जनता का आदेश बना बिहार जनादेश

बिहार की जनता तथाकथित ‘बीमारू प्रदेश’ में रह भले रही हो लेकिन वह बीमार नहीं है। वह अपना आग-पाछ सब जानती है। बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम से अभिभूत नीतीश सरकार को इस जीत की व्याख्या इसी रूप में करनी चाहिए। अपने राजनीतिक साहस और वैकल्पिक सोच की बदौलत मजबूत जनादेश पाये नीतीश कुमार के लिए आगे की राह कंटिकापूर्ण है। यह एक चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी है जिसकी उलटी गिनती बैण्ड-बाजे, पटाखे और आतिशबाजी का दौर थमते ही शुरू हो जाएगी। आँकड़े बताते हैं कि जद(यू)-भाजपा गठबंधन को कुल 243 सीटों में से 206 सीट हासिल हुए हैं; वहीं कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी को केवल 4 सीट नसीब हुए हैं। यह परिणाम इस मायने में भी महत्त्वपूर्ण है कि पिछली दफा नवंबर 2005 में मुख्यमंत्री पद पर आसीन नीतीश कुमार को सिर्फ 143 सीटें ही मिली थीं जिसमें इस बार बढ़ोतरी हुई है। गठबंधन में शामिल भाजपा को पिछले चुनाव की तुलना में जहाँ 36 सीटें अधिक मिली हैं वहीं जद(यू) ने 27 सीटे और हथिया ली है। इस तरह भाजपा 91 विधानसभा सीटों के साथ फायदे में है तो जद(यू) का पलड़ा 115 सीट प्राप्त कर फिलहाल बेहद मजबूत स्थिति में है।
विधानसभा सीटों के ये बदले आँकड़े अप्रत्याशित नमूने भर नहीं हैं। असल में, ये बनते-बदलते बिहार के विकास और सुशासन की एक ऐसी तस्वीर है जो प्रदेश के राजनीतिक पृष्ठिभूमि और चुनावी रणनीति को खोलकर रख देता है। यह बिहार में उभरता हुआ एक नए ढंग का जातिगत समीकरण है जिसमें जाति को छोड़कर जातिगत तमाम प्रवृत्तियाँ अंतर्निहित हैं। नीतीश-नरेन्द्र मोदी विवाद से हुए लाभ का योग तो इसमें है ही, साथ ही यह हिन्दुत्व के खिलाफ और हिन्दुत्व के साथ का भी एक ऐसा मामला है जिसमें दो पाटियाँ एक साथ खड़ी होकर भी साथ-साथ नहीं थीं। इन दोनों के बीच इतना महीन अंतर है कि अब भाजपा के हिन्दुत्व का मतलब भी विकास कहा जाने लगा है। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी इसे विकासपरक हिन्दुत्व कहते नहीं अघा रहे हैं। हालिया चुनावी परिणाम बिहार में प्रचारित अति पिछड़ी जाति और महादलित अभियान के विकासपरक मुद्दे में बदल दिए जाने का भी नतीजा है। अल्पसंख्यक वर्ग को बड़ी होशियारी से अपने बहाव में शामिल कर ले जाने का प्रतिफल है। यह मीडिया द्वारा फैलाया गया एक ऐसा मजेदार स्टंट है जिसकी ऊँची नाक पकड़कर नीतीश सरकार ने जनता के सामने यह कह सकने का साहस जुटाया था कि क्या उनके द्वारा कराए गए विकास-कार्य का कोई मोल नहीं है? इस बहुप्रचारित विकास के खोल में ढांक-तोप कर जिन चीजों को रखा गया था अगर नीतीश सरकार उसे हर हाल में ख़त्म नहीं करती तो यह जिन्न नीतीश सरकार और बिहार दोनों के सेहत के लिए नुकसानदेह सिद्ध हो सकता है।
