हिंसा की डफली, हिंसक राग -१-


यह राजनीतिक हिंसा का भुतहा दौर है। डर, भय, खौफ, चीख और चीत्कार से सना एक ऐसा कालचक्र, जिसके कपाल पर यूपी का नाम ‘लार्ज टाइपफेस’ में गुदा है। दिनेदहाड़े प्रदेश के पूर्व विधायक कपिलदेव यादव की हत्या होती है। लोग उस तारीख को काले घेरे में चिह्नित करते हैं-4 जुलाई। चंद दिन भी नहीं बीतता कि उत्तर प्रदेश के काबीना मंत्री नदं गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ पर इलाहाबाद में उस समय जानलेवा हमला बोल दिया जाता है, जब वह मंदिर पूजा-अर्चना खातिर निकल रहे होते हैं। 12 जुलाई को हुए इस बम विस्फोट में बाल-बाल बचे मंत्री जी का निजी सुरक्षाकर्मी राकेश मालवीय मारा जाता है और कई सार्गिद घायल हो जाते हैं।
यूपी की पुलिस महकमा जैसे सोए से जगा हो। वह इस घटना का तार काबीना मंत्री से खार खाये चाका ब्लॉक प्रमुख दिलीप मिश्रा से जोड़ती है। साथ ही शक की सुई सपा विधायक विजय मिश्रा पर भी घूमती है, जो दिलीप मिश्रा का करीबी रिश्तेदार है। इस मामले में गिरफ्तार राजेश यादव और कृपाशंकर ने जो बात कबूली, उससे यह साफ हो गया कि इस घटना का मास्टरमाइंड दिलीप मिश्रा ही है, जिसका सपा और भाजपा दोनों से निकट संबंध है। राजनीतिक रंजिश का यह खूनी खेल विस्फोट के दौरान गंभीर रूप से जख़्मी हुए इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार विजय प्रताप सिंह के लिए प्राणघातक साबित हुआ। करीब एक सप्ताह तक जिंदगी और मौत के बीच जूझने के पश्चात दिल्ली के आर्मी अस्पताल में उनकी मौत हो गई।
उत्तर प्रदेश में हिंसा और हत्या की आपराधिक पृष्ठभूमि सनातनी है। गुंडागर्दी, माफियाराज, गैंगवार और एनकाउण्टर बहुचर्चित शब्द हैं, जो ख़बरों में धड़ल्ले से प्रयोग होता है। हां, यह जरूर है कि नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ को जिस तरह रिमोट बम से उड़ाने की साजिश हुई और विस्फोटक के रूप में पोटेशियम क्लोरेट और सोडियम नाइट्रेट के मिश्रण का उपयोग हुआ। ऐसा यूपी में पहले कभी नहीं हुआ था। यह आज से बीसेक वर्ष पूर्व घटित उस घटना की याद ताजी हो गयी, जब सूबे में पहली बार एके-47 का इस्तेमाल झंूसी के विधायक जवाहर पंडित को मौत के घाट उतारने के लिए किया गया था। एक बात तो तय है, तकनीक न केवल जिंदगी आसान बनाने का ज़हीन तरीका है अपितु मौत के लिए भी उतनी ही मुफीद है। प्रदेश सरकार के काबीना मंत्री पर हुए हमले के बाद आंखों में प्रकाश झा की फिल्म ‘राजनीति’ का वह दृश्य नुमाया हो जाता है, जिसमें रिमोट बम द्वारा विस्फोट कर ‘मुख्यमंत्री कुनबा’ को गुपचुप मारने का ‘क्लू’ है। रौंगटे खड़े करते उस दृश्य की बानगी इलाहाबाद में दिखेगी, यह कम से कम अकल्पनीय था।
उत्तर प्रदेश आज जिस हिंसा के लपेटे में है, वह नई इबारत नहीं। यूपी में सत्ता-प्रायोजित अपराध, जुर्म और हिंसा सदाबहार टोटके हैं। यहां की प्रांतीय राजनीति इसी से खाद-पानी पाती है, फलती-फूलती है। माफिया, गिरोह और जरायम की दुनिया राजनतिक आशियाने हैं, जहां से हर नेता, मंत्री या जन-प्रतिनिधि का कद-काठी मापा जाता है। ‘चढ़ गुंडन की छाती पर, मुहर लगाओ हाथी पर’ जैसा सुघड़ नारा बतौर झांसा जुबान चढ़ता है। हकीकत में यह ललकार उन गुर्गों को हैं, जो चंद रुपयों की खातिर किसी की भी हत्या की सुपारी लेता है। हिंसा को ‘इंटरटेनमेंट गेम’ की तरह खेलता है, जिसमें एक ओर राजनीतिक कद्दावर होता है, तो दूसरी ओर सियासी संरक्षण पाये आपराधिक छवि के लोग।
बहरहाल, यूपी में बदस्तूर जारी हिंसा से आमजन के दिन बहुरेंगे, गारंटी नहीं। सुशासन तंत्र स्थापित होगा, अता-पता नहीं। यह भी तय नहीं कि सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस में से कौन-सी पार्टी वास्तव में भय, हिंसा और अपराधमुक्त समाज की रचना कर सकने में सक्षम है। सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। ‘मिशन 2012’ का राग अलाप ‘संदेश यात्रा’ निकालने वाली पार्टी कांग्रेस भी चुप है। इन दिनों वह खुद अंदरूनी कलह, मारपीट और प्रतिस्पर्धी हिंसा का सामना कर रही हैं। सपा का इतिहास तो ‘अकथ पुराण’ है। मुलायम सिंह के तीन खासमखास माने जाने वाले मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद और रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया की एक समय तीन जिलों क्रमशः गाजीपुर, इलाहाबाद और प्रतापगढ़ में तूती बोलती थी। आंकड़ो की भाषा में इतिहास बांचे, तो वर्ष 1991 से ले कर 2007 तक एक सांसद, 18 विधायक एवं 38 राजनीतिज्ञों की हत्या हो चुकी है। इसके अतिरिक्त एक पूर्व सांसद, एक पूर्व विधायक और 14 अन्य राजनीतिज्ञों के कत्लेआम भी कागजी रिपोर्ट में दर्ज है।
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