सरोगेसी लिडरशिप: प्रचार की पैदाइश नई पीढ़ी

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राजीव रंजन प्रसाद
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1.
सबके चाल-मोहरे एक जैसे हैं। तिकड़म-जुगाड़ भी लगभग एकसमान। सब के सब नेता हैं और भारतीय नेता जिनके दिन-रात सब पूरे होते हैं; लेकिन जनता या तो खालीपन में जिन्दगी गुजारती है या फिर अधूरेपन में या कि अंधेपन में। भारत में नेतृत्व का मतलब ही है कि लफ्फ़ाज होना। यदि न हुए तो जुगाड़ू होना। वह भी नहीं हुए तो एक्टिविस्ट से अराजकवादी होना। कुछ भी न होना तो सिर्फ यह होना कि आपकी डीएनए में किसी नेता-परेता के गुणसूत्र पड़े हों; बस बाकी काम सरोगसी के नए उपकरण अर्थात पैसा, प्रचार एवं प्रभाव की तिकड़ी से बिल्कुल संभव है।

2.
आप सच बोलिए, तो सियासी लोग आपसे आपका बबरी नवाते हुए झूठ बुलवा लेंगे। उनके पास बुलवाने के अनगिनत तौर-तरीकें हैं, ज्ञान और विज्ञान है। उनके पास धन है, संसाधन है और अकूत पैसा के बल पर बटोराया हुआ शक्ति कि उनकी कई पीढि़यां बिना किसी कमाई-धमाई के राज करेगी। यानी हिंग लगे न फिटकरी और रंग चोखा आए तत्काल संभव। यह यांत्रिक युग है और इक्कीसवीं सदी। पैसा, प्रचार और प्रभाव इन्हीं तीनों के बल पर भारत की राजनीति का ‘जन पैक’ मुटाया दिख रहा है। इसी मुटाई के फल हैं, कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी, समाजवादी  युवा नेता अखिलेश यादव और अन्य। इस घड़ी देखिए लीला कांग्रेसी वीर-बहादुर राहुल गांधी का....!

सीधा भी, उल्टा भी, दांए और बांए भी!!!



































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