बहरहाल, ऐतिहासिक जनादेश पाए नीतीश कुमार का यह कहना बेहद अर्थपूर्ण है कि-‘जनता ने उन्हें जनादेश देकर एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है’। इस एकपक्षीय जीत के पार्टीगत निहितार्थ चाहे जो भी निकाले जाए लेकिन जनता की निगाह में नीतीश कुमार का कद निश्चित ही बढ़ा है। उधर रामभरोसे संपूर्ण जीत की दावा करती बड़ी पार्टियाँ जिनमें कांग्रेस, बसपा, राजद और लोजपा आदि शामिल हैं; को जनता ने फिलहाल ‘डायवर्जन रूट’ से बिहार विधानसभा पैठा दिया है। केन्द्र की कांग्रेस सरकार बिहार में करिश्मा करने से पूरी तरह चूक गई है। दूसरी ओर बिहार में वापसी का राजनीतिक-कौतुक रचते राजद-लोजपा गठबंधन की जो भद्द पिटी है, उससे राजनीतिक चुनाव विश्लेषकों को सीख लेना जरूरी है। बसपा ने कुल 243 विधानसभा सीटों में से 239 पर अपने उम्मीदवार खड़े कर बहादुरी दिखाने का स्वांग रचा था, किंतु चुनाव परिणाम ने उसे जिस तरह निराश किया है उसके मद्देनज़र उत्तर प्रदेश की राजनीति पर इस करारी हार का गहरा असर पड़ने वाला है। अन्य दलों में वामदल काफी सकते में हैं, उसकी चिंताजनक स्थिति को देखते हुए बिहार में उसके भविष्य के बारे में भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी। जैसा कि चुनाव पूर्व कयास लगाए जा रहे थे जद(यू)-भाजपा गठबंधन इस बार भी बिहार में एक बड़ी पार्टी के रूप में उभर सकती है, लेकिन चुनावी-दौड़ में शामिल अन्य पार्टियाँ इस कदर ‘फ्रिज’ हो जाएंगी इसका अनुमान कम ही लोगों को था। बिहार में पुश्तैनी राजनीति का दंभ भरने वाले लालू यादव की पत्नी राबड़ी देवी की दोतरफा हार ने राजद अध्यक्ष को गहरा आघात पहुँचाया है। सोनपुर और राघोपुर विधानसभा सीटों से एक साथ खड़ी राबड़ी देवी को वहाँ की जनता ने पूरी तरह खारिज कर दिया है। कुछ ऐसी ही गत रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा की है। महत्त्वाकांक्षी पासवान के दोनों भाई रामचंद्र पासवान और पशुपति कुमार पारस तो हारे ही उनके दोनों दामादों का भी कोई पूछनहार नहीं मिला। सबसे दिलचस्प बात तो यह रही कि चुनाव के दरम्यान भारी भीड़ देख सीना चौड़ा किए सभी पार्टी के राजनीतिज्ञों को जनता ने बड़े ही धैर्य से सुना, तालियाँ बजायी और जनसमर्थन दिए जाने का वादा भी किया, लेकिन फैसले की घड़ी में जनता ने चुनाव में खड़े उम्मीदवारों की बत्ती गुल कर दी।
बिहार चुनाव-प्रचार के दौरान एक मौके पर कांग्रेस के मीडिया युवराज राहुल गाँधी ने पूरे रूआब के साथ कहा था कि पिछली सरकार ने बिहार में विकास के नाम पर लोगों को ठगा है, झाँसे में रख उनके आँख में धूल झोंका है। होनहार राहुल गाँधी के इस कहे का समझदार जनता पर असर पड़ा होगा, यह परिणाम देखकर नहीं लगता है। बता दें कि इस बार कांग्रेस ने अकेले दम पर 243 उम्मीदवारों को खड़े करने का ज़ज़्बा जुटाया था। राहुल गाँधी खुद ‘स्टार प्रचारक’ की भूमिका में 119 चुनावी दौरे में शामिल हुए थे। बाँस-खंबे और बल्ले से छेंके मैदान में भारी भीड़ जमा देखकर राहुल गाँधी को अच्छे परिणाम आने की उम्मीद थी। चुनाव-प्रचार के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उपस्थिति ने इस आस को बढ़ाने में और भी मदद की।
