दिमाग से पैदल नहीं युवा



पिछले दिनों शोध-छात्रो को बीएचयू प्रशासन ने जो नये नियम-कानून बताये। उसकी अनुशंसा पर कुछ छात्रो को दूसरे छात्रावास में ‘शिफ्ट’ होना पड़ा। उसमें एक मैं भी शामिल था। पता नहीं क्यों? मुझे बिरला छात्रावास परिसर से जाते हुए घर-निकाला का आभास हुआ। मन में अजीब किस्म की टीस और तकलीफ महसूस हुई। यह जड़ से कटने की तरह का दर्द भले न हो, लेकिन झंुड से बिछुड़ने का ग़म जरूर था। जबकि बिरला से मैं एम.ए. में जा कर जुड़ा, बी.ए. में तो था ही नहीं। एम.ए. में मोह का व्योम इस कदर विस्तार न पाया था। पीएचडी में आकार लेना शुरू ही किया कि ‘ठौर बनाओ कहीं और’ का फरमान आ गया। कहने को साथी कहेंगे कि आप स्वेच्छा से गए। भाई! स्वेच्छा से हवन-कुंड में घी डाला जा सकता है, हाथ तो नहीं जलाया जा सकता है न!
खैर, दमदार विरासत का हकदार बिरला छात्रावास न तो मेरे कद-कादी से बढ़ सका था और न ही जाने से घटेगा। किंतु मुझे सालेगा कई दिनों तक इसका मेरे साथ रहना, उठना, बैठना, खाना-पीना और सोना। मेरे वो तमाम साथी, जिनके युवा दिखने पर मैं गर्व करता आया हंू। जिनकी वैचारिक समझ पर मार्क्स की भाषा में ‘डाउट ऑन एवरीथिंग’ सिद्धांत का अनुसरण करता रहा हंू और जिन लोगों की शांत-चित्त-प्रवृत्ति के पदचाप से यह सीख लेता रहा हंू कि-‘आज के युवा दिमाग से इतने पैदल नहीं कि गांधी माफिक जिंदगी जिएं और ऊपर से गाली भी खाएं।’
‘युवा’ की बात निकली, तो कह डालूं कि अक्सर राजनीतिक बयानों में जिन आंकड़ों का जिक्र होता है, वह है-‘भारत की 55 फीसदी आबादी युवा है।’ युवा अर्थात एक ऐसा वर्ग, जो मेहनती, ऊर्जावान, दिलेर, जांबाज, स्वाभिमानी, राष्ट्रभक्त और देशप्रेमी हो। जिसकी चेतना जीवित हो। जिसके रक्त में स्फुर्ति और ताजगी हो। जिसके होने के मायने अलहदा, तो विचार जुदा हो। जो अंतर्मन की आंख से भविष्य में ताक-झांक करने में निपुण हो। यानी युवा एक ऐसा शब्द है, जो सर्वगुणसंपन्न भले ना हो किंतु नूतन-नवीन गढ़ सकने में प्रवीण अवश्य हो। यथार्थ जो भी हो। युवा होने का अर्थ कमोबेश यही समझा जाता है।
फिलहाल मीडियावी लोक में जिन युवाओं की बात की जाती है। उनकी तादाद भारतीय विश्वविद्यालयों में बहुतायत है। आई. टी., मेडिकल, सायंस, कला और सामाजिक विज्ञान जैसे तमाम क्षेत्र ऐसे ही प्रतिभाशाली युवाओं से अटे पड़े हैं। मैनेजमेंट, कंप्यूटर सायंस, बीपीओ और आउटसोर्सिंग सेक्टर में इन्हीं युवाओं का ‘हल्ला-बोल’ जादू है। भारतीय विश्वविद्यालयों की ओर से ये युवा ‘महाशक्तिमान’ बनने को अग्रसर राष्ट्र का करिश्माई नेतृत्व कर रहे हैं। कहीं कोई खालीपन नहीं। काहिली और बुजदिली तो एकदम ही नहीं। जहां एक ओर संसार भारतीय युवाओं के समर्थन में सर नवा रहा है, तो दूसरी ओर मल्टीनेशनल कंपनियां इन युवाओं के समक्ष घुटने टेक कर बिछने को तैयार दिख रही हैं। तथाकथित साधु, संत और सपेरो का देश आर्यावत आज विकास और समृद्धि की नई इबारत लिखने में मशगूल है। आलम यह है कि उत्सवधर्मी(सारे फिक्र धुंए में उड़ा कर) युवाओं ने अमेरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से ले कर ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरान तक को मंत्रमुग्ध कर डाला है।
