Saturday, March 14, 2015

प्रिय देव-दीप,

आइए, इस बार समन्दर को अपने घर आमंत्रित करें; उसके साथ ‘कूल-चिल’ पार्टी-सार्टी करें। ऐश-मौज, धूम-धड़ाका। गंजी-बनियान पर सोए। क्योंकि यह आराम का मामला है और इसी रास्ते हमें सदा के लिए सो जाने के लिए तैयार रहना है, तो गुनगुनाइए...मचिंग ड्राइव!!’
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कैसे हो? आज भारत और जिम्बाॅम्बे के बीच क्रिकेट मैच है। चारों तरफ सुन-सन्नाटा है। सारा हो-हो या तो टीवी में क्रिेकेट स्टेडियम में हो रहा है या तो टीवी देखते उन चिपकू लोगों के बीच; जो अपने माता-पिता को रोज दी जाने वाली दवाइंयों के नाम, खुराक और समय भले न जानते हों; लेकिन वे हरेक खिलाड़ी का पूरा रिपोर्ट कार्ड जानते हैं और आपसी बातचीत के दौरान बघारते भी हैं। 

बाबू, किसी चीज के बारे में जानना या जानकारी रखना ग़लत नहीं है। जानकारी चाहे जिस भी विषय के बारे में हो उसके तथ्य, आंकड़े और उससे सम्बन्धित सूचनाएं बेहद महत्त्वपूर्ण होती हैं। मुझे तो हाईस्कूल में पढ़ा पाइथोगोरस प्रमेय भी याद है और हीरो का सूत्र भी। मुझे तो रसायन में पढ़ा इलेक्ट्राॅनों की निर्जन जोड़ी; मेंडलिफ की आवर्त सारणी, सिंदर का सूत्र और पारा का परमाणु भार और परमाणु संख्या भी याद है। जबकि इसे पढ़े ज़माने हो गए। अब पत्रकारिता के तकाज़े से पढ़ना और चीजों को सहेजना जारी है।

देव-दीप, कहना यह चाहता हूं कि आदमी के संस्कार को गढ़ने में जिन बुनियादी चीजों की भूमिका होती है; उनका महत्त्व कभी खत्म नहीं होता। बस उन्हें बरतने की तबीयत चाहिए। उन्हें उल्टने-पुलटने की नियत चाहिए होती है। यदि आप किसी चीज को वर्गीकृत करते हैं या स्तरीकृत, तो आप उसके गुण-धर्म पर विशेष ध्यान देते है; पर्याप्त महत्त्व भी। यह इसलिए कि सब एक-दूसरे से भिन्न हैं; लेकिन उनकी अभिन्नता एक साथ होने और बने रहने में है। उनका गुण-धर्म उन्हें उनकी उपयोगिता सिद्ध करता है। इसी तरह आदमी को अपने गुण-धर्म के अनुसार अपनी प्रकृति-स्वभाव और आचरण का प्रदर्शन करना चाहिए। प्रदर्शनप्रियता से परहेज आवश्यक है। आप राजा हो या रंक। प्रकृति की निगाह में सब जीव और प्रजाति मात्र हैं। सबकी प्राकृतिक रूप से मूलभूत आवश्यकता एक माफिक है। भाषा की भिन्नता से भावनात्मक लगबाव अथवा इंसानी राग का मूल्य नहीं बदल जाता है। संवेदना के शक्लोसूरत में तब्दीली नहीं आ जाती है।यह बस न भूलें हम। यदि मां-बाप मनमाफिक कपड़े-लत्ते नहीं पहनने  देते, क्या इस नाते वे बुरे हो जाएंगे? अभिभावक अपने बच्चों को बार-बार पढ़ने और कड़ी मेहनत करने की ताकीद कर रहे हैं; क्या इसके लिए वे दकियानुस हो जाएंगे? आखिर इसमें किसका हित और अंततः लाभ छिपा है। ऐश, मौज और खुशी क्या स्थायी रहने वाली चीज है? नहीं न! भारतीय दर्शन का नाभिकीय-लक्ष्य या केन्द्रीय उद्देश्य मानुष् अभिव्यक्ति का सत्य से साक्षात्कार कराना होता है। उस सत्य से जो ‘सत्य शिवं सुन्दरम्’ की लोक-मंगलकामना में अनुस्यूत है, व्याप्त है।

 आजकल चीजें सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से तेजी से रीत रही है; छीज रही हैं। अक्सर हम सारा दोष पश्चिम के मत्थे मढ़ देते हैं। उनका नाम ले-लेकर गरियाते हैं और अपनी वेद-वैदिक परम्परा के सार्वभौमिक सत्य और सार्वदेशिक रूप से उच्चस्थ होने का महिमागान करते हैं। हम शिव के जटा से गंगा के अवतरित होने का अर्थ उसके सदानीरा पावन-पवित्र और निर्मल होने की बात पर सही विश्वास कर लेते हैं। अपनी गलतियां कहां सुधारते हैं हम? कौन अपने को अपने से सवाल के घेरे में खिंचना चाहता है? कौन यह कहता है कि हर जगह पाप और अनाचारी है; क्योंकि हम सब खुद पापी और अनाचारी हैं। सभी को दूसरे को सत्यवान बनाने की पड़ी है। हम तो सिर्फ जबानी ढंग से सत्या का मंगलाचरण गाते-बखानते हैं; और अपनी दुनिया में मस्त रहते हैं। 

देव-दीप आने वाला समय अत्यंत कठिन है। हादसाएं और प्रकोप तेजी से बढ़ने वाली है। मौसम-चक्र बिगड़ने वाला है। लोग कठिन दौर में जीने के लिए मशक्कत कर रहे होंगे और बेरहम हो चुकी प्रकृति हमारे अपने ही किए का फल देती दिखाई देगी। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, इटली, जापान को अपनी ताकत और महाशक्ति होने का गुमान दिखाना होगा। उन्हें प्रकृति से मुकाबले में थेसिस-एंटी थेसिस तैयार करनी होगी। जब मनुष्य लगाातार हारता है, तो अविश्वासी हो जाता है। पराजय उसे आत्महीनता की ओर ले जाती है। ऐसे समय में ही भारतीय दर्शन का स्थायी मिज़ाज काम आता है। वह आपको ऐसे मौके पर अनुभवजनित और स्मृति-केन्द्रित संबल, प्रेरणा, और शक्ति प्रदान करता है। आत्महीनता की स्थिति में गौरव-गान नहीं गाए जा सकते हैं; लटके हुए चेहरे संग विजयगाान गाते हुए अपने मुख्य गंतव्य की ओर कदम नहीं बढ़ाया जा सकता है। उसके लिए तो जीवटता और जिजीविषा का होना पहली और आखिरी शर्त है। लेकिन हम इसे कैसे समझेंगे जब तक हम इन्हें जानने-समझने के लिए स्वयं को स्थिरचित्त नहीं कर लेते हैं; अपनी अनावश्यक तेजी पर अंकुश अथवा लगाम नहीं लगा लेते हैं।

प्रकृति गड़बडि़यां कम पैदा करती है; वह लगातार सुधार अधिक करती है। उसे मनुष्य की सत्ता से अति-मोह है; ऐसा नहीं है। लेकिन वह सबको बचा देखना चाहती है। वह सबकी उपस्थिति में अपने प्रेय-श्रेय का अभिवृद्धि मानती है। उसे हिंसा पसंद नहीं है; हत्याएं नहीं पसंद है। उसे नरसंहार और आपस में मार-काट कतई बर्दाश्त नहीं है। आजकल हिंसा, हत्या और आतंक का भयावह चेहरा सर्वत्र दिखाई दे रहा है। यह प्रकृतिजनित बुराई नहीं है; यह मानवजनित और आमंत्रित स्थिति है। इसके लिए मनुष्य मात्र जिम्मेदार है। लेकिन जब हमारे स्थूल-सूक्ष्म विवेक-विक्षोभ, ज्ञान, बुद्धि, संकल्पशक्ति आदी चुक जाते हैं, तो प्रकृति स्वयं ‘कमांड’ करना शुरू कर देती है। जिसने इस पूरी दुनिया को रचा है; उसके पास इस दुनिया को हर प्रतिकूल परिस्थिति से उबारने की ‘प्राग्रांमिंग’ भी आती है। आज प्रकृति इसी राह पर है। 

ध्यान रहे कि प्रकृति के पास कोई ‘आधार कार्ड’ नहीं होता है; न ही कोई चित्रगुप्त जैसा मिथकीय नायक। अतः प्रकृति का निर्णय कई बार अपनी वजन में नृशंस मालूम दे सकता है। वह वज्र बन सब पर टूटती है। यह कहर कई हिस्सों में जबर्दस्त उथल-पुथल और कोहराम मचाने का संकेत देते हैं; इस बरस भी ऐसा ही कुछ होने वाला है। खैर!

देव-दीप, अगले विश्व-कप में इस बार के विजेता कि प्रतिष्ठा दांव पर होगी; यह देखने के लिए अपना बचा होना भी जरूरी है। इसे अवश्य अपनी जेहन में रखना चाहिए। आमीन!

तुम्हारा पिता,
राजीव

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हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...