यदि मान भी लें कि कांग्रेस की सोच में पूर्ण सत्ता या बहुमत हासिल होने जैसी कोई बात नहीं थी तो भी इतना तय है कि उसे अपनी पार्टी के इस कदर हार का अंदाजा नहीं ही रहा होगा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चौधरी महबूब अली कैसर की हार से कांग्रेस के मीडिया-प्रभारी तक आतंकित हैं। हैरत की बात है कि इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अपनी पुरानी जनाधार से भी हाथ धो चुकी है। इस चुनाव में मात्र चौका जड़ ऑल-आउट हो गए कांग्रेसी राजनीतिज्ञों को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी किस भाव से हौसला देंगी, यह देखा जाना अभी शेष है। फौरी तौर पर जमीनी स्तर पर कार्यशील कांग्रेसियों ने पारंपरिक दस्तूर निभाते हुए हार की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर थोप ली है। लेकिन चुनाव विश्लेषकों और बुद्धिजीवियों को यह पता है कि बिहार विधानसभा चुनाव में सारे कांग्रेसी दिग्गज और होनहार हार चुके हैं जबकि समझदार जनता जीत चुकी है। बिहार कांग्रेस चुनाव प्रभारी मुकुल वासनिक ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए जो कहा वह गौरतलब है-‘‘मैं नहीं समझता कि बिहार में राहुल गाँधी का करिश्मा नहीं चला. राहुल के सभी चुनावी सभाओं में काफी भीड़ उमड़ती रही. वे जनसभाओं में बेहद अच्छा बोले और निश्चित रूप से कार्यकर्ताओं में उन्होंने जोश भरा. लेकिन जहाँ तक चुनावी परिणाम का सवाल है, ये अलग मुद्दा हैं. इनका विश्लेषण अलग से किया जाएगा.’’
जो भी हो फिलहाल कांग्रेस को आत्ममंथन एवं मूल्यांकन की सख्त जरूरत है। उसे अभी से सोचना शुरू कर देना चाहिए कि आखिरकार उसके सामने ऐसी नौबत ही क्यों उत्पन्न हुई कि कांग्रेस आलाकमान सोनिया गाँधी बिहार में शून्य से शुरुआत करने की सोच रही हैं। पिछले 50 वर्षों में जिस राज्य में अकेले कांग्रेस के 17 मुख्यमंत्री सत्ता-सुख भोग चुके हों वहाँ एकबारगी इस कदर सूपड़ा साफ होना चकित करता है। ध्यान देने योग्य है कि यह चुनाव परिणाम कांग्रेस के उस चर्चित विज्ञापन की भी पोल खोलता है जिसमें इस पंक्ति को विशेष महत्त्व के साथ गढ़ा गया था-‘अब देश की रफ़्तार से जुड़ेगा बिहार’। बिहार की जनता को बुद्धू बक्से के सामने बैठकर इस विज्ञापन का आस्वाद लेते जरूर देखा गया होगा। पर उसने चुना उन्हीं को जिन्हें वह पहले से ठान चुकी थी। इस बाबत जद(यू) के प्रदेश अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी द्वारा कहे गए उस सवाल को दोहराना उचित होगा कि ‘कांग्रेस आखिर देश के किस रफ़्तार से जुड़ने की बात कर रही है? क्या उस रफ़्तार से जिसके अनुसार देश की विकास दर बिहार के विकास दर से 2 फीसदी कम ही है?’।
एक और बात जिस ओर इशारा किया जाना महत्त्वपूर्ण है वह यह कि बिहार विधानसभा चुनाव में प्रत्यक्षतः दिख रहा एकतरफा जीत सिर्फ नीतीश सरकार की जीत नहीं है। जद(यू)-भाजपा गठबंधन तो महज विजेता भर है। असली जीत का हकदार तो बिहार की वो महिलाएँ हैं जिन्होंने पुरुषोचित्त विवेक की जगह आत्मविवेक से काम लिया और वोट उन्हीं उम्मीदवारों को सुपुर्द किया जिनसे उनकी दृष्टि मेल खाती थी। इसमें दो राय नहीं है कि उन्होंने अपना बेशकीमती मत उसी पार्टी को देना वाज़िब समझा