एएमयू, डीयू, जेएनयू और बीएचयू तो बानगी भर है। मैं खुद जहां हंू और जिस पेशे में हूं। वहां युवा-नगाड़ा खूब बजता है। महफिले जमती हैं। सैद्धांतिक, वैचारिक और किताबी बातों से इत्तर मनसोख ठहाका, कहकहा, बतकही और बतरस भी खूब होती है। बातों में लड़कियां भी विचरती हैं-बेखटक-बेहिचक। हर रोज यहां दुनिया बनती है-रोचक, मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक भाषा-शैली में। कभी-कभी खाटी बोली-वाणी में भी चौचक। लोग यहां जीते हैं, जी भर के। यानी शांत, उन्मुक्त और हर तरह के पूर्वग्रह से मुक्त हो कर। कुछ जवां दिल अगर रूआब में हों, तो बगैर ठंडा-गरम पैग पिए ही ऐसे बतियाते हैं कि कई वार्तालापलोलुप लोगों के जिस्म में झुरझुरी उत्पन्न हो ले। कभी-कभार ज्यादा भावुक होने की स्थिति में महंगाई, गरीबी, भूखमरी, किसानी मौत और राजनीतिक निकम्मेपन की भी चर्चा छिड़ जाती है। क्या सोनिया गांधी, क्या मनमोहन सिंह, क्या मोंटेक सिंह अहलुवालिया, क्या ललित मोदी और क्या सुरेश कलमाड़ी।
सधे अंदाज में मर्मभेदी विषय-विश्लेषण करते ये युवा-पीढ़ी अपना आग-पाछ सब जानतीे है। मालूमात है उन्हें अपने बोल की हैसियत-हकीकत। आजकल विश्वविद्यालयों में छात्र-नेतृत्व जैसी कोई संस्था तो अब रही नहीं, जो अपनी काबिलियत को मुख्यधारा की राजनीति में आजमा ले। सो कुछ चेतनशील युवा कैंपस के दायरे में ही घंटो धुनी रमाते हैं और मुझ जैसे ज्ञानपिपासु लोगों को संभाषण पिला कर संतुष्ट हो लेते हैं। अक्सर मैं इन संभावनाशील युवाओं के बारे में सोचता हंू। चूंकि पत्रकारिता का शोध-छात्र ठहरा। इस नाते सम्मोहन का उबाल कुछ ज्यादा तीक्ष्ण होता है। वैसे भी जहां राहुल गांधी, वरुण गांधी, अखिलेश यादव, नवीन जिंदल, सचिन पायलट जैसे युवा राजनीतिज्ञ गंभीरतम जनसमस्याओं पर चुप्पी साधे बैठे हों। वहां विश्वविद्यालय के छात्रों का आपसी संवाद में गर्जन-तर्जन बेहतर कल की आश्वस्ती माफिक लगता है। काश! इन कर्मठ युवाओं का कोई सार्थक उपयोग हो पाता। कम से कम बदलाव के विपरीत बहाव के कारण मन-मस्तिष्क में अनावश्यक रूप से आ जमे गाद, मवाद, संकीर्णता, कुंठा और दमित इच्छाओं का बहिर्गमन तो हो जाता।
आज छात्रावास छोड़ जाते हुए मुझे इन्हीं साथियों की याद सता रही है। उनके संसर्ग में रहते हुए मैंने अपनी ज्ञानक्षुधा में कितनी बढ़ोतरी कर ली है। यह जाहिर न करूं, तो भी तय है कि मैं अपने जीवन का बहुमूल्य क्षण खोने जा रहा हंू। नए छात्रावास का वातावरण बेहद शांत भले हो किंतु बिरलागिरी में जो आनंद है, उसका छटांक भर आनंद भी मुझे वहां हासिल नहीं होने वाला। बहरहाल, बीएचयू प्रशासन के दांव-छांव तले अपने शोध के शेष बचे दिन एक कमरे में दो लोगों के साथ ‘शेयर’ करते हुए पूरी कर ले जांऊ। यही मेरी दिली इच्छा है। अनुभव से बटोरे उस सीख भांति, जिसका सूत्रवाक्य है-‘आज के युवा दिमाग से इतने पैदल नहीं हैं कि गांधी माफिक जिंदगी जिएं और ऊपर से गाली भी खाएं।’
Post a Comment

Popular posts from this blog

‘तोड़ती पत्थर’: संवेदन, संघात एवं सम्प्रेषण

उपभोक्ता-मन और विज्ञापन बाज़ार की उत्तेजक दुनिया

भारतीय युवा और समाज: