सब्र है बेशुमार, बस सवेरे की दरकार है!

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‘परिकथा’ के इस बार के अंक में पढ़े: राजीव रंजन प्रसाद का लिखा :
‘मेरा नाम मैरी काॅम’
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राजीव रंजन प्रसाद
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1. Narendra Modi
इस समय भारत में चतुरंगी सरकार है जिसके चतुर सुजानों ने देश-सेवा और राष्ट्र-सम्मान का व्रत लेते हुए चतुरंगी क्रांति का हुंकार भरा है। इस दावे में कितना बल है ‘मैक्सिमम गवर्नेंस, मीनिमम गर्वर्मेंट’ के हजामत बनते हुए हम देख पा रहे हैं। जनता कह रही है-‘सिया राममय सब जग जानी’। यानी जनता यह भांप चुकी है कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। यह प्रचारू सरकार अपनी ‘मेक इन इंडिया’ का शंखनाद कर रही है।  उधर नेपाल जमींदोज हो रहा है और भारत में स्मार्ट-सिटी का प्लान लिए कमीशनखोर उत्तराधिकारी माननीय प्रधानमंत्री का कान फूंक रहे हैं। बनारस को क्योटो बनाने का उतान-छितान हुक्मरानी फरमान है ऐसा कि पूछिए मत। सुरापान करते हुए शासक, प्रशासक एवं नौकरशाह की आंख जब बाली उमरिया संग-साथ थिरकती है, तो सब जगह एक ही नारा गूंजता है-‘मेक इन इंडिया’;....और चेहरा उभर आता है माननीय नरेन्द्र मोदी जी का जिन्होंने स्वच्छता अभियान का ऐसा रायता फैलाया कि लगा बनारस के लोगों की आत्मा जागृत हो गई है। भारत रत्न से अभी-अभी सम्मानित महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी के परिसर के ‘अच्छे दिन’ सुमिरन को आ गए; लेकिन! अफसोस ढाक के तीन पात। बीएचयू की पुरानी कार्य-संस्कृति अब भी जारी है; हां बीएचयू परिसर में केसरिया रंग गाढ़ा अवश्य हो गया है। सेल्फी चमकाने वाले काॅकफेसों(वह शख़्स जो सदैव बांग देने को तत्पर रहता है) को इसकी एक मुलायम तस्वीर सोशल-मीडिया पर जरूर चस्पां कर देनी चाहिए; ताकि अलग पोशाक-परिधान में अभी-अभी सम्पन्न हुए दीक्षांत-समारोह पर पूरी दुनिया की नज़र जाए और वे बलैया लें कि-‘वाह भाई, खूब हैं इंडिया वाले!’।

2. Rahul Gandhi
भारत में राजनीति का मास्टरमाइंड हमेशा अराजनीतिक व्यक्ति होता है। वह बाहर से राजनीतिज्ञों के दिमाग में अक़्ल भरता है और राजनीति चलती रहती है, बड़े आराम से। राहुल गांधी ऐसे ही राजनीतिज्ञ हैं जिनके साथ युवा ‘शब्द’ जोड़ना बुढ़े शेर द्वारा कंगन का इश्तहार बेचना है। यह बड़ी धासूं पौराणिक कथा है, नहीं पढ़े तो जाइए ‘ट्विंकल-ट्विंकल गाइए’। राहुल गांधी उस पार्टी के नेता है जो राजनीति के केन्द्र में बने रहने के लिए हर करतब कर सकती है, चियर्स लिडर बनना, तो बड़ी उत्तर आधुनिक पेशकश है। अभी-अभी केदारनाथ धाम से सर नवा कर लौटे राहुल गांधी में इतनी आध्यात्मिक शक्ति और उर्जा भर गई है कि भाजपा शासित केन्द्र पेटकुनिए उनके बारे में अनाप-शनाप बोल रहा है। दरअसल, राजा की जब चित्त-पट होती है या उसका दांव ग़लत बैठता है, तो सबसे पहले वह अपना सारा गुस्सा खेल की नियमावली पर निकालता है। देवालय से पहले शौचालय बनाने का कहढोंग करने वाली भाजपा को यह विश्वास ही नहीं था कि कांग्रेस का यह दुलरूआ केदारनाथ तक पैदल-मार्च कर आएगा; वह भी मई से पहले। उस 16 मई से पहले जहां केन्द्र सरकार के किए का एक साल उजागर होने वाला है। सचाई है कि भारत में ‘मेक इन इंडिया’ को छोड़कर भारत में ‘अच्छे दिन’ जिसके भी आए वह बहुसंख्यक नहीं है। भाईसाहब! सूर्य उदित हो, तो सबको लगना चाहिए कि सूर्योदय हुआ। सिर्फ नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, मुख़्तार अब्बास नकवी, शाहनवाज़ हुसैन आदि के घर रौशन-बयार बहे, तो ऐसे दुत्तलछन पराक्रम को भला कौन बर्दाश्त करेगा?

3. Rajeev Ranjan Prasad
इन दिनों मेरे जेब की हैसियत उलट गई है। अकाउंट में पैसे नहीं है और सरकारी नियत की बेईमानी द्वारा नियुक्त नीति-नियंताओं ने मुझे चार महीने से स्काॅलरशिप नहीं दिया है। 14 अप्रैल को आम्बेडकर जयंति को इन कुकुरमुतों ने ऐसे मनाया जैसे लगा कि वे आम्बेडकर की सोच एवं विचार की ज़मीन पर स्वतन्त्रता, समानता और बंधुत्व का फसल बोएंगे; लेकिन उन्हें तो ‘पांचजन्य’ का लोकार्पण करना था, सो किया। हां, नाश्ते और शरबत की चैचक व्यवस्था थी। ठीक उसी तरह जैसे अकादमिक सेमिनार का आयोजन इसलिए नहीं किया जाता कि अच्छे विचारवान वक्ता और शोधार्थी कोई नई बात कहेंगे अथवा नवाचारयुक्त नई प्रतिस्थापना देंगे; बल्कि इसके आयोजक सर्टिफिकेट बेचकर पैसा बटोरने और प्रतिभागी उसमें भाग लेकर मनपसंद लज़ीज़ व्यंजन गटकने के लिए हर करम-ध्रम करते दिखाई देते हैं। बंधुवर, भारत एक ऐसा देश है जहां सभी स्वयं को सद्चरित्र कहते हैं; लेकिन हैं वे कुते की जात जिसकी पूंछ सीधी हो ले, तो मेरी ख़बर लेना। 

जहां तक विश्वविद्यालय का सवाल है, तो उससे क्या डरना...; मैंने एक दिन मौज में पूछा कि देवता, शोध-कार्य पर लाखों खर्च कर रहे हो, करेंगे क्या? उन्होंने झट से जवाब दिया, ‘इसके लिए दीमकों को वर्षों से जिला रखा है किसलिए, इन्हीं सब के लिए न काम आएंगे।’ मैंने कहा, ‘सही गुरु, यह विश्वविद्यालय वाकई लम्बा जाएगा....!'  यह सचाई है कि स्तरीय शोध करने का बिगुल फूंकने का ही नतीजा है कि मुझे इतना सबकुछ सहन करना पड़ रहा है। क्या इसके लिए कोई जांच कमेटी नहीं बैठाई जानी चाहिए? क्या यह तय नहीं किया जाना चाहिए कि एक-एक शोध-छा़त्र पर 10 से 15 लाख के बीच खर्च करने के बाद प्राप्त निर्गत(Output) इतना स्तरहीन एवं कूड़ा-कबाड़ क्यों है...? सब मुझे कहते हैं कि तुम ठीका लिए हो क्या? मैं कहता हूं-‘हां, मेरा शोध-कार्य यदि कूड़ा-कबाड़ हुआ, तो जो न सो; लेकिन भूखों मारकर इस तरह परेशान रखोगे, तो मैं क्या माननीय प्रधानमंत्री जी के ‘मेक इन इंडिया’ का भी कबाड़ा हो जाएगा!’।

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