नौजवान अखिलेश तूझे हुआ क्या है....?

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राजीव रंजन प्रसाद
(इस पंक्तिलेखक की इस बार जो पोस्ट दी जा रही है; हो सकता है अब आगे वेबजगत पर न मिले...। यह निर्णय आमजन से ज़मीनी संवाद और व्यावहारिक सम्पर्क स्थापित करने के लिहाज़ से लिया गया है। यह इसलिए भी कि जिस जनता के लिए हम शब्द, लिपि, भाषा, विचार, तथ्य एवं आंकड़े आदि के नज़रिए से एक वैकल्पिक ‘स्पेस’ गढ़ने की कोशिश में जिस तरह जुटे हैं; यह देखना जरूरी है कि यह सही तरह ध्वनित भी हो रहा है या नहीं। विभिन्न उतार-चढ़ावों के बीच ‘इस बार’ ने कई वर्षों तक लगातार अपनी वेब-उपस्थिति बरकरार रखी। यह भी कि कई बार बिल्कुल बचकाने तरीके से पेश आया। कभी-कभी अतिभावुकतापूर्ण पोस्ट डाल इस पंक्तिलेखक ने यह भी जताया दिया कि इस बच्चे का दिल कमजोर है और उसमें सियासी दुष्चक्रों-राजनीतिक षड़यंत्रों से सामना कर सकने की हिम्मत अथवा आत्मविश्वास नहीं है। लेकिन इन्हीं सब चीजों ने अंततः इस पंक्तिलेखक को ‘मैच्योर’ भी किया है। वह जान गया है कि अधिक या कम बोलने से ज्यादा जरूरी होता है, उचित समय पर उपयुक्त ढंग से बोलना। अतः यह चुप्पी हमारी कायरता नहीं है...यह प्रस्थान है उस दिशा में जहां से सूरज उदित होने के बाद अन्धेरा छा जाता है, जिस हिस्से में रोशनाई आने में वक्त लगता है, लम्बी प्रतीक्षा करनी होती है अपने पाले में फिर से सूर्योदय होने की। मैं उन्हीं अंधियारी द्वीप में अपनी गति-मति संग विचरणा चाहता हूं...., आमीन!!!)  

नोट: पत्रिका 'परिकथा' के अगले अंक में पढ़िए राजीव रंजन प्रसाद की फिल्म समीक्षा-‘मेरा नाम मैरी काॅम’। जरूर पढ़ें।
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आधुनिक परवरिश में रहकर राजनीति सीखे युवा नेता अखिलेश समाजवाद की परिभाषा जानते हैं। वे कहते हैं-''जिस समाज ने मेरे पिता को नेता माना, मेरे चाचाओं को बनाया, मुझे तो छोड़ दीजिए जिसने मेरी पत्नी तक को नेता के रूप में स्वीकार किया है। इसी तरह और भी हमारे परिवार के कई लोग हैं जो राजनीति में अपने को सेवारत रखे हुए हैं और जनता उन सबको स्वाभाविक रूप से अपना समर्थन, सहयोग और भरपूर जनादेश देकर जिताती रही है...यह प्रक्रिया अपनेआप में समाजवाद की विचारधारा, दर्शन और संस्कृति को ज़मीनी रूप से साबित करके रख देता है।'' 

अखिलेश झुठिया नहीं कह रहे हैं या अपना भोकाल टाईट करने के लिए ऐसा नहीं कह रहे हैं। वे विदेश में पले-बढ़े हैं। अपनी शिक्षा को आजकल वह उत्तरप्रदेश की ज़मीन में रोपते हुए यहां की राजनीतिक ज़मीन को समाजवादी तरीके से हरियाने में जुटे हैं। वह यह मानते हैं कि उत्तर प्रदेश को उन्होंने समाजवाद की चासनी में घोलने में उनकी समाजवादी पार्टी ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा है। जिस अख़बार को उठाइए, पत्रिका को उठाइए...सबमें अखिलेश और उनका गुणग्रही गुणगान में लिखे-उगे शब्द, वाक्य, भाषा, चित्र आदि का दिग्दर्शन हो लेंगे। यह सब महज़ वैचारिक रंगीनमिज़ाजी का परिणाम नहीं है बल्कि यह वह दस्तावेज है जिनकी उम्र कागजी स्थूल होती है; लेकिन उनका प्रभाव हमेशा मानसिक होता है। यह मनोवैज्ञानिक राजनीति है जिसमें कही जा रही बात दूर में घटित हुई या साकार होती हुई बतलाई जाती है जबकि सचाई नील-बट्टा-सन्नाटा। किसको इतनी फुरसत है कि वह सरकार से जिरह करे; उसके सरकारी प्रचारों पर प्रश्नोत्तरी आयोजित करे। वह इस पर करोड़ो लुटाए या अरबो; है तो उसकी ही ताकत, बाहुबल की चीज। 

