‘सो काॅल्ड कमिटेड’ राहुल

क्या आपने परिकथा के मई-जून अंक में फिल्म ‘मैरी काॅम’ की समीक्षा पढ़ लीः ‘मेरा नाम मैरी काॅम’
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राजीव रंजन प्रसाद
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(यह पाठकीय प्रतिक्रिया जनसत्ता अख़बार को भेजी गई है)

‘राजनीति की राह’(8 मई) शीर्षक से प्रकाशित समांतर ब्लाॅग में  अर्चना राजहंस मधुकर ने राहुल गांधी के व्यक्तित्व, व्यवहार एवं नेतृत्व के भीतरी परतों को टटोला है और अपनी असहमति के साथ उपयुक्त आशंकाएं जाहिर की है। इस घड़ी राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी में बाहैसियत उपाध्यक्ष पद पर काबिज़ हैं। नेता(?) के रूप में उभरने से पहले वे अज्ञातवास में अध्ययनरत थे। सार्वजनिक ज़िदगी में प्रकट हुए, तो उसे कांग्रेस ने अवतार सरीखा तरज़ीह दिया। व्यक्ति योग्यशाली न हो तो उसे यथाशीघ्र पद देकर ‘योग्य’ घोषित कर दिया जाता है। जबकि ह़कीकत में एम.फिल किए राहुल गांधी राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा(UGC NET) उत्तीर्ण करने तक की काबिलियत रखते हैं, सबका सहमत होना संभव नहीं है। अध्ययनजीवी व्यक्ति भी नेता होता है और वह अपने अध्यापन-कर्म द्वारा नेतृत्व करता है। कहा जाना चाहिए कि राहुल इस नेतृत्व में सफल नहीं हो सकते थे, इसलिए आसान राह चुना। राजनीति में आसानी यह है कि बहुलांश काम पार्टी के कारिंदे एवं अन्य सदस्य करते हैं। खुद सिर्फ ‘प्रर्जेंटेबल फेस’ बनकर संग-साथ दिखते रहना भर होता है। राहुल जब भी दिखते हैं, कैमरे की फ्लैश चमकती है। अख़बार अपने पृष्ठों पर ‘कागद कारे’ करते हैं। सबको पता है कि इन सब परोक्ष प्रमोशन का जैनुइन ईनाम किस-किस को क्या-क्या और कितना मिलता है। 

आज के अधिसंख्य संचार-माध्यम प्रायोजित ईनाम के बूते ख़बर और विचार का काॅकटेल परोस, प्रसारित कर रहे हैं। शेष प्रचार का अपना प्रोपेगेण्डा सुरसामुंह लिए आगवानी में खड़ी है। आजकल उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री अखिलेश और आमजन के ‘अच्छे दिन’ लाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इन्हीं सब ‘इवेंट/पब्लिसिटी/इमेज बिल्डिंग’ में नधाए हुए दिख रहे हैं। पूरे देश में ‘पहले शौचालय फिर देवालय’ का बुलंद नारा देकर संघी मानसिकता को हूरपेटने वाले प्रधानमंत्री की माया तक ऐसी कि अपने संसदीय क्षेत्र में भी उनकी कथनी-करनी बीस नहीं बैठ रही। इस ओर ध्यान देना मीडिया के नफ़ासत में नहीं है। वह बिकने की आदत में इतनी मगरूर है कि उसे अपनी बोली लगाने वाले की आवाज़ छोड़ और कुछ भी नहीं सुनाई पड़ रहा है। हां, उनके चुने जयापुर गांव पर अधिकारियों की मेहरबानी जबर्दस्त है; तो यह भी एक लोकप्रियतावादी कोशिश है जिसमें द्वार गुलज़ार किन्तु समूचे घर में अंधेरिया वाली कहावत सच हो रही है।

अतएव, राहुल गांधी इतने दिन राजनीति में ‘ट्रेनिंग’ लेते हुए इतना तो जान ही गए हैं कि गर्म कड़ाह के खौलते तेल में पानी का छींटा मारने का अंजाम क्या होता है। चूंकि कांग्रेस में पानी नहीं बची है। इस कारण वह अपना पसीना बहाते हुए मौजूदा सरकार के उपर जल-छिड़काव में दिन-रात जुटे हैं। इस उपक्रम को भी ‘सुपररियलिस्टिक ड्रामा’ की तरह करने के लिए उन्हें विदेशी ज़मीन पर कठिन अभ्यास करने पड़े। हिन्दी शब्दकोश और मुहावरे को साधना पड़ा। चेहरे के भाव-भंगिमा, दैहिक-चेष्टाओं,बात-बनाव, बोल-बर्ताव, मौन-ख़ामोशी आदि के बीच सही संगति और संतुलन बिठाने के लिए विधि-विधान के साथ तकरीबन आठ सप्ताह तक ‘विपश्यना’ करना पड़ा। 

राहुल आज क्या कर रहे हैं, मीडिया दिखा रहा है और कल क्या करेंगे यह मीडिया तय कर चुका होगा। हवाई जहाज में राहुल यात्रा कर रहे हैं और अपने साथ के यात्रियों से बातचीत करने में मशगूल है; यह टेलीविज़न पर दिखाने के लिए खुद पत्रकार को उसी समय हवाई-यात्रा करनी पड़ रही है, ट्रेन में बर्थ ‘रिजर्ब’ कराने पड़ रहे हैं। मौजूदा जनमाध्यमों के साथ बड़ी विसंगति यह है कि वह अपनी रूप, शैली, अन्तर्वस्तु अथवा प्रस्तुति-प्रसारण में वस्तुपरक, निष्पक्ष, पारदर्शी एवं तर्कसंगत नहीं है। दिल्ली की मीडिया देश के भूगोल से किस कदर अनभिज्ञ है यह भारतीय टेलीविज़न देखते हुए स्पष्ट हो जाता है; जबकि कई बार इन मीडिया-सुजानों से अच्छी ऐंकरिंग और उनकी नकल स्कूली बच्चे कर डालते हैं। खैर! राहुल कई साल पहले वाराणसी क्षेत्र के अहरौरा आए थे, आज उस गांव का नाम तक उन्हें याद नहीं होगा। लेकिन कांग्रेसी और मीडियावी ‘इवेंट मैनेजर’ चाह जाएं तो किसी दिन राहुल हम सबको प्रधानमंत्री के सांसद-ग्राम जयापुर से सटे किसी गांव में चहलकदमी करते हुए दिख जाएं; किसी काकी-चाची या बड़े-बुजुर्ग से बतियाना शुरू कर दें; यह जानते हुए कि उनका यह चाल-चरित्र और चेहरा टेलीविज़न रिमोट द्वारा बदले जाने वाले ‘टीवी स्क्रीन’ से अधिक गति एवं तीव्रता वाला है। भाई! सवाल उनकी ‘कमिटमेंट’ का है वह भी 'पाॅलिटिक्ल ब्रेक' के बाद; सो हनक तो रहेगी ही। जनता सब बूझती है, तब भी सबको अवसर देती है; लगे रहो राहुल।
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