राहुलीय रिलाॅन्च पर ‘इस बार’ से मुख़तिब राजीव रंजन प्रसाद

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थैलीशाहों ने पहले पुरानी सत्ता को कर्जा दिया, कांग्रेसियों को खरीदा; अब मि. नरेन्द्र मोदी और उसके ‘संघ शक्ति युगे-युगे’ को....नया क्या....ठेंगा?

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गदहे लाख जुगत करें, वे अश्वारोही जमात में शामिल नहीं हो सकते।
दिक्कतदारी यह भी है कि अश्व ही नहीं, तो अश्वमेध कहाँ? अतः गदहों के सहारे ही सच्चे अश्वमेध(लोकतंत्र) का स्वप्न देखना हमारी सनातनी मजबूरी है और भाग्यवाद भी।
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राजीव रंजन प्रसाद

आप मनोविज्ञान और मनोविज्ञानियों को नहीं जानते, कोई बात नहीं!
मन और भाषा का अंतःसम्बन्ध नहीं जानते, तो क्या हुआ?
आप शब्द और अर्थ के सन्दर्भ विशेष के लिए प्रयुक्त प्रयोजनवश मनोभाषिकी से परिचित नहीं, तो भी चलेगा?

बस इतना जरूर जान लीजिए कि स्वभाव मनुष्य की आन्तरिक प्रकृति होती है। भीतरी परतों में छुपे-दबे या रचे-बसे उस वस्तुगत चेतन-अचेतन की प्रतिकृति जो बाहर आचरण में उजागर होते ही व्यक्ति क्या है, कैसा है, कौन है...आदि का पोल खोलकर रख देती है। यह बात व्यक्ति क्या किसी संस्था अथवा दल के बारे में, उसकी रचना-बनावट या संरचना-स्वरूप के बारे में भी उतनी ही सत्य साबित होती है; जितनी की व्यक्ति विशेष के स्वभाव, चरित्र, आचरण, प्रकृति, व्यक्तित्व, व्यवहार और नेतृत्व के बारे में? 

राहुल और मोदी राजनीति के ऐसे ही दो छँटे हुए नमूने हैं जिनका मुँह अक्सरहा भोंपू की तरह बजता है। दोनों खुद को जनता का सिपाहसलार कहते नहीं अघाते हैं; कभी नहीं चूकते हैं। चाहे मसला नियमागिरी का हो या भट्टा-पारसौल का.....विदेशी प्रवासियों का हो अथवा भारतीय किसानी में संकटग्रस्त ढंग से सरकार का मुँह जोहते लोगों का। 

आज राहुल बोले और नरेन्द्र मोदी भी। दोनों के ट्यून में एक खास बात ‘काॅमन’ है; वह यह कि दोनों के व्यक्तित्व-व्यवहार में झक्कीपन नज़र आता है जो उनके ‘टोन’ को बिलावजह आक्रामक बनाता है। बोलते समय दोनों का ‘राउंडअप’(घुमाव) देखने योग्य है। राहुल खड़े होते हैं और स्थिर हो जाते हैं...बोलना जारी रहता है; दैहिक मुख-मुद्रा अथवा हस्त-संचालन में हरकत भी स्वचालित-सा जान पड़ता है। राहुल की इस अदागिरी को देख ‘सेमीमानव’ का ख़्याल आता है जो न पूरी तरह यंत्र हो सकता है और न ही सौ फिसदी इंसान। इसी प्रकार, नरेन्द्र मोदी के भाषणबयानी वाली स्थिति में खड़ा होने के बाद भी एक सामान्य और जरूरी लचक दिखाई देता है। उनके घुमाव अथवा भाव-मुद्रा-भंगिमा के फेरफार में गतिशीलता सहज तैरती दिखाई देती है; उनका आत्मीय झुकाव आमजन के प्रति इतना आग्रही एवं दिलचस्प होता है कि मालूम देता है जैसे अभी लपक कर वे आपके सामने आ जाएंगे। राहुल में यह काबिलियत हो ही नहीं सकती है; क्योंकि वे इसकी पात्रता नहीं रखते हैं। वहीं नरेन्द्र मोदी यह जानते हैं कि शरीर को पूरा घुमाए और उसे साधे बिना अन्तजर्गत में गहराई नहीं आ सकती; उनकी ग्राह्यता बनी नहीं रह सकती और यह नहीं हुआ, तो सार्वजनिक मंचों पर वे कोई चमत्कार भी नहीं कर सकते हैं। 