वर्तमान में प्रचारवादी सत्ता की राजनीति चरम पर है और तथाकथित समाजवादी जो कलतक सुश्री मायावती के हाथी, मूर्तियों, पार्कों और आम्बेडकर गांवों आदि पर हुए अनावश्यक खरचे पर वाजिब ढंग से सवाल खड़े करते थे। आज वे सभी प्रचार के कमीशन खाकर समाजवादी होने का बैनर ढो रहे हैं। आज प्रचारवादी ढर्रे का उच्चतम पहाड़ा डकार रही समाजवादी पार्टी ने बड़ी-बड़ी नामचीन पत्रिकाओं को समाजवादी बैनर से ढंक दिया है, या यों कहें कि उनकी ‘ब्रांड इमेज’ को खरीद लिया है। इंडिया टुडे, आउटलुक, तहलका सब के सब यूपी के इसी युवा मुख्यमंत्री का अहोगान-अभिनन्दन कर रहे हैं; उससे एक बात तो साबित होता है कि लोहिया का समाजवाद पैसे पर बिक नहीं सकता था क्यांकि उसके अगुवा नेता डाॅ. राममनोहर लोहिया की हेकड़ी थी-‘युवा कौमे पांच साल इंतजार नहीं करती!’ वहीं आज समाजवादी परम्परा के प्राणवायु कहे जाने वाले अखिलेश यादव प्रबंधन-विपणन की बेजोड़ कला में सिद्धहस्त हो गए हैं जिनमें कल तक भाजपाइयों की मास्टरी थी। इस युवा नेता का लोकसभा चुनाव से पहले तक कहना था कि-‘नरेन्द्र मोदी केवल सेल्स और मार्केटिंग के बल पर ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार बने हुए हैं।'


युवा नेता अखिलेश यादव डाॅ. राममनोहर लोहिया का नाम लेकर बिसूरने वाले या आचार्य नरेन्द्र देव की चिन्तन-प्रणाली को लेकर झोला टांगे चुपचाप सादगीपूर्ण तरीके से चप्पल घिसने वालों को बुरी तरह नज़रअंदाज करते हैं। वह लोगों को नहीं जनाना चाहते कि समाजवादी चिन्तन का पितामह आचार्य नरेन्द्र देव चारित्रिक बल और नैतिक आचरण को समाजवाद की जान मानते थे; फैजाबाद के सीतापुर में जन्मे इस चिंतक नेता के घर को फैजाबाद का आनन्द-भवन कहे जाने की लोक-रीत है। बहुभाषाविद्, राजनीतिज्ञ, असाधारण बुद्धिजीवी, प्रख्यात शिक्षाविद्, बौद्ध-दर्शन के ज्ञाता, संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान आदि थे आचार्य नरेन्द्र देव; लेकिन आज युवा समाजवादी अखिलेश की सियासी पार्टी के ध्येय, चित्त, कर्म, व्यवहार, कल्पना, स्वप्न आदि में यह या वह सब तरह के पारम्परिक महान समाजवादी विचारक दुरदुरा दिए गए हैं। माक्र्सवादी दृष्टिकोण को भारतीय राजनीति और सांस्कृतिक वातावरण में ज्यों का त्यों अंधानुकरण की प्रवृत्ति को नरेन्द्र देव गलत मानते थे। उनका कहना था कि माक्र्स की विचारधारा में जिस केन्द्रीय अन्तर्वस्तु को समाजवाद के रूप में परिभाषित या विश्लेषित किया गया है वह यदि लेनिन और स्टैलिन के लिए सही है, तो हरेक भारतीय के लिए भी। लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि रूस का समाजवाद ही भारतीय समाजवाद के रूप में अक्षरशःलागू हो। नरेन्द्र देव के संगी समाजवादी नेताओं में अग्रणी लोहिया और जयप्रकाश ने भी इसे सही माना। यह अंतःदृष्टि समाजवाद के पुरोधाओं के अन्दर थी क्योंकि वे भारतीय ज़मीन से गहरे जुड़े थे जबकि आज के समाजवादी चुनावी जोड़-घटाव के लिए ज़मीन पर उतरते हैं और दो कदम पैदल चले नहीं कि सुस्ताने के लिए छांह या दालान-बैठका खोजने लगते हैं। शहर में तो इनके रंग-ढंग इतने आलीशान हैं कि वहां समाजवाद चाहे जिस भी दिशा से पुकारिए आपको इस शब्द के सिर्फ नेम-प्लेट, चुनावी बैनर, कागज-पोस्टर आदि ही दिखेंगे; आदमी वह भी समाजवादी सहज में मिल जाए असंभव।

