सांस्कृतिक प्रतीक और अनुवाद



आधुनिक परिप्रेक्ष्य में उत्तर आधुनिकता ‘ब्रिकोलेज सिस्टम’ को आत्मसात कर रहा है जिसमें भिन्न-भिन्न संस्कृतियों को आपस में जोड़ा गया है। ‘पेस्टीच कल्चर’ का भारतीयकरण जनसमाज में ‘संस्कृति के अनुवाद’ अर्थात ‘ट्रांसलेसन टू कल्चर’ के माध्यम से हो रहा है। वर्तमान संदर्भों में अनुवाद की दृष्टि से सांस्कृतिक प्रतीकों का महत्त्व बढ़ा है। भारतीय टेलीविज़न-लोक में प्रयुक्त कार्टून चरित्रों के लिए पौराणिक सांस्कृतिक प्रतीकों को चुनना संस्कृति के अनुवाद का एक विशिष्ट उदाहरण है। विदेशों में ‘टॉम एण्ड जैरी’, ‘मिकी माउस’, ‘टेल्स पिन’, ‘डोनाल्ड डक’ आदि कार्टून चरित्रों को गढ़ा गया। बच्चों को विशेष प्रिय जंतु-चरित्रों में मानवीय-गुण और स्वाभाव डालकर और अधिक प्रभावी बनाने की चेष्टा हुई। इस नए ढांचे को ‘ही-मैन’, ‘बैट-मैन’ जैसे ‘सुपर हीरो’ की भांति पहचान मिली। पूंजी-तंत्र को सबल बनाने में इन चरित्र नायकों की भूमिका उल्लेखनीय रही जिसे बाद में भारतीय जनमाध्यम ने संस्कृति के अनुवाद द्वारा अपने कार्टून-चरित्रों में अपना लिया।

विदेशी कार्टून चरित्रों की तर्ज पर भारतीय संस्कृति में लोकआस्था से जुड़े वैसे सांस्कृतिक प्रतीकों को खोजा गया जो बाल मनोरंजन के लिए सटीक नायक तो हो ही साथ ही संवेदनशील और अबोध बालमन को अपनी बहाव में बहा ले जाने में भी सक्षम हांे। ऐसे अनूठे नायक हनुमान और गणेश के रूप में मिले। ये प्रतीक ऐसे ‘इम्पटी सिम्बल’ की भूमिका में प्रस्तुत किए गए जो बच्चों के भीतर मनोरंजन, कौतुहल, उत्तेजना और चिपकू प्रवृति को बढ़ा सकें। उत्तर आधुनिक वातावरण में विकसित हुए इस संस्कृति के अनुवाद की प्रकृति ने पूंजी-तंत्र के ‘ग्लोबल टेम्परामेंट’ के अनुसार भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों को अंततः अपने मीडियावी लोक में खींच लिया। अपनी बनावट-रचना में भंगुर अर्थात ‘ब्रिकोलेज’ हनुमान और गणेश जैसे ‘सुपर हीरो’ चरित्रों को जनमान्यता तुरंत मिल गई क्योंकि ये सांस्कृतिक प्रतीक भारतीय संस्कृति में सकारात्मक छवि के रूप में चित्रित हैं। ये अप्रासंगिक इसलिए भी नहीं हो सकते थे क्योंकि वैश्विक मीडिया ने इन्हें ‘टॉम एण्ड जैरी’, ‘मिकी माउस’ आदि लोकप्रिय चरित्रों के बरअक्स खड़ा किया था।
नतीजतन, आज मनुष्य की ‘ग्लोबल’ अवधारणा संस्कृति के अनुवाद के माध्यम से पूरे विश्व में फैल रही है तथा पूंजी-केन्द्रित नव-साम्राज्यवाद द्वारा भारतीय जनमाध्यमों में प्रकट भी हो रही है। वस्तुतः पूंजी-तंत्र बड़ी चालाकी से विदशी कार्टून चरित्रों को भारतीय पौराणिकता के खांचे में रखकर उन्हें लोकप्रिय बना रहा है। हमें बदलाव के इस पहलू को भी देखना होगा कि हमारे मूल्यबोध, आदर्श और आस्था के प्रतिमान माने जाने वाले सांस्कृतिक प्रतीक बड़ी आसानी से मनोरंजक तत्त्वों में बदल दिए जा रहे हैं। लिहाजा, उत्तर आधुनिक भारतीय समाज इस पूंजी-आधारित दबाव को सायास/अनायास न केवल आत्मसात करने को तैयार है अपितु सांस्कृतिक प्रतीकों के अनुवाद को अनिवार्य भी मान चुका है।
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