स्त्री.वेदना का कारुणिक चित्रण


काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग द्वारा प्रस्तुत ‘माध्वी’ नाटक का मंचन स्वतंत्रता भवन में किया गया। अंग्रेजी विभाग के शोध-छात्र पिनाक शंकर भट्टाचार्य के निर्देशन में मंचित इस नाटक की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगायी जा सकती है कि मंत्रमुग्ध दर्शकों ने नाटक के दौरान खूब तालियां बजायी। माध्वी की मुख्य भूमिका निभा रही स्वाति अपने उत्कृष्ट अभिनय से दर्शकों का मन मोह लेने में सफल रही, वहीं मुनिकुमार गालव का अभिनय कर रहे सायन ने अपने चरित्र को जीवंत बना नाटक में प्राण फूँक दिया। राजा ययाति की भूमिका में मनीष एवं ऋषि विश्वामित्र की भूमिका में उमेश को दर्शकों ने तालियों से खूब सराहा। सूत्रधार के रूप में अभिनय कर रहे तुषनिम और अनिंदिता ने नाटक के सभी चरित्रों एवं पात्रों से दर्शकों को शुरू से अंत तक जोड़े रखा। अन्य सहयोगी कलाकारों में अमर, ऋतपथिक, आनंद, मिथुन, दिव्येन्दु, अभय और सुमित्र की भूमिका जबर्दस्त रही जिनकी छोटी से छोटी भूमिका को देख दर्शक रोमांचित और भावविभोर थे। संगीत के सुंदर संगत से वातावरण को मोहक बनाने का काम विदिशा और अर्पिता ने किया। नाट्य-मंचन के दौरान अभिनय-परिवेश को प्रभावी बनाने में अभिषक देव के प्रकाश-सज्जा का योगदान महत्वपूर्ण था जिससे पात्रों द्वारा अभिनित सूक्ष्म भावों और उनके भीतरी अंतर्द्वंद्व को समझने में मदद मिली।
मशहूर कथाकार भीष्म साहनी द्वारा लिखित नाटक ‘माध्वी’ का अंग्रेजी में अनुवाद प्रो0 आलोक भल्ला ने 2002 में किया जिसके अब तक अनगिनत नाट्य मंचन हो चुके हैं।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में ‘माध्वी’ का नाट्य-मंचन काशी के सांस्कृतिक गौरव की पहचान है। ‘माध्वी’ महाभारत के उद्योग पर्व से ली गई एक संवेदनशील कथा है जिसमें कथा नायिका माध्वी एक पितृसतात्मक समाज में विडंबनापूर्ण जीवन जीने को अभिशप्त है। पुरुषार्थ दंभ के प्रबल आवेग में माध्वी के खुद का कोई अस्तित्व नहीं। माध्वी अपने महत्वाकांक्षी पिता राजा ययाति द्वारा मुनिकुमार गालव को भेंट कर दी जाती है क्योंकि वह मुनिकुमार गालव के 800 अश्वमेधी घोड़ों की याचना को पूरा नहीं कर पाता है। दूसरी ओर मुनिकुमार गालव ऋषि विश्वामित्र को गुरुदक्षिणा के रूप में 800 अश्वमेधी घोड़ों को देने के लिए वचनबद्ध है। माध्वी को पा कर मुनिकुमार गालव यह सोचता है कि अब उसके पास एकमात्र माध्वी ही वह साधन है जिसके द्वारा वह अपने गुरु के वचन को पूर्ण कर सकता है। अतिसुंदर रूपवती माध्वी को नव-यौवन प्राप्ति का आशिर्वाद मिला है साथ ही यह भी कि माध्वी के गर्भ से उत्पन्न बालक भविष्य में एक प्रतापी सम्राट होगा। मुनिकुमार गालव माध्वी को लेकर आर्यावत के उन सम्राटों के पास जाता है जो माध्वी के बदले उसे 800 अश्वमेधी घोड़े प्रदान कर सके। कई राजाओं को पति रूप मे स्वीकारने को विवश माध्वी हर जगह मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना को झेलती है। उसे अपने ममत्व और वात्सल्य का भी त्याग करना पड़ता है। सबसे कारुणिक स्थिति तब उत्पन्न होती है जब बेबस माध्वी भावहीन मुद्रा में ऋषि विश्वामित्र तक को वरण कर लेती है क्योंकि मुनिकुमार गालव माध्वी को कई राजाओं को सौंपकर भी 800 अश्वमेधी घोड़ों को नहीं जुटा पाता है। यह पूरी कहानी माध्वी के इर्द-गिर्द घूमती हुई इस सच को उजागर करती है कि हर पुरुष स्त्री देह को अपनी इच्छापूर्ति का साधन-मात्र समझता है। उसे स्त्री मन, बुद्धि, आत्मा और चेतना का ख्याल नहीं होता है। वह सौंदर्य का उपासक तो है किंतु वह स्त्री के ऊपर स्वछंद शासन की भी अदम्य इच्छा रखता है।
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