एक बात और दोनों के सार्वजनिक वक्तव्य में भी ख़ासा फर्क दिखाई पड़ता है। राहुल में बोलने की तैयारी आंतरिक न होकर बाह्यारोपित है; लेकिन नरेन्द्र मोदी में विचार-भाव-सम्बोधन आन्तरिक होते हैं; लेकिन कथ्य के दिशा, मंतव्य और कुल जमा प्रभाव बाहरी वातावरण द्वारा नियोजित-समायोजित। पहली स्थिति में व्यक्ति कोई छूट नहीं ले सकता है क्योंकि छूट लिया नहीं कि पसीने छूटे, बोल बिगड़े। वहीं नरेन्द्र मोदी कुछ से कुछ भी जोड़-तोड़ लें वे अंततः पहुँचेंगे वहीं जहाँ उन्हें तय निशाने के मुताबिक पहुँचना अपेक्षित है, वांछित है। राहुल गाँधी प्रतिकूल परिस्थितियों में बोलने का ‘रिस्क’ नहीं ले सकते हैं; अतः ज्यादातर विषयों के बारे में उनकी समझ-दृष्टि और विचार हैं ही नहीं। नरेन्द्र मोदी हर विषय पर बोल लेने की अपनी विशेषता से परिचित हैं जो एक प्रकार से अहमन्यतावादी रवैया है। यह अपने वैचारिक सूनेपन अथवा विचारधारात्मक खालीपन पर कोई मुलम्मा चढ़ाने जैसा है जिसकी आज की राजनीति में बड़ी धूम है। लेकिन अंततः यह आपको नुकसान ही पहुँचाती है क्योंकि अनुभव और स्मृति पर यदि आप भरोसा करने से बचते हैं अथवा अपने इतिहासबोध और परम्परा को ‘अंडरस्टिमिट’ करते हैं, तो भला आपके विपक्षी को हो सकता है, किन्तु बुरा तो आप ही के साथ होना तय है। राहुल गाँधी राजनीति में बलि की बकरा की तरह नमूदार हैं जबकि नरेन्द्र मोदी बकरे के उस सौदागर की तरह जो बकरे की कीमत ही नहीं जानता है बल्कि अपने बेचेने की कला और अपनी काबिलियत पर भी जिसे काफी भरोसा है।

जहाँ तक दोनों के भाषण ‘डिलेवरी’ का सवाल है, तो एक में आरोप की मरोड़ जबर्दस्त है, तो दूसरे में कायाकल्पी विकास का धाराप्रवाही तोड अद्भुत। एक अपनी बात कहने के लिए जनता को समुझाहट के स्तर पर लाते हैं, तो दूसरा ‘बडे ख़्वाब का बड़ा जादू’ इस तरह दिखाते हैं कि आप बिस्तर से उठे नहीं कि घर में शौचालय बन कर तैयार, पेयजल संकट दूर, बिजली बिल आधा, महंगाई डायन गई तेल लेने, बच्चों का बस्ते का बोझ और नकचढ़ी स्कूल फीस में भारी-भरकम कटौती हो ली। तब भी दोनों अपनी बात कहने में निराले हैं, ज़बान से अलहदा हैं। एक अपने बीते समय के बर्तनों को बजाते हुए, उसका गुणगान करते हुए देष की जागरूक जनता को अपने करतबजाल में फांसना चाहता है, तो दूसरा अपनी वाग्जाल और वक्तृता से ऐसे हुंकार-गर्जना करता है जैसे कि आकाषी बादल गरजते हों। नरेन्द्र मोदी अपने पहनावे और परिधान को हमेशा आउटस्टैंडिग गेटअप देते हैं क्योंकि वह इस मनोविज्ञान को भली-भाँति जानते हैं कि जनता के सामने उस तरह प्रस्तुत हो जिस तरह होने की आकांक्षा वह पालती है। 