उपर्युक्त दृष्टांत फिजूल नहीं है, झूठिया नहीं है। विचार और भाषा में जाल-जोकड़ भी नहीं है। तब भी, मौजूदा समाजवादी सकार के संस्कार में न्यूनतम शिष्टाचार नहीं है कि वह किसी भली सोच-विचार अथवा आलोचना पर भली-भांति आंख-कान-ध्यान दें। वह बस इतनी सदाशयता बरतें जिससे कि प्रदेश की जनता का किसी भी सूरत में अहित न हो; ईमानदारी से काम लें और लोगों को यह बताएं कि यह सरकार हर आदमी की हिस्सेदारी से राजनीति चाहती है, सबकी अभिव्यक्ति से अपना विचार-भूमि तैयार करने हेतु संकल्पित है; यह सरकार अपनी विचारधारा में आमजन की सोच, दृष्टि कर्म और व्यवहार से सचमुच अपनापा गांठना चाहती है। लेकिन हमारी इन आशाओं या उम्मीदों को समाजवादी राजनीतिज्ञ ठोकर मारने में ही अपनी हेठी समझते हैं। वे यह मानते हैं कि पैसा होने पर जनता पलगी करेगी, मान देगी और जिताएगी। अधिक होगा तो जाति के नाम पर जुट जाएगी। उससे भी अधिक होगा, तो भी क्या होगा क्योंकि उसे हर स्थिति में ‘आॅल इज वेल’ का गीता-ज्ञान हो चुका है। किन्तु यह देखना होगा कि जनता अपने नेता को रचती है। जनता अपने नेता की पहचान करती है। वह जनता है जो एक नज़र में यह पकड़ लेती है कि जो बात कही जा रही है वह कितनी सच्ची है और कितनी झूठ। उसे रसायनशास्त्र के हिसाब से ‘लिटमस टेस्ट’ नहीं करना होता है। वह अपने अनुभव-साक्ष्य प्रकृति से सब स्वाभाविक ढंग से तय करती है। यही जनता जब प्रतिरोध में प्रतिक्रिया देती है, तो अच्छे-अच्छों का सूपड़ा साफ हो जाता है।

हां, उसमें देश-काल-परिवेश से 
सम्पृक्त बुद्धिजीवियों की भूमिका जबर्दस्त है। इसे बाजारू टीआरपी से नहीं नापा जा सकता है। लेकिन भारतीय अकादमिक जगत आज घोर विपत्ति में है। वहां सामाजिक मुद्दों पर बहस नहीं है; प्रहसन है। राजनीतिक आलोचना पर संवाद-सम्मति नहीं है, नंगई है। युवा लड़के-लड़कियों के बीच पिज्जा-बर्गर है, फेसबुक-व्हाट्शप है। कुछ क्रांतिकारी मिज़ाजी मूवमेंटियों और एक्टिविस्टों का जायकेदार समूह है जो कलरव-गान का स्वांग करते हुए कभी भगत सिंह को याद करता है, तो कभी आचार्य नरेन्द्र देव को, लोहिया और जयप्रकाश नारायण को। और देहबाज सुर-ताल का सम्मोहनशाही और नकलटिपी बुद्धिजीवी वर्ग बाकायदा नागार्जुन की शब्दावली में कहता है-‘आबद्ध हू, सम्बद्ध हूं, शतधा प्रतिबद्ध हूं’; लेकिन असल में वह क्षण-क्षण बेईमानी में लोट-पोट करने की सोच रहा होता है; स्वयं के प्रशस्तिगान में बुद्धिवादी भाट-चारणों को नियुक्त करना चाहता है। सबसे कठिन मोड़ है यह जहां समाज का बुद्धिश्रावी नेतृत्व दौलत के गुलबर्ग में लुट-पिट जाता है, बिक जाता है। नतीजतन, आज की राजनीति में यंत्रवादी-प्रचारवादी-जनसम्पर्कवादी एक बीहड़ मकड़जाल फैलाव पर है। मनस्वी साहित्यकार अज्ञेय ने बुद्धिवादी चिन्तन के आधुनिक ढर्रे और उसके यांत्रिक रूपांतरीकरण पर चिंता जताते हुए लगभग गहरे अफ़सोस के साथ कहा है-‘वैज्ञानिक विकास ने जानकारियों का ही ऐसा अम्बार लगा दिया है कि उसी में से वांछित तथ्यों तक पहुँचने के लिए हमें बड़े और अत्यंत द्रुत यन्त्रों की आवश्यकता होने लगी है। कहने को इन तथ्यों को हम भी ‘जानकारी’ कहते हैं; लेकिन यदि जानकारी का सम्बन्ध ज्ञान से, व्यक्ति के मन या चित्त से होता है तो ऐसा कहना भाषा के साथ भी एक प्रकार का धोखा है। क्योंकि ऐसा जान पड़ता है कि अगर प्रगति की यही दिशा रहनी है, तो व्यक्ति मात्र एक संगणक-संचालित समाज की ओर-कम्प्यूटराइज़्ड मैनेजमेंट कण्ट्रोल में परिणत हो जाने वाली हैं। यह विकास का चित्र नहीं है, एक विभीषिका है।’’

मोटे तौर पर श्रम के स्थान पर बुद्धि के श्रम द्धारा जीविका कमाने वाला वर्ग बुद्धिजीवी माना जाता है। शारीरिक श्रम की तो सीमाएं होती हैं और बुद्धि की सीमा नहीं होती। तो शारीरिक श्रम की ईमानदारी और बेईमानी का पता लगाया जा सकता है पर बुद्धि की बेईमानी का पता लगाना बड़ा मुश्किल हो जाता है, दोनों का-बेईमानी और ईमानदारी का भी।.....

कुल जमा निष्कर्ष ओह! अखिलेश, तुझे हुआ क्या है!
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