Tuesday, November 23, 2010

ख़बर है पूर्वी एशिया में आग लगी है


दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के आपस में सुधरते सम्बन्धों को तेज झटका लगा है। नवंबर माह के अंतिम सप्ताह के बीच हुए भीषण गोलेबारी की वजह से दोनों देशों में भारी तबाही मची है। योंग्पेयोंग टापू में आग की लपटें हैं। आसमान में धुएँ की धौंकनी जल रही है। आरोप-प्रत्यारोप के मध्य दोनों देश एकदूसरे पर लगातार तोप से गोले दाग रहे हैं। दक्षिण कोरिया को अमेरिका का समर्थन हासिल है। वह उत्तर कोरिया पर 200 गोले दागने के आरोप मढ़ रहा है। इस कथित हमले में अपने दो सैनिकों के मारे जाने को लेकर दक्षिण कोरिया तैश में है। उसके पास अपने देश से दागे गोले का हिसाब नहीं है जो योंग्पेयोंग टापू में धधकता दिख रहा है। बीबीसी ने अपने वेबसाइट पर इससे सम्बन्धित कुछ फुटेज अपलोड किए हैं जिसे दक्षिण कोरिया के सभ्य नागरिकों द्वारा कैमरे में कैद करते हुए देखा जा सकता है। बीबीसी ने उन तस्वीरों को भी जारी किया है जिसमें उत्तर कोरिया के सैनिक शांत, स्थिर और खुशमिजाज नजर आ रहे हैं। उनके चेहरे पर हिंसा, आक्रामकता और क्रूरता के कोई लक्षण नहीं मौजूद है। खबर में यह चेतावनी अवश्य है कि-‘‘अगर उसे उकसाया गया तो वह ‘पवित्र युद्ध’ छेड़ सकता है।’’ इस चेतावनी का असर दक्षिण कोरिया से ज्यादा अमेरिका में देखने को मिल रहा है। अमेरिका ने दक्षिण कोरिया के साथ मिलकर संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू कर दिए हैं। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली मयूंग बाक ने सेना प्रमुख को ‘हाई एलर्ट’ कर रखा है कि उत्तर कोरिया की अगली किसी भी कार्रवाई का जवाब उसके मिसाइल बेस पर हमले द्वारा किया जाएगा। इस बाबत उत्तर कोरिया की प्रतिक्रिया क्या है? इसका कहीं कोई जिक्र ख़बर में नहीं है।
इस सन्दर्भ में भारतीय प्रायद्धीप में ख़बरें जिस रूप में आ रही हैं उससे बहुत कुछ स्पष्ट नहीं है। इतना अवश्य पता चल रहा है कि पूर्वी एशिया में आग लगी है। पीले सागर से सटे उत्तर-दक्षिण कोरिया के सीमाई क्षेत्र योंग्पेयोंग में उठ रहा धुँआ गहरा हो रहा है जिसे 1953 ई0 के बाद के सबसे बड़े टकराहट के रूप में चिह्नित किया गया है। इस समूचे विवाद में सबसे अहम सवाल ख़बर की निष्पक्षता को लेकर है। प्रायः उत्तर कोरिया को कठघरे में खड़ा कर उसके ऊपर आरोप मढ़ देना आसान होता है। संवेदनशील सीमाई विवाद के मामले में इस तरह के एकतरफा दृष्टिकोण अपनाये जाने से बचना जरूरी है। भूलना नहीं चाहिए कि उत्तर कोरिया ने गोले दागकर हमला करने से पहले दक्षिण कोरिया से यह जानना चाहा था कि क्या योंग्पेयोंग में जारी दक्षिण कोरिया और अमेरिका का संयुक्त सैन्याभ्यास उसके देश पर किये जाने वाले हमले की तैयारी हैं? इस सम्बन्ध में बारीकी से विश्लेषण किए जाने की जरूरत है तथा जनमाध्यों द्वारा इन दोनों देश के बीच के इस हालिया विवाद के संदर्भ में काफी एहतियात बरतने की भी आवश्यकता है।
अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन उत्तर कोरिया को आगाह करते हुए अन्तरराष्ट्रीय समाज से बड़ी साफगोई से कहती दिख रही हैं कि ‘‘उत्तर कोरिया का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा की वह वर्तमान में क्या फैसला लेता है?’’ अपने वक्तव्यों में संप्रभु अमेरिका किसी राष्ट्र-विशेष के अंदरूनी मामले में ऐसे बयान जारी करने के लिए स्वतंत्र है। ईराक, ईरान और तालिबान की तरह उत्तर कोरिया भी अमेरिकी काली-सूची में शामिल हैं। अमेरिका की राजनीतिक-मंशा असल में क्या है और वह अपने चरित्र में कितना सच्चा और नेक है इसका ज्ञान दरअसल ऐसे ही मौके पर होता है। अमेरिका हमेशा किसी न किसी बहाने की ताक में रहता है। बता दें कि उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया
के बीच का विवाद उस समय फिर शुरू हुआ था जब कथित तौर पर उत्तर कोरिया पर यह आरोप मढ़ा गया कि उसने जानबूझकर दक्षिण कोरिया के चचान नामक सैन्य पोत को समुद्र में डूबो दिया है। 26 मार्च को घटित इस घटना मंे 46 लोगों की मौत हो गई थी। इस मामले में गठित अन्तरराष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने इस बात की पुष्टि की थी कि यह सैन्यपोत कथित तौर पर उत्तर कोरिया से दागे गए टोरपीडो की वजह से जलमग्न हो गया था। इस जाँच कमेटी में अमेरिका, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और स्वीडन के विशेषज्ञ शामिल थे।
हाल के बदलते घटनाक्रमों के बीच यह भी आशंका जतायी जा रही है कि उत्तर कोरिया में इन दिनों ऊपरी शीर्ष राजनीति में बदलाव होने के संकेत हैं। उत्तर कोरिया के शासक किंम जोंग इल ने राजनीतिक नेतृत्व का कमान अपने बेटे किंम जोंग उन को देने का मन बना लिया है। ऐसे बदलाव के क्षण में उत्तर कोरिया एक ओर विश्वमंच पर अपने ताकत का अहसास कराने के उद्देश्य से ऐसा कर रहा है तो दूसरी ओर वह दक्षिण कोरिया पर अपना दबाव ढीला होने देना नहीं चाहता है। फिलहाल पूर्वी एशिया में जारी यह हिंसक गतिरोध पूरे विश्व बिरादरी के लिए खतरनाक है। यह सीधे-सीधे अमेरिका के राजनीतिक कुटनीति में सफल हो जाने का सूचक है जिसके तहत वह अपार संभावनायुक्त एशिया में अपनी सैन्य-धाक को पुख्ता कर सकने में सफल सिद्ध होगा। इस पूरे घटनाक्रम के बीच चीन की चुप्पी के भी कई अर्थ लगाए जा रहे हैं जो परोक्ष रूप से उत्तर कोरिया के वामपंथी सरकार को अपना समर्थन देता है। यह समर्थन अमेरिका को चूभती है क्योंकि उसके दक्षिण कोरिया से रिश्ते काफी याराने हैं। वास्तव में यह लड़ाई चीन और अमेरिका के आपसी वर्चस्व की है। वहीं जापान उत्तर कोरिया की बढ़ती ताकत से सकते में है, वह अपने देश के मंत्रियों को किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहने को कह चुका है।
गौरतलब है कि अमेरिका के छोटे-बड़े देशों से दोस्ती कुछ अलग किस्म के होते हैं। वह हर देश के साथ नये समीकरण, नये अंदाज के साथ गढ़ता है। जिस देश की हैसियत जैसी होती है, उसके रिश्ते भी उतने ही महत्त्वपूर्ण और दिलचस्प होते हैं। भारत से दिखती उसकी दाँतकटी दोस्ती और पिछले दिनों हुई अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की शाही यात्रा भी कुछ इसी ढंग की थी। दरअसल, भारत के साथ अमेरिका की बढ़ती मित्रता का असली निहितार्थ इस आबादी-बहुल राष्ट्र में अपना पूँजी-तंत्र बहाल करना है। लिहाजा, वह कभी पाकिस्तान को घुड़की दिखाता है तो कभी उसे अन्तरराष्ट्रीय मंच से डपटता है। लेकिन मंच से उतरते ही दोनों देश उसे एकसमान दिखने लगते हैं।