जो वास्तविक काम को प्राथमिकता देता हो। गरीबी, बीमारी और तकलीफदेह जिंदगी से छुटकारा दिलाने में समर्थं हो। दलदल भरे पगडंडियों को कामयाब सड़क में बदल देने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हो। ऐसी साफ-सुथरी पार्टी हो कि गाँव-देहात तक की बिटिया निर्भय शिक्षा पाने शहर की राह पकड़ सके। ऐसी पार्टी सिर्फ नरेगा-मनरेगा में खर्च हो रहे करोड़ों-करोड़ की रकम का मात्र हवाला भर न द,े बल्कि उसे सही आदमी तक पहुँचने के लिए भी वचनबद्ध हो।
इस तरह बिहार की सजग और जागरूक महिलाओं ने पिछले पाँच सालों के दरम्यान जिस सच को पूरी शिद्दत से महसूस किया था, उसी के आधार पर नीतीश शासन के जीत की पटकथा लिख दी। इस बार महिलाएँ चुनाव को लेकर कितनी उत्साहित थीं? इसका अंदाजा बेलाग बोलते इन आँकड़ों से लगाया जा सकता है कि महिलाओं ने कुल 60 फीसदी वोट दिए जो पुरुष वोट की तुलना में करीब छह फीसदी अधिक था। एक और बात बता दें कि पिछले विधानसभा चुनाव में जहाँ कुल 46 फीसदी मतदान हुए थे वहीं इस मर्तबा कुल 51 फीसदी मतदान हुए हैं। नीतीश की इस शानदार जीत में चुनाव आयोग की भूमिका भी जबर्दस्त रही। छह चरणों में संपन्न इस चुनाव के बीच में लंबे अंतराल का होना एक बड़ा ‘फैक्टर’ साबित हुआ जिससे नीतीश कुमार अपने प्रचार को संक्षिप्त करने की बजाय अधिक से अधिक विधानसभा क्षेत्रों का दौरा संभव कर सके।
अंत में, इस चुनाव परिणाम का थोड़ा मीडिया की दृष्टि से विश्लेषण करें तो इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में ‘हेडलेस जर्नलिज्म’ करने वालों की चाँदी रही जिस कारण अटकलबाजियों का घटाघोप हावी दिखा। प्रतिष्ठित अख़बारों ने भी ख़बरों के स्तर पर एहतियात बरतने से परहेज की। हालाँकि उनकी उन पार्टीगत मीडिया-मैनेजरों से खूब छनी जो बिहार में होनहारों की छवि आरोपित कर करिश्मा करने को इच्छुक थे। लेकिन बिहार की समझदार जनता ने अंततः उनकी ही बैण्ड बजा दी। उनका ज्योतिष-शास्त्र फेल हो गया। इसमें दो मत नहीं है कि जब जनता फैसला करती है तो वह अपनी प्रकृति और प्रभाव में कुछ ज्यादा ही नृशंस और क्रूर होती है। इस बात को धनबलि, बाहुबलि और अपराधिक छवि वाले नेताओं के न जीत पाने के संदर्भ में अच्छी तरह समझा जा सकता है। यह जनादेश जनता का अर्थंपूर्ण आदेश है जिससे पराजीतों को ही नहीं नीतीश कुमार को भी सबक लेनी होगी। इस चुनाव में नीतीश खेमें के हारे मंत्रियों का जो हश्र जनता ने किया है, उसका ग्राफ और न बढ़ पाए यह तय करना नीतीश सरकार की नैतिक-जिम्मेदारी है। निःसंदेह आज बिहार एक बार फिर बदलाव की भूमि पर आसीन है। उम्मीदों का दीप प्रज्ज्वलित हो उठा है। जनता में आस की लहर है। नीतीश शासन के ऐिसे में वरिष्ठ चुनाव विश्लेषक योगेन्द्र यादव द्वारा कहा एक वाक्य स्मरण हो रहा है जिसे उन्होने पूरे चुनाव-काल के समय बिहार का दौरा करते हुए बीबीसी हिन्दी को उपलब्ध कराया था-‘विकास बहुत बड़ी शब्द है। बिहार में अंतिम व्यक्ति तक विकास भले न पहुँची हो, आस जरूर पहुँची है। ये क्या कम है?’’
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