इस तरह देखा जाए, तो मोदी और राहुल दोनों वाक्बहादुर हैं। एक बाज़ारू रणनीति में अपनी गर्दन ऊँट की तरह ऊँचा रखने में उस्ताद हैं, तो दूसरा योग, मौन, विपश्यना करते हुए हर दिन कुछ नए हुनर-करतब सीखने अथवा सीखते जाने का दावा करते हैं जबकि जनता सब जानती है....एक्स भी, वाई भी और जेड भी। इतनी सुबुद्ध और समझदार जनता है, तो फिर प्रश्न उठता है कि देश की यह हाल-दशा क्यों है? देसी मंगलाशा में हर रोज इतने देवी-देवता पूजे जाते हैं; लोग श्रद्धा जोतते हुए देष भर में तरह-तरह के भगवानों के समक्ष माथा टेकते हैं; फिर पूरा हिन्दुस्तान मुर्दिस्तान क्यों बना हुआ है? यह वीरभूमि महारथियों और महापुरुषों से इस कदर खाली क्यों है, चारों ओर बियाबान क्यों है? दरअसल, भारत में इस घड़ी राजनीतिक दुचित्तापन इस कदर हावी है कि सभी राजनीतिक पार्टियाँ एक-दूसरे का पूँछ पकड़कर स्वयं को ‘अश्वारोही’ कहने का दंभ पाल रही हैं; पूरे आब-ताब के साथ चुनाव लड़ती हैं, जीतती हैं....और राजनीतिक पराक्रम दिखाते हुए देश का हर तरह से सत्यानाश करने में जुटी हुई हैं। कहना न होगा कि इसी हुमचाहूमची में अपना देश अपनी स्वाधीनता और गणतंत्र का साल-दर-साल विशेष दिवस मानने को अभिशप्त है; लेकिन अँजुरी भर अंजोरिया भी कहीं किसी तरफ से लउक नहीं रहा है, सीएफएल और एलईडी के चकाचैंध में सबकुछ इस कदर बिला गया है मानों कि बोले नहीं कि गला रेताया आप-वह-मैं किसी का! 

खैर! आज रामलीला मैदान में 53 दिनी विपश्यना कर लौटे राहुल गाँधी की आँख उस ज़मीन पर एकटक लग गई है जिसके चारों ओर सोनिया गाँधी महीने भर से परिक्रमा कर रही थीं। पिछले दो महीने से खेती-किसानी पर राष्ट्रीय पार्टियों को खूब लाड़ आ रहा है। इसे एक अच्छा मौका जान कांग्रेस भुनाने में लगी है। यह जानते हुए कि अब वह जमाना चला गया जिसमें अपनी तश्तरी में भुना हुआ फुटहा चना खाए और बैठे-ठाले मस्त-कलन्दर बने पगुराए। वर्तमान सरकार की अध्यादेशी तोपें भूमि अधिग्रहण सम्बन्धी विधेयक लाने पर तुली हुई हैं। उसका यह उतावलापन अथवा ऊतारूपन किसी भी दृष्टि से बर्दाश्त-ए-काबिल नहीं है। मन में कई प्रश्न उमड़-घुमड़ रहे हैं। जनता-जनार्दन की सारी आशाएँ मोदी सरकार की है, अतः प्रश्न भी सिर्फ उसी से किए जाने चाहिए। फिलहाल आप भी देखें:

1. प्रश्न है, जनता आश्वासन पर क्यों जिए? वह आज की रोटी के लिए कल की प्रतीक्षा क्यों करे?2. प्रश्न है, जनता क्या सरकारी सहायता मिलने, नीति-नियम बनने, दस्तावेज तैयार होने, उसके क्रियान्वयन सम्बन्धी पहलुओं के बारे में ठीक-ठीक विचार होने तक भूखों मरे?
3. प्रश्न है, सरकारी शिक्षा-तंत्र इतनी अक्षम, नाकाबिल और अकुषल है, तो इस पूरे शैक्षणिक तंत्र को बनाए रखने में किस पुरोहितवादी और आभिजात्य समाज का हित/लाभ सध रहा है, कल्याण हो रहा है?
4. प्रश्न है, क्या जनता अपने अच्छे दिन आने की फ़िराक में ऐसे ही लोगों को आत्महत्या करने दे, सरकारी कारगुजारियों, शासनिक-प्रषासनिक अक्षमता और राजनीतिक अराजकता के आगे स्वयं को बलि का बकरा बनने दे? दूसरों को राग अलापने दे? अपनी ही ज़मीं से बेदखल होकर स्वयं को अजनबियत की मौत मरने दे? 
5. प्रश्न है, जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए क्यों तरसे? यदि वह किसी सेवा के बदले में तत्काल भुगतान करने को बाध्य या विवश है? वह किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी या सेवा प्रदाता से एक छोटे रिचार्ज के लिए उस उत्पाद-विशेष की देय कीमत का लगभ पच्चीस प्रतिशत हिस्सा भेंट कर देने में नहीं हिचकती है, तो फिर जनता को इसी तरह जीवन-निर्वाह सम्बन्धी मूलभूत सुविधा-सेवा तत्काल मुहैया कराए जाने पर हीलाहवाली क्यों?
6. प्रश्न है, जनता की ज़मीन पर अमीरी-रेखा और दरो-दीवार खड़ा करने से यदि देश में ‘स्मार्टनेस’ बहने लगेगा, तो सबसे पहले राजनीतिज्ञों को अपने ज़मीर, नैतिकता और राजनीतिक प्रतिबद्धता सम्बन्धी जन-समाजीकरण का पेंट-पाॅलिस क्यों नहीं कराना चाहिए जो आलीशान ज़िन्दगी जीने का अभ्यस्त हैं?
7. प्रश्न है, राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण द्वारा वर्तमान राजनीतिज्ञों ने पूरे भारतीय समाज, संस्कृति, इतिहास, भूगोल, आर्थिकी, जनांनिकी आदि को जिस कदर व्यक्तित्वविहीन, चेतनाविहीन, सुख-शांतिविहीन बना/कर रखा है; इस गणितीय अंकशास्त्र-रसायन-अर्थशास्त्र को बदलने क्या कोई मसीहा-महापुरुष-सुधारक अलग से पैदा होगा? 
8. प्रश्न है, यदि सभी तरह के समस्याओं का समाधान/हल आप ही के पास है, तो कब तक भारतीय जनता आपके आसरे रहे? वह भी तब जब नई सरकार विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को अपने आतिथ्य में झूला टांगकर झुलाने में इस कदर व्यस्त है कि उसे यह भी नहीं पता कि भारत की राजनीति व्यक्तिवाद पर नहीं राजनीतिक व्यक्तित्व, चरित्र, सादगी, शालीनता, मूल्य और नैतिकता पर टिकी होती है। 
9. प्रश्न है, मौजूदा सरकार जिस बाज़ारू नज़रिए से अपनी देशी सरज़मी को देख-ताक-निरख-परख रही है; उसमें मानवीय मूल्य, स्नेह, आत्मीयता, ज़मीनी लगाव, इंसानी प्रगाढ़ता, ज्ञानशक्ति, विवेकसम्मत चेतना, दूरदर्शी अंतःदृष्टि इत्यादि का सर्वथा अभाव दिखाई देता है; फिर वह किस बिनाह पर ‘सबका साथ, सबका विकास’ का ढोल पीट रही है? कही ऐसा तो नहीं कि यह ढोंग उसने अपनी अक्षमता और राजनीतिक नपुंसकता का छिपाने-ढँकने के लिए ईजाद कर रखा है?
10. प्रश्न है, मोदी सरकार की हुंकार-गर्जना, हैसियत, हिम्मत, हौसला, हरक़त आदि ने पिछले 11 महीनों में जो दृष्यगत नौटंकी लगातार मंचित किया है; उससे अच्छे दिन के आसार कम दिख रहे हैं; बुरे दिन के संकेत लगातार उजागर हो रहे हैं? ईश्वर, भारतीय जनमानस को अपार सहनषीलता, धार्मिक आचरण एवं विरोध सम्बन्धी विवेकदृष्टि, चिंतनपरक संवाद के अवसर और भारतीय दिलों में एक-दूसरे के लिए बेपनाह जगह दें; क्योंकि साम्प्रदायिक सत्ता जब चकनाचूर होती हैं या उन्हें अपनी मौत मरने की नौबत आती है, तो वह अपनी पूरी कोशिश में दूसरों को तबाह करने, बरबाद करने अथवा पूरी मानवीयता के खि़लाफ बड़ा दाँव चलने का कुकर्म करती हैं। अतः आने वाले दिनों में अपनी इंसानी एकजुटता इंसानीयत, भाईचारा आदि को बुलंदी की अग्निपरीक्षा से गुजारना होगा; अपने को पूर्ण नियंत्रण में तथा निरपेक्ष रखना होगा। 

नोट:
=> उपर्युक्त बातें अपने शोध-कार्य हेतु फौरी आउटलाइन के साथ खिंचे गए हैं। 
=> इन पंक्तियों के लेखक युवा राजनीतिज्ञों के व्यक्तित्व, व्यवहार एवं नेतृत्व में संचार, भाषा, मनोविज्ञान, राजनीतिशास्त्र, समाजविज्ञान, मानवविज्ञान इत्यादि की भूमिका, महत्त्व और मनोभाषिक प्रकार्य पर शोध-कार्य कर रहे हैं।

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