वैसे भी अमेरिका के लिए दोनों देशों से तालमेल संतुलित रखना जरूरी भी है क्योंकि पाकिस्तान एक ऐसा ‘सॉफ्ट कार्नर’ है जिसके कंधे पर चढ़कर वह भारत के मानचित्र में अपनी गिद्धदृष्टि रख सकता है। लेकिन उत्तर कोरिया भारतीय महाद्वीप नहीं है। वहाँ अमेरिकी दाल नहीं गलती। छोटी मुँह बड़ी बात कहने का आदी उत्तरी कोरिया साम्राज्यवादी ताकतों को खरे शब्दों में दुत्कारता और चुनौती देता है। उसे राष्ट्र की आत्मसत्ता प्यारी है। उत्तर कोरिया के सोच-दृष्टि भी पारंपरिक है। वहाँ बाज़ारवादी प्रवृत्तियों की पैठ न के बराबर हैं। वह अमेरिका का पिछलग्गू बन विश्व बैंक और व्हाइट हाउस से ‘ग्रीन कार्ड’ हथियाने का अभिलासी नहीं है। इसीलिए वह अमेरिकी हित और साम्राज्य-प्रसार की कुटिल नीतियों को बॉयकाट करता है। हाल के दिनों में उत्तर कोरिया द्वारा शुरू आपसी सहमति बनाने की कवायद ठीक कहे जा सकते हैं। उत्तर कोरिया दक्षिण कोरिया से अपने समस्त विवाद निपटाने खातिर छह पक्षीय वार्ता करने का पक्षधर है जिसमें उत्तरी-दक्षिणी कोरिया के अतिरिक्त चीन, अमेरिका, जापान और रूस भी शामिल हों। लेकिन अभी विश्व बिरादरी इस संदर्भ में तत्काल कोई पहल करने को इच्छुक नहीं दिख रही जिससे वहाँ के हालात और तनावपूर्ण स्थिति शांत और स्थिर होने का नाम नहीं ले रहे हैं।
संकटपूर्ण इस घड़ी में अमेरिका के शीर्ष सैन्य अधिकारी एडमिरल मार्क मुलेन उत्तर कोरिया को भले कड़े शब्दों में चेता रहे हों पर वह किसी भय या दुश्चिंता की परवाह कर घुटने टेकने को अभ्यस्त नहीं है। मुलेन हाल ही में उत्तर कोरिया से यात्रा कर लौटे स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक सिगफ्राइड हैकर के उस रिपोर्ट का खुलासा कर रहे हैं जिसके मुताबिक उत्तर कोरिया इन दिनों तेजी से बम बनाने में इस्तेमाल होने वाले बेहद परिस्कृत संबर्दि्धत यूरेनियम का भारी मात्रा में उत्पादन करने में जुटा है। कहना न होगा कि कुछ वर्षों पहले अमेरिका ने इसी तरह के भ्रामक और अपुष्ट दावे को लक्षित कर ईराक पर हमला बोला था जहाँ उसके आतंक के चिह्न अभी भी मौजूद हैं। उत्तर कोरिया के विदेश मामले के विशेषज्ञ सांग दिए संुग ने अपने एक वक्तव्य में इस बात का खुलासा किया है कि यह कार्रवाई अमेरिका के उस अड़ियल रवैये पर दबाव बनाने का हिस्सा है जो हाल के दिनों में उत्तर कोरिया विरोधी रवैए के रूप में देखा जा सकता है। अपनी सफाई में सुंग ने इस बात का भी हवाला दिया है कि अन्तरराष्ट्रीय चिंता को देखते हुए युरेनियम संवर्द्धन का कार्यक्रम रोक दिया गया है। सच्चाई जो हो फिलहाल इस घड़ी तीसरी दुनिया के सभी राष्ट्र चुप्पी साधे हुए हैं। ऐसे में अब समय ही बताएगा कि आने वाले दिनों में अपने ऊँचे सिर के सहारे धौंस झाड़ता अमेरिकी ऊँट किस करवट बैठेगा?

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