अब 11 बजे के बाद दिखेगा इंसाफ


एक किशोर अपने उम्र का अतिक्रमण करते हुए दोस्तों से कह रहा था, ‘‘यार जब ‘यस’ और ‘नो’ में हाँ वाला विकल्प चुनते ही मैं मजे से पोर्नोग्राफी देख लेता हँू तो फिर यह पूछने का क्या मतलब कि क्या आपकी उम्र 18 वर्ष से कम है।’ यह पूछना क्योंकर जरूरी है इसके जवाब से हम सभी वाकिफ हैं। देखिए, सेक्स करने की इच्छा और साजो-सामान लगभग सभी जीवित प्राणियों को कुदरती तौर पर मिले हैं। लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक बाध्यताएँ/मान्यताएँ रद्दोबदल की तमाम गुंजाइशों को देखते हुए भी खुल्लमखुल्ला देह-सम्बन्ध बनाने की इजाजत नहीं देती। संचार मंत्रालय तो उसी समाज का कृत-दास है। इसीलिए उसने हाल में अश्लिलता के आरोप में चर्चित दो कार्यक्रमों ‘राखी का इंसाफ’ और ‘बीग बॉस’ को रात्रि 11 बजे के बाद ही दिखाए जाने की ताकीद की है। इस फैसले से ऐसे कार्यक्रमों को बेधड़क दिखलाने की जो पूँजीवादी प्रवृति आजकल विकसित हुई है, को अंकुश लगेगा। सो इस फैसले पर ज्यादा चिल्लपों या हो-हल्ला मचाना समीचीन नहीं कहा जा सकता है।
देखिए, हम सोच में कितने भी उत्तर आधुनिक क्यों न हों? अपने बेटे या बेटी के सामने क्या किसी अजनबी व्यक्ति के सामने भी खुद की ही बीवी से देह-सम्बन्ध नहीं बना सकते हैं। यानी मर्यादा आदमी को हद में रहना ही नहीं सिखलाती बल्कि अपने भीतर छिपी अमानुषिक प्रवृति का निदान भी करती है। हमारे बच्चे कब क्या देखेंगे यह सरकारी मंत्रालय तय करेगा कि हम खुद, यह विवकेधर्मी कसौटी हम सभी के भीतर होने चाहिए। बिप करते शब्द लोकमानस में अनंत काल तक स्थायी बने रहेंगे तब भी उन्हें बेरोकटोक प्रसारित करना सही नहीं है। ऐसे कार्यक्रम आदमी का सच और अंदर की असलियत सामने लाने का सामर्थ्य रखती है। ये कार्यक्रम ही व्यक्ति-व्यक्ति के व्यक्तित्व को अलागते हैं। यह साबित करते हैं कि किन कारणों से राखी सावंत या बीग बॉस वाले ठेके के किराएदार ऐश्वर्या या काजोल नहीं बन सकते। गांधी, नेहरू, दिलीप कुमार, लता मंगेशकर, अमिताभ बच्चन, शबाना आजमी और सचिन तेन्दुलकर बनना तो मृगमरीचका ही ठहरा। सो इस मुद्दे पर बहसबाजी करते लोगों को सोचना चाहिए कि किसी चोर के बारात में शामिल सारे लोग चोर हों जरूरी नहीं। अतः इस फैसले को अतिरेक में ले जाकर विश्लेषित करना वाजिब नहीं कहा जा सकता। मैं तो उस व्यक्ति का हमेशा समर्थन करूंगा जो खुद हत्या और हिंसा में लिप्त है किंतु अपने बच्चों को यह आदर्श शिक्षा देता है कि ‘हिंसा और अपराध करना पाप है।’ ऐसा इसलिए कि वह कम से कम अपने आगे की पीढ़ी में अपने अमानवीय ‘रक्तबीज’ का अंकुर तो नहीं बो रहा न! सो इस फैसले को ‘पोर्नोग्राफी कल्चर’ का मंगलाचरण मानना कम से कम मेरी अल्प-समझ से तो मुनासिब नहीं है।
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