प्रिय जन,

दुखी होना मनुष्य का सहज-स्वाभाविक गुण है। लेकिन, बाबला के जाने से अकथित व्यथा की प्राप्ति हुई है। नाम से नारायण देसाई जो बापू की गोद में पला-बढ़ा और अंत तक जो शाश्वत-मूल्यों का संवाहक बना रहा; जो भारत की ही नहीं विश्व की तरुणाइयों के बीच सत्य-अहिंसा की अलख जगाता रहा; इस संसार से विदा हो लिया। उसका जाना हतप्रभ करता है; तो नहीं! लेकिन उसके न रहने से जो पीड़ा जन्मी है; वह असह्य है। युक्लिड ने कहा था कि रेखा वही है सकती है जिसमें चैड़ाई-मुटाई न हो। मेरे देखते ऐसी लाइन या लकीर न तो आज कोई बना पाया, न बना पाएगा। लेकिन, नारायण ऐसी ही परिकल्फना रख जिया और अंतिम सांस ली। मैं अपना कहा फिर दुहराता हूं कि आजतक हम आखिरी दरजे की बहादुरी नहीं दिखा सकें, मगर उसे दिखाने का एक ही रास्ता है, और वह यह कि जो लोग उसे मानते हैं वे उसे दिखायें। मेरा अपना मानना है कि जिस तरह आजादी के दिनों में स्वतंत्रता-सेनानियों ने जेलों का डर छोड़ दिया था, इस घोर प्रकम्पित भौतिकवादी युग में उसी तरह नारायण ने मृत्यु का डर छोड़ दिया था। पह गांधी-कथा का राग-गान गाता रहा; कहता-सुनाता रहा। देश की चेतना में उसकी भूमिका क्या और कैसी है यह देशवासी जानें; मेरे लिए, तो नारायण ने एक बड़ी लकीर खींच दी...!

ओह! बाबला, मन कितना अप्रसन्न् है, और दुखी है।

नारायण बाबला था; इसलिए कर सका जो उसके सामथ्र्य और सीमा में था। एक आदमी बहुत कुछ नहीं कर सकता। बहुत कुछ नहीं हो सकता। बहुत कुछ करने और बहुत कुछ होने के लिए उसे अंतर्यामी होना होगा। लेकिन गांधी होने के लिए, भगत होने के लिण्, आम्बेडकर होने के लिए,  विनोबा होने के लिए, जयप्रकाश होने के लिए या महादेव और नारायण होने के लिए तो देहधारी होना होगा...दादा धर्माधिकारी होना होगा। इस जगत में परिवर्तन सचेतन प्रयास से ही संभव है जो मनुष्य अपना अभीष्ट जानकर कर सकता है। शेष प्रकृति स्वमेव करती है। लेकिन, जब मनुष्य अपने हिस्से का काम भी प्रकृति पर थोप देता है या उसे इस दशा अथवा अवस्था में पहुंचा देता है कि प्रकृति के काम में अतिरिक्त अड़चन पैदा होने लगे, तो ऐसी परिस्थिति में प्रकृति का प्रकोप दुहरा-तिहरा होता है। वह अपनी ही पारिस्थितिकी को नियंत्रित और संरक्षित-अनुरक्षित रख सकने में असमर्थ हो जाती है। आज प्रकृति या पर्यावरण की हाल-ए-हकीकत कुछ इसी माफिक है। सबलोग अब बचाव की दिशा में नहीं मृत्यु-दशा में गतिमान होने की चाह में नि:द्वंद्व ग़लत-सलत, पाप-अनाचार, हिंसा-हत्या, युद्ध-आतंक आदि में स्वयं को घुलाए हुए हैं। मानव-जगत का यह विलयन स्वाभाविक नहीं है। परन्तु आज मनुष्य तकनीकी-प्रौद्योगिकी की श्रेष्ठता में इस कदर बदहवाश है कि उसे अपनी चेतना से कोई वास्ता-रिश्ता ही नहीं है। वह अपने दंभ और गुरुर में प्रकृति के सब्र की परीक्षा ले रहा है; लेकिन वह भूल रहा है कि प्रकृति का सब्र जब कहर बन टूटता है, तो मानव-निर्मित बांध शीशे की तरह चटकने और चूर होने शुरू हो जाते हैं; जिसके हर कण और हिस्से में अक्स, तो मनुष्य का दिखेगा; लेकिन वह उस वक्त कोई पराक्रम करने की स्थिति में नहीं होगा। यह अमेरिका-चीन-ब्रिटेन-जापान-इटली-फ्रांस जानते हैं और नेपाल-भूटान-तिब्बत-मयंनमार-हिस्तान-पाकिस्तान भी। सब देशों की एक ही गति होगी; ऐसा नहीं है। प्रकृति उन्हें ही बचा देखना चाहेंगी जिन्होंने प्रकृति को हर हाल में बचे रखने के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया, होम कर दिया अथवा इसी की चिंता-फिक्र-जुगत में खेत हो गए।

देव-दीप, नारायण मानवीय चेतना का अगहर था। वह गांधी को अपना नियामक और प्रणेता मानता था। उस गांधी को जिसे इस देश में सीधे सीने पर गोली मारी गई। उस गांधी को जिस गांधी के नाम पर पूजा-अर्चना और आध्यात्मिक टिटीमा बहुत है; स्वच्छता अभियान के नाम पर साफ-सफाई के चोचले बहुत हैं; लेकिन नारायण जैसा मनस्वी साधक और सच्चा अनुयायी नहीं है; या कंकड़ की अधिकता के बीच अनाज के दाने कम हैं।

अब और कहने की इच्छा नहीं रही। कहे को सुनता कौन है। सुनकर मानता कौन है। मानकर चलता कौन है। चलकर आगे अपना सबकुछ जन-जन के लिए लुटाता कौन है। सबको अपनेआप की पड़ी है। आजादी इस सोचे के लिए नहीं थी। उस सोचावट में आमजन का जीवन, सुरक्षा और आंतरिक समृद्धि का ध्येय शामिल था। उस चिंतनधारा में आखिरी आदमी के लिए संविधान की प्रस्तावना लक्षित थी। उसमें भारतीय वेद-ऋचा, मुनि-तपस्वी, सेठ-साहुकार, राजा-रियासत, नेता-अमलादार सबकी भागीदारी थी; हिस्सेदारी व्यापक और एकबोधीय थी। उस परिकल्पना में भारत के अवाम के लिए आमंत्रण था; जागरण का संकल्प था। आज की तरह ‘मेक इन इंडिया’ नहीं जो अपने देशवासियों को परे टेरता है और दूसरे देश के व्यापारियों-कारोबारियों-पूंजीपतियों को आमंत्रित करता है। मैं इन प्रवृतियों का कल भी मुखालफ़त करता था, आज भी और अगले किसी देह-आत्मा का संसर्ग मिला, तो उसमें भी।

सबका
महात्मा

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