पत्रकारिता की उदास नस्लें

प्रिय देव-दीप,

पत्रकारिता दिवस है आज। 30 मई। एक फोन नहीं। इस आशय से। मैं पत्रकार नहीं हूं; लेकिन अकादमिक क्षेत्र में पत्रकारिता का ही, तो शोधार्थी हूं। कहीं ग़लत दिशा में तो नहीं आ गया। लौटना मुश्किल। अब ऐसे ही बादुर की तरह लटके रहना है। तुम सब बड़े हो और अपनी कैरियर देख सको; इसकी कोशिश में जुटना है।

(चुप। राजीव। खमोश। खामोश राजीव।
शांत। शांत राजीव।
कुछ नहीं। नथिंग। नील बट्टा सन्नाटा।
कल सुबह ऐसे उठो, जैसे दुनिया में पहली बार सूर्योदय देख रहे हो।
हवा के चलते हुए। पहर को बीतते हुए। अपनी खुराक पर जाओ। भोजन पर जाओ। कपड़े और चेहरे के रचाव-बनाव पर जाओ। अपने प्रति अधिक उदार बनो। औरों के प्रति ज्यादा ढीलापन नहीं। सीखो।
विश्व में कितने देश हैं। याद करो। राजधानी। महत्त्वपूणर्र स्थल। नेता-परेता। व्यापार-वाणिज्य। भारत-भूगोल। बांध-परियोजना। डिजिटल इंडिया। मेक इन इंडिया। ब्रांड। बाॅडी लोशन। चिप। स्मार्ट फोन... भाषा। भाषा की तकरीरें। भाषाओं में सूचना। सूचनाओं की कैटेगिरी। लोग। मानुष। जल, जंगल, जमीन। अधिग्रहण। बाज़ारीकरण। निजीकरण। पढ़ों और बांचों। लिखों और छाप दो। जुड़ो मत। जुड़ने की शर्त मत लादो। ज्ञान गंगा की संक्रांति है। लोगों को बताना नहीं। गूगल देवता में सब उछला जाएगा। कौन महान। कौन आगे। कौन पीछे। क्रम क्या। कद क्या। किस्से और जुबानी-लिखित प्रचार क्या। यही जीवन-संग्राम। यही दुनिया। यही एजेंडा और प्रोपेगेण्डा। सीखो। तरो और अमर हो जाओ। ऐसे ही सबका कल्याण हुआ। बेड़ा पार। तुम्हारा भी। जानकारी रखो। यही बताओ। इतना ही करो। बस, बस, इस जन्म में इतना ही बस।)

तुम्हारा पिता
राजीव
30/05/2015
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