभोग-संस्कृति का बहुत बड़ा हाथ है. अरब देश इस उपभोग-संस्कृति के धुर विरोधी हैं. वे अमरीकी जीवनशैलियों एवं आधुनिकता के साए में थोपी जा रही अनैतिक हरकतों को धर्म विरुद्ध आचरण मानते हैं. ओसामा बिल लादेन जैसे आतंकवादियों को सहानुभूति या जनसमर्थन हासिल होने के पीछे अमरीका का असली साम्राज्यवादी चेहरा है जो अलकायदा जैसे आतंकी गिरोह से ज्यादा ख़ौफनाक और भयावह है.

भारत के सन्दर्भ में इस घटना का अपना एक अलग ही अर्थ है. विदेश मंत्री एस0एम0 कृष्णा ने जहाँ इसे ‘ऐतिहासिक’ बताया है, वहीं गृहमंत्री पी0 चिंदबरम ने मुंबई हमलों की साजिश रचने वालों को पाकिस्तान में पनाह मिलने सम्बन्धी दावे को एक बार फिर से दुहराया है. इस मौके का फायदा उठाते हुए भारत ने मुंबई में हुए 26/11 हमले के षड़यंत्रकर्ता दाउद इब्राहिम और उसकी ‘डी’ कंपनी से जुडे ठोस साक्ष्यों के अपने पास होने की पुष्टि की है; लेकिन वह अमरीकी तर्ज़ पर उन्हें धर दबोच पाएगा, यह कहना बहुत मुश्किल है. भारत ने सकारात्मक रुख दिखाते हुए अमरीका-पाकिस्तान के साथ अपने सम्बन्धों की पुनर्समीक्षा शुरू कर दी है.

फिलहाल मध्य-पूर्व एशिया में फैले आतंकी संगठन अलकायदा को कमतार आँकने की भूल नहीं की जानी चाहिए. ओसामा के बाद अलकायदा का कमान संभाल रहे अयमान अल जवाहिरी ने अमरीका-पाकिस्तान को सबक सिखाने सम्बन्धी जो एलान किया है; उसकी आँच और तपिश से भारत भी झुलसेगा. इन संभावित खतरों से निपटने के लिए भारतीय सुरक्षा-तंत्र ज्यादा मजबूत और चैकस हो, इस दिशा में ठोस प्रयास किए जाने की जरूरत है. 9/11 के बाद भले अमरीका में किसी किस्म की आतंकी घटना न घटी हो, लेकिन आने वाले समय में अलकायदा के ज़ख्मी लड़ाकू उससे भी भीषण हमले की साजिश रच सकते हैं. फिलहाल पाकिस्तान उनका पहला ‘टार्गेट’ हो सकता है. ओसामा की मौत के साथ आंतक की आतंकी-कथा ख़त्म हो चुके हैं, यह सोचना फिलहाल जल्दबाजी होगी. पूर्व आईएसआई प्रमुख हामिद गुल की टिप्पणी महत्त्वपूर्ण है-‘‘पाकिस्तान के भीतर अलकायदा को समर्थन करने वाला एक बड़ा तबका मौजूद है और महज ओसामा बिन लादेन की मौत से यह नहीं कहा जा सकता कि दुनिया से आतंकवाद का ख़ात्मा हो गया.’’

यहाँ मुख्य सवाल आतंकी सरगना अलकायदा के मुखिया ओसामा बिन लादेन के मारे जाने से ज्यादा इस बात को ले कर है कि इन समस्त कार्रवाइयों में पाकिस्तानी सेना की भूमिका क्या है? वह गैर-मुल्क से अपनी भूमि पर संचालित एक गुप्त अभियान को ‘ट्रेस’ करने में ऐसे कैसे विफल रही, जबकि वहाँ सैन्य अकादमी का चाक-चैबंद अड्डा मौजूद है? इस पूरे घटनाक्रम पर पाकिस्तान ने कोई सीधी आपत्ति नहीं दर्ज की, जबकि यह मामला सीधे-सीधे आन्तरिक सम्प्रभुता के उल्लंघन का बनता है. एक परमाणु संपन्न राष्ट्र की सम्प्रभुता को इस तरह खुलेआम चुनौती दी जाती है. फिर भी वह अपने तेवर में तल्ख़ कम गुपचुप रवैया ज्यादा अपनाता है. पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर ने भविष्य में ऐसी किसी किस्म की कार्रवाई के बदले गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है, किंतु यह चेतावनी कम मामले को रफा-दफा करने का प्रयास अधिक है. भारत-भय(इंडो-फोबिया) से ग्रस्त पाकिस्तान अमरीका से ज्यादा भारत के सामने अपनी सैन्य-शक्ति और युद्ध-क्षमता का ढिंढोरा पिट रहा है. जबकि पाकिस्तान के प्रतिरक्षातंत्र को ध्वस्त होते हुए सारी दुनिया ने खुद अपनी आँखों से देखा. इसमें कोई दो मत नहीं है कि पाकिस्तान को आतंकी संगठनों के सफाए के नाम पर अमरीका ने आफ़रात आर्थिक सैन्य मदद पहुँचायी है. अतः संभावना यह भी जताई जा रही है कि अमरीकी खुफिया विभाग सीआईए को समस्त सुचानाएँ पाकिस्तान ने ही मुहैया कराए हैं जिसके बदले में उसने अमरीका के साथ गोपनीय राजनयिक ‘डील’ कर रखा है.

बहरहाल, ओसामा बिन लादेन जैसे एक आतंकी शख़्स का मारा जाना; दुनिया के लिए जितनी सुकूनदेह ख़बर है, उतनी ही खतरनाक भी. अतः इस ख़बर को अमरीकी शर्तों पर स्वीकार कर लिया जाए, यह तर्कसंगत नहीं है. अमरीकी फैसला ही विश्व-समाज का फैसला हो; इसकी पुष्टि के लिए अमरीकी इरादों का डीएनए टेस्ट जरूरी है. इस घड़ी अमरीकी बहाव में बहने की जगह अभिसारित ख़बरों की गहन जाँच-पड़ताल की जानी चाहिए. क्योंकि यह एक किस्म की ‘इम्बेडेड जर्नलिज्म’ अर्थात ‘नत्थी पत्रकारिता’ है जिसमें सेना द्वारा मुहैया कराई गई सूचना ही अंतिम तथ्य मान ली जाती है.

सच जानने की यह प्रक्रिया बेहद जटिल या फिर पेचीदगी भरी हो सकती है, किन्तु इससे जो तथ्य उजागर होंगे; उसे निरर्थक या निराधार साबित करना मुश्किल होगा. वर्तमान समय में किसी सूचना को काफी देर तक पचाए रखना अथवा सेंसर करना मुश्किल है. अतः देर-सबेर जब भी इस घटना की असली परत खुलेगी, न केवल अमरीकी प्रशासनिक नीति की असलियत उजागर होगी; बल्कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान भी ओसामा बिन लादेन को अपनी सरज़मी पर पनाह देने सम्बन्धी रहस्यों से पर्दा हटाने के लिए बाध्य